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संस्कृत भाषा न तो कठिन है और न ही जटिल – शर्मा 

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20 Feb 26
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संस्कृत भाषा न तो कठिन है और न ही जटिल – शर्मा 

उदयपुर। “नैव क्लिष्ट नैव कठिना — संस्कृत भाषा न तो कठिन है और न ही जटिल।”
यह बात संस्कृत भारती के विभाग सह संयोजक नरेंद्र शर्मा ने शुक्रवार को यहां सूरजपोल स्थित निंबार्क एसटीसी महाविद्यालय परिसर में प्रारंभ हुए दस दिवसीय संस्कृत संभाषण शिविर में मुख्य उद्बोधन में कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपरा की आत्मा है। यह प्रकृति, संस्कृति और नैतिक मूल्यों से जोड़ने वाली कड़ी है। उनके अनुसार संस्कृत देववाणी है और इसके प्रयोग मात्र से व्यक्ति के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास संभव है। यदि जनमानस इसे व्यवहार में लाए तो सामाजिक समरसता और नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना सहज हो सकती है। उन्होंने विद्यार्थियों से संस्कृत के अधिकाधिक प्रयोग और प्रचार-प्रसार का आह्वान किया।
संत परंपरा की पावन धारा में संस्कृत को प्रमुख स्थान दिलाने और उसे जन-जन की व्यवहारिक भाषा बनाने के संकल्प के साथ संस्कृत भारती, उदयपुर की ओर से शहर में इसी सप्ताह में यह दूसरा दस दिवसीय शिविर लगाया गया है। बीते