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तीन लघु कथाएँ

डॉ. पूरन सिंह


दिदिया
जब मम्मी पापा मरे थे तब प्रशांत छोटा था। मैं बच्चों को ट्यूशन पढाती और खुद भी पढती साथ ही साथ प्रशांत की भी देखभाल करती थी। उसने मेहनत से पढा और आज इंजीनियर है। उसकी पत्नी है, दो बच्चे हैं और बहुत सुन्दर सा घर है। वह जब भी फोन करता है या चिट्ठी लिखता है तो हमेशा यही कहता है, ’’दिदिया, तुम नहीं होती तो मैं नहीं होता।‘‘ घर जाऊँगी तो सब कुछ छोडकर मेरे ही चारों ओर घूमता रहेगा, ’’दिदिया ये बात दिदिया वो बात।‘‘ मैंने कई बार समझाया भी, ’’प्रशांत तुम बडे हो गए हो अब बच्चों की तरह मत किया करो।‘‘ तो गला भरकर कहने लगेगा, ’’अपनी माँ के लिए भी भला कोई बडा होता है दिदिया।‘‘ मैं उसके प्यार के आगे झुक जाती हूँ।
अभी हम अपना घर बनवा रहे थे। कुछ पैसों की जरूरत पड गयी तो ये कहने लगे, ’’मालती, प्रशांत से उधार ले लेते हैं। जैसे ही हो जाएँगे उसके वापिस कर देंगे।‘‘
’’नहीं, मैंने हमेशा से दिया है। मैं उससे नहीं लूँगी‘‘ मैं इन पर खिसियायी थी।
ये चुप हो गए थे। मैं सोचती रही फिर अचानक मैंने प्रशांत को फोन पर कह दिया कि प्रशांत मुझे पचास हजार रुपये की जरूरत है। उसने कोई कारण नहीं पूछा सिर्फ हाँ कर दी थी।
मैं अगले ही दिन उसके घर के लिए चल पडी थी। घर पहुँची तो प्रशांत घर पर था ही नहीं उसकी पत्नी ने कहा, ’’आज सुबह ही ऑफिस के काम से उन्हें नागपुर जाना पडा है दीदी।‘‘
’’तुम्हें प्रशांत ने कुछ बताया नहीं‘‘ मैं बोली,
’’नहीं दीदी‘‘
मैंने सारी बात प्रशांत की पत्नी को बतायी तो वह परेशान होने लगी और फिर अन्दर से बीस हजार रुपये लेकर लौटी, ’’दीदी ये पैसे मेरे हैं। वे पूछेंगे तो मैं बता दूँगी। इन्हें रख लो।‘‘
मैंने पैस नहीं लिए थे, ’’आज तक उससे कहाँ कुछ माँगा। आज जरा से काम के लिए मुँह फेरकर चला गया। वैसे तो हमेशा दिदिया-दिदिया करता रहेगा।‘‘ मैं रुआँसी हो आयी थी।
’’दीदी वे वैसे तो नहीं हैं। कोई बात जरूर रही होगी।‘‘ प्रशांत की पत्नी ने मुझसे कहा था तो मैंने उसकी बात को कोई महत्त्व नहीं दिया था।
मैं वापिस अपने घर लौट आयी थी।
ये घर पर ही थे। पूछने लगे, ’’पैसे मिल गए‘‘
’’नहीं, लगता है प्रशंात बदल गया है।‘‘
’’नहीं, प्रशांत कभी नहीं बदल सकता।‘‘
’’प्रशांत मेरा भाई है या तुम्हारा।‘‘
ये चुप हो गए थे और अपने कमरे में चले गए थे।
मैं रात भर परेशान रही। न जाने क्या क्या सोचती रही थी। ’’कैसे पाला पोसा था प्रशांत को और आज देखो।‘‘ पूरी रात आँखों में ही निकाल दी थी।
अगले दिन दोपहर को मैं और ये साथ साथ बैठे सोच रहे थे कि पैसों का इंतजाम कैसे हो। इन्होंने कहा था, ’’काम तो पूरा हो ही गया है।‘‘ अभी हम लोग सोच ही रहे थे कि बाहर किसी ने घंटी बजायी थी। मैंने आकर देखा तो डाकिया ने एक पतला सा लिफाफा पकडाते हुए कहीं हस्ताक्षर करने को कहा तो मैंने कर दिए थे। अंदर आकर मैंने लिफाफा खोला। उसमें एक चैक था। अंकों की जगह देखा तो एक पर पाँच शून्य लगे थे अर्थात् एक लाख रुपये का चैक था। चैक के साथ एक छोटा सा कागज था। चैक मैंने इन्हें दे दिया और उस कागज पर लिखी इबारत मैं पढने लगी थी, ’’दिदिया, जिस दिन तुम्हारा फोन आया था। मैंने उसी दिन से चैक काटकर स्पीडपोस्ट से तुम्हें भेज दिया था। मेरी नौकरी तो ऐसी ही है अचानक भागना पडता है। एक लाख रुपये का चैक है। बैंक में जमा कर देना। प्रशांत का चैक है बाऊंस नहीं होगा। दिदिया, आज मैं कितना खुश हूँ मैं अपनी दिदिया के कुछ तो काम आया। दिदिया, ये जिंदगी तुम्हारी ही तो है। पैसे नहीं कभी जान माँग कर देखना तुम्हारे च....र....णों...।‘‘ आगे मैं नही पढ पाई थी। छलक गई। ये पास में ही खडे थे। पूछने लगे क्या हुआ
