प्रदीप जिलवाने
बहुरूपिये
रामसिंह की चाय की गुमठी पर सुबह-शाम भीड आम बात है, नीम की घनी छाँव, बैठने के लिए लंबी-लंबी चेयर्स और सबसे मजेदार रामसिंह के हाथ की बनी चाय। भीड इसलिए भी की यह गुमठी आसपास एकमात्र चाय की गुमठी है। पीएचई, पीडब्ल्यूडी, आबकारी विभाग और टेलीफोन विभाग जैसे बडे महकमे वाले कार्यालयों के कर्मचारियों की बैठक यहीं तो लगती है। ऑफिस खुलने से पहले, लंच टाईम में और ऑफिस बंद होने के समय अक्सर कर्मचारियों का यहाँ जमावडा-सा लगा रहता है। कई कर्मचारी अक्सर रामसिंह की चाय के गुण भी गाते हैं।
’रामसिंह तुम्हारी चाय में तो जादू है।‘
’क्या चाय बनाते हो यार, मान गये।‘
लेकिन अब रामसिंह इस प्रशंसा का आदी हो चुका है। वह मुस्कुराभर देता है। प्रशंसा का एक कारण यह भी होता है कि ज्यादातर कर्मचारियों के या लगभग सभी के यहाँ खाते ही चलते हैं। महीने पर जब तनख्वाह मिलती है, रामसिंह का हिसाब भी चुकता होता है। यानी महीने की शुरुआत रामसिंह की भी चकाचक ही रहती है। लेकिन यहाँ हम रामसिंह की या उसकी चाय की कहानी नहीं कह रहे हैं। यह कहानी है हरिप्रसाद शर्मा की और देखा जाए तो यह कहानी शर्माजी की भी नहीं है। यह कहानी हमारे तुम्हारे समाज में छुपे उन बहुरूपियों की है जिनके घरों में जूते-चप्पलों और कपडों की तरह मुखौटे भी होते हैं। घर से बाहर निकलने से पहले जिन्हें वे लगाकर ही निकलते हैं। कभी कौनसा मुखौटा, कभी कौनसा, और कभी-कभार तो मुखौटे अवसर की नजाकत को देखकर पहने जाते हैं। यह कहानी नायकविहीन कहानी है। इसका मतलब यह नहीं कि कहानी में पात्र नहीं हैं पात्र भी हैं और पटकथा भी है। बस कहानी में कोई नायक नहीं है। अगर कोई नायक ही है तो वह है इस कहानी का विषय, तो फिर हम कहानी उसी चाय की गुमठी से शुरू करते हैं।
हरिप्रसाद शर्मा गुमठी पर आने वाले लगभग सभी ग्राहक इस नाम और इस नाम के शख्स से अच्छी तरह परिचित हैं। इसकी खास वजह भी है। एक तो वे रोज ही चले आते हैं दूसरी उनकी वाचालप्रवृत्ति। पिछले वर्ष ही पीडब्ल्यूडी से रिटायर हुए शर्माजी सुबह-शाम इसी गुमठी पर टाईम-पास करने चले आते हैं। उनका घर भी यहाँ से ज्यादा दूर नहीं है। बरसों तक शर्माजी पीडब्ल्यूडी के इसी ऑफिस में जमे रहे। इसलिए भी रामसिंह की चाय से उनका पुराना वास्ता है। पुराने सहकर्मी जो अभी रिटायर नहीं हुए शर्माजी को आदर से बाबूजी कहकर ही बुलाते हैं। शर्माजी की सबसे बडी खासियत तो यह है कि वे धनतंत्र से लेकर जनतंत्र तक और अगरतला से लेकर अमेरिका तक हर विषय में अच्छा ज्ञान रखते हैं। चर्चा का शायद ही ऐसा कोई विषय हो जो शर्माजी के ज्ञान से परे हो। उनकी इस प्रतिभा के सभी कायल भी हैं। आखिर वे सुबह-शाम पत्र-पत्रिकाओं की खाक यूँ ही तो नहीं छानते।
