समीक्षक जितेन्द्र निर्मोही, साहित्यकार, कोटा
पिछले दशक सहित इन पांच वर्षों में खासकर इन पांच वर्षों में हाड़ौती अंचल में राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर पर बहुत नवाचार हुए हैं। राजस्थानी भाषा और हिंदी साहित्य दोनों में लगोलग शोधकार्य भी हुए हैं और समीक्षात्मक दृष्टिकोण से भी गुणात्मक, मूल्यपरक समीक्षाएं सामने आई है। 2014 में मधु आचार्य जी ने मुझसे कहा था " जितेन्द्र जी हाड़ौती अंचल शोध और समीक्षात्मक दृष्टि से अभी बहुत पीछे है"। मैंने कहा " आपको जल्दी ही परिणाम दिखाई देंगे"। इन दिनों डा. प्रभात सिंघल जी की सद्य प्रकाशित विनिबंध कृति " कथाकार एवं समीक्षक विजय जोशी - कथा संवेदनाएं और समीक्षा के पथ" सामने आई है। डॉ. प्रभात सिंघल का समीक्षात्मक कर्म " जियो तो ऐसे जियो", "नारी चेतना की साहित्यिक उड़ान", और " राजस्थान के साहित्य साधक" कृतियों से हमारे सामने है, इन कृतियों ने प्रादेशिक ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। इसके बाद उनकी सतत काव्य संग्रहों पर और बाल साहित्य पर समीक्षाएं सामने आती है, और पहचान पाती है। विद्वानों का कहना है हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने समीक्षा कर्म से कबीर को पहचान दी है, पिछले वर्षों में डा. नीरज दहिया ने जिस तरह से राजस्थानी भाषा साहित्य से जुड़े छुपे हुए हीरों को पहचान दी है।वो किसी से छुपा हुआ कहां है। डॉ. प्रभात सिंघल ने वही काम किया है, उन्होंने इस अंचल को राष्ट्रीय स्तर के साहित्यकारों को समझने का अवसर दिया है।
जहां तक इस कृति का प्रश्न है मैं उनके श्रम साध्य कार्य का प्रशंसक हो गया हूं। हां उनका सम्पादक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल लिखना उचित नहीं यह एक शोध कार्य जैसा है बहुत कुछ समेटकर लाया जा रहा है लेकिन कुशलता से यह लेखकीय क्षमता है। शोध कार्य करने वाले सम्पादक कहां लिखते हैं। वह भी कुशल लेखकीय संयोजन है और यह भी कुशल लेखकीय संयोजन है।
जिस तरह इस कृति में अध्यायों को बांटा गया है वह लाजवाब है। एक सौ बानवै पेज़ की कृति में लेखक का कथा साहित्य, समीक्षा साहित्य, आलेख, पुरस्कार और सम्मान साक्षात्कार सहित समेटकर सामने लाना कुशल लेखकीय क्षमता को बताता है। सम्पादन -खंड में कथा शिल्पी और समीक्षक विजय जोशी अपने आप में एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
सृजन खंड में दो उपन्यास क्रमशः " चिखते चौबारे"और "रिसते हुए रिश्ते" के कुछ अंश उध्दरित कर संपादक ने साहित्यकार के उपन्यास लेखन के कोशल को बताया है। कहानी खंड में यहां चयनित कहानियां - अंतर्द्वंद्व, केनवास के परे, युगबोध, कुहांसे का सफर,आस का पंछी सामने लाई गई है। इनमें विजय जोशी का चित्रकार, संगीतज्ञ,लोक पक्ष और सामाजिक सरोकारों का पक्ष शिद्दत से सामने आता है। कथेत्तर साहित्य में विजय जोशी के महत्वपूर्ण आठ आलेख है जिनमें समीक्षा पक्ष समाहित है। शोध समीक्षा अंतर्गत विजय जोशी का कथाकार प्रहलाद सिंह की कथाओं को लेकर कथ्य और शिल्प की बात की है जो सामने है। अंत में विजय जोशी का जीवन वृत्त है।
यूं तो अकादमियां साहित्यकारों पर मोनोग्राम, हमारे पुरोधा जैसी कृतियां निकालती है, पर ईमानदारी से कितने लोग काम करते हैं। डॉ. सिंघल का यह कार्य श्रमसाध्य है। मुझे आदरणीय रघुराज सिंह हाड़ा पर निकला मोनोग्राम जो डॉ राजेश शर्मा ने लिखा है याद आता है। मैं कहूं वो मोनोग्राम रघुराज सिंह हाड़ा समग्र का संक्षीप्तिकरण है। उदयपुर अकादमी ने मुझे आदरणीय बलवीर सिंह अरुण पर मोनोग्राम लिखने को दिया था उसे भी देखा जा सकता है।
कुल मिलाकर यह कृति " विनिबंध: कथाकार और समीक्षक विजय जोशी कथा संवेदनाएं और समीक्षा के पथ ---" एक महत्वपूर्ण और संग्रहणीय कृति है। इस कृति से विजय जोशी का कथा संसार और समीक्षा कर्म समझा जा सकता है। कृति की उपादेयता तो लगभग एक दशक बाद समझी जाती है। आशा है कृति के माध्यम से डॉ. प्रभात सिंघल एक समीक्षकीय विमर्श समीक्षकीय चेतना जागृत करने में सफल होंगे। उन्हें असीम बधाईयां एवं शुभकामनाएं।