’’पागल है‘‘
’’कौन‘‘
’’यही दिदिया वाला और कौन।‘‘घ्घ्घ्
कवरेज कम्पलीट
राम प्रसाद बहुत ही स्वाभिमानी और ईमानदार व्यक्ति था। उसने जब ठाकुर जसवीर सिंह के घर बेगार (गुलामी) करने से मना किया तो ठाकुर साहब के अहंकार को ठेस पहुँची। लगा कि सदियों से चली आ रही परम्परा को चकनाचूर किए जाने की किसी ने नापाक कोशिश की हो फिर क्या था ठाकुर साहब ने बंदूक उठायी और रामप्रसाद की झोपडी की तरफ कूच कर गए थे।
रामप्रसाद अपनी पत्नी और सवा साल के बच्चे के साथ घर पर ही था। ठाकुर साहब को घर आया देख वह संभला ही था कि ठाकुर साहब ने अपनी दोनाली बंदूक से गोली चला दी। देखते ही देखते रामप्रसाद और उसकी पत्नी भगवान को प्यारे हो गए थे। मासूम बच्चा मोनू को कुछ ज्ञात नहीं था कि उसके माँ बाप को आततायी ठाकुर ने मार डाला है सो वह कभी रामप्रसाद के मृतक शरीर को देखता तो कभी अपनी माँ को। गाँव में किसी की हिम्मत नहीं थी कि रामप्रसाद के बेटे मोनू को उठाता। बच्चा एक घण्टे तक यों ही तडपता रहा। एक घण्टे के पश्चात् पुलिस पहुँच गई और आला आफिसर्स, मीडियाकर्मी क्यों पीछे रहते। आफिसर्स अपनी जाँच पडताल में लग गए और मीडिया कर्मियों का फोटो सेशन शुरू हो गया महिला मीडियाकर्मी चाहती थी कि मोनू रोए, लेकिन मासूम मोनू कभी अपनी माँ के मृतक शरीर पर लेट जाता तो कभी अपने पिता के। उसके लिए तो यह एक खेल बन गया था। महिला मीडियाकर्मी ने बहुत चाहा कि बच्चा मोनू रोए, लेकिन जब वह नहीं रोया तो उसे लगा कि उसका कवरेज अधूरा रहा जा रहा है तो उसने अपने बालों में लगी पिन निकालकर बच्चे मोनू के चूतड में चुभो दी थी। बच्चा असहनीय पीडा से बिलबिलाने लगा और चिल्ला चिल्लाकर रोने लगा था। कैमरे चमकने लगे थे तभी खुशी से नाचती उस महिलाकर्मी ने अपने कैमरेमैन से सिर्फ इतना ही कहा था,’’वैल डन! कवरेज कम्पलीट, थैंक्यू‘‘। घ्
बडे सर
राजशेखर साहब का घर मेरे घर के पास में ही है। अभी पिछले साल ही उनकी पत्नी का स्वर्गवास हुआ है। उनके दोनों बेटे विदेश में हैं। इस साल जून में वह भारत सरकार से निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। हिन्दी से उनका विशेष लगाव है। कहानियों, कविताओं, लेखों, संस्मरण और यात्रावृत्तांतों पर न जाने उनकी कितनी कृतियाँ प्रकाशित हुई हैं, मुझे ज्ञात नहीं है। हाँ, इतना मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि उनकी हर रचना स्त्रियों को ही समर्पित होती है। साहित्य जगत् की हर स्त्री उनका सम्मान करती है और ’’बडे सर‘‘ कहकर पुकारती है। मुझे भी साहित्य से लगाव है और यही लगाव मुझे उनके घर तक खींच ले जाता है। खाली समय में या कॉलेज से छुट्टी होने की स्थिति में, प्रायः मैं बडे सर के स्टडी रूम में, सिर्फ उनकी रचनाओं में ही अपने आपको और स्त्री जाति को खोजती रहती हूँ।
आज सुबह भी उनके स्टडी रूम में उनके नए कथा संग्रह ’औरत-एक चीख‘ को पढ रही थी। वे बाहर लॉन में बैठे थे। मैं एक चित्त हो पढती चली जा रही थी। स्त्री की वेदना, लज्जा, क्षमा, शील, प्यार, त्याग और बलिदान को शायद ही कोई इतनी अच्छी तरह उभार सकता था। मैं मन ही मन उनके लिए श्रद्धा से झुकती चली जा रही थी कि अचानक मुझे अपने कंधों पर कुछ भारी-भारी सा लगा फिर अचानक दो हाथ मेरे सीने पर सरकने लगे थे जिनका दबाव धीरे-धीरे मेरे सीने की गोलाइयों पर पडने लगा था। मैं सिहर गई थी। अचानक मेरे होठों से चीख निकल गई थी और मैं सिर्फ इतना ही कह पाई थी, ’’बडे सर आप‘‘ और उनका कथा संग्रह ’औरत-एक चीख‘ वहीं पटककर तेज-तेज कदमों से उनके स्टडी रूम से बाहर भागने लगी थी।




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