पहली दफा परिचित होने वाले लोग शर्माजी से प्रभावित हुए बिना नहीं हर सकते। शर्माजी जब किसी विषय में गंभीर एवं हाईलेवल की टिप्पणियाँ उनके संदर्भ सहित प्रस्तुत करते हैं तो लोगों के चेहरे पर उनके प्रभाव को स्पष्ट देखा जा सकता है। अपनी बातों का लोहा मनवाने का उत्साह भी शर्माजी के चेहरे से स्पष्ट झलकता है। यहाँ तक कि लोग उनसे प्रभावित हो उन्हें ’कंप्यूटर‘ तक कह देते हैं। खैर अंदर की बात यह भी है कि पीठ पीछे लोग उन्हें ’खबरीलाल‘ जैसे नामों से पुकारते हैं।
आज ही अख्ाबार की एक ख्ाबर पर प्रतिक्रिया देते हुए शर्माजी उग्र स्वर में बोले-’ऐसे लोगों को तो गोली मार देनी चाहिए जो अपनी बेटी जैसी बहुओं के साथ ऐसा बर्ताव करते हैं। उन्हें जिंदा जलाने की कोशिशें करते हैं। मेरा बस चले तो मैं ऐसे लोगों को जमीन में जिंदा ही गाड दूँ।‘ शर्माजी ने जब अपने जोशीले अंदाज में यह बात कही तो गुमठी पर चाय पीने आये कई कर्मचारियों ने उनकी बात पर अपनी सहमति में सिर हिलाया।
एक अन्य कर्मचारी ने कहा-’आप ठीक कह रहे हैं शर्माजी, ऐसे लोगों को तो भरे चौक पर जूते लगाना चाहिए और फिर फाँसी पर लटकाया जाना चाहिए।‘
शर्माजी उस कर्मचारी की बात खत्म होते ही दुगुनी शक्ति से बोले-’दहेज के ऐसे लालची भेडयों के लिए हमारे समाज में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। मैं तो कहता हूँ हमारे कानून को भी अधिक कठोर किये जाने की जरूरत है। ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।‘ अबकि बार दिये शर्माजी के इस वक्तव्य पर खूब वाहवाही मिली। कई साथी मित्रों ने उनके विचारों की प्रशंसा में तालियाँ बजा दीं। सुनने वाले शर्माजी के विचारों से अंदर तक प्रभावित दिख रहे थे। शर्माजी अपनी विजय पर खुश थे। आज फिर उन्होंने किला जीत लिया।
’कलमुँही, अपने बाप के घर से कुछ तो लाती, खाली हाथ आई है। शादी में भी कुल जमा चार बर्तन नहीं दिये थे। आखिर सरकारी स्कूल में मास्टर है, कोई भिखारी तो नहीं है तेरा बाप।‘ विमला दरवाजे के पास खडी अपनी सास की जली-कटी सुन रही है। अपने नाखूनों से दीवार खुरच रही है। आँखों से आँसुओं की लंबी धारा बहती जा रही है। सास के ताने एक के बाद एक बंदूक की गोली की तरह विमला की आत्मा को भेद रहे हैं। ’मरे ने ब्याह में मुझे साडी भी ऐसी दी, जैसी मुर्दों को ओढाते हैं। जरा देता तो अच्छी ही देता। मैं कौनसी उसके घर की साडयाँ रोज ओढती। पहले मालूम होता कि मास्टर नंगा है तो कभी न ब्याहती अपने किशन को ऐसे भिखमंगों के घर।‘ विमला के आँसुओं की धार लगातार बही जा रही है और वह उसी खुरची हुई दीवार पर अपनी पीडा का चित्र नाखूनों से खींचती जा रही है और अभी-अभी चाय की गुमठी पर लंबा-चौडा भाषण झाडकर आए शर्माजी अखबार की आड में चेहरा छुपाय चुपचाप बैठे हैं, जैसे उन्हें कुछ सुनाई ही न दे रहा हो। घ्
जहरीली मुस्कान
दैनिक समाचार-पत्र का सातवाँ पृष्ठ हमेशा की तरह अनुपमा ने सबसे पहले पढने के लिए खोला। नजरें उन्हीं विज्ञापनों पर सरपट दौड रही थी, जिनके शीर्षक पर लिखा होता ’आवश्यकता है‘ या ’वाक-इन-इंटरव्यू‘ और फिर कुछ चुने हुए विज्ञापनों को कलम से मार्क किया।
आर्थिक स्थिति से कुछ कमजोर किंतु संस्कारवान भारद्वाज परिवार में जन्मी अनुपमा ने अभी हाल ही में अपना ग्रेजुएशन पूरा किया और कंप्यूटर कोर्स भी। अब तलाश थी तो एक अदद नौकरी की बस। कारण यह भी कि अपने से बडी दो बहनों के होते अभी उसकी शादी भी नहीं हो सकती थी और पिताजी के रिटायर्ड होने से उसके लिए नौकरी कुछ जरूरी भी हो गई थी।
अनुपमा जल्दी-जल्दी तैयार हुई। सादे सलवार सूट और सामान्य साज-सज्जा के बावजूद खूबसूरत लग रही थी वह। विज्ञापन में अंकित एस.एस. इंटरप्राइजेज के पते को एक बारगी फिर पढा और अपने बॉयोडाटा और प्रमाण-पत्रों के प्रतिलिपियाँ की फाईल में व्यवस्थित रख लिया और चल पडी।
डायरेक्टर्स चेंबर के बाहर लगे सोफे पर १०-१२ लडकियाँ पहले से मौजूद थीं। अनुपमा भी आकर बैठ गई तभी उसकी नजर सामने सोफे पर बैठी मेघा पर पडी। मेघा और अनुपमा एक ही कॉलेज में थीं। बातों ही बातों में मेघा ने बताया कि वह पहले भी दो-तीन नौकरियाँ कर चुकी है। दोनों में कुछ देर तक हल्की-फुल्की औपचारिक बातें होती रहीं। थोडी देर बाद ही मेघा का नाम पुकारा गया। काफी देर बाद जब मेघा बाहर आई। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी चमक थी, होठों पर एक रहस्यमयी मुस्कुराहट। एक जहरीली मुस्कान जैसे कोई युद्ध अनुचित रीति से जीतने पर किसी योद्धा के चेहरे पर होता है। एक दो अन्य लडकियों के बाद अनुपमा को भी अंदर बुलाया गया। एक औपचारिक से साक्षात्कार के बाद उसे बताया गया कि यदि उसे चुना जाता है तो बॉयोडाटा में उल्लेखित फोन नंबर पर उसे सूचित कर दिया जाएगा। अनुपमा बाहर आ गई लेकिन उसके मस्तिष्क में अभी भी मेघा की वह जहरीली मुस्कान घूम रही थी। उसे थोडी देर के लिए सब कुछ धुँधला-धुँधला सा नजर आने लगा।
कुछ ही दिनों के बाद की तो बात है उस दिन सोमवार था जब मंदिर से लौटते समय मेघा रास्ते में उसे नजर आई। अनुपमा को देखते ही उसने बताया कि वह नौकरी उसे मिल गई थी और अभी वह ऑफिस ही जा रही है। अनुपमा एकटक मेघा के चेहरे को देखे जा रही थी। उसके मस्तिष्क में मेघा की वह रहस्यमयी जहरीली मुस्कान अब भी ताजा थी। वह मन ही मन सोच रही थी ’आखिर मेघा में ऐसा क्या है, जो मुझसे बेहतर है ? उसमें ऐसी कौनसी बात है जो उसे इतनी आसानी से इस पद के लिए चुन लिया गया और मेरे सर्टिफिकेट्स भी ध्यान से नहीं देखे गये।‘ मेघा जा चुकी थी। अनुपमा के जहन में दौड रहे सवाल एक जोरदार विस्फोट के साथ फूटते हैं जिसकी गूँज उसकी नस-नस को हिला देती है, लेकिन बाहर की दुनिया इसे कैसे सुन पाती। अगले दिन एक अन्य कंपनी के इंटरव्यू के लिए स्कीन टाईट कपडे पहने अनुपमा, जब घर से निकलती है तो उसकी आँखों में वही रहस्यमयी जहरीली मुस्कान होती है जो उसे कभी मेघा के चेहरे पर नजर आई थी और यह मुस्कान फैलकर उसकी आँखों में उतर जाती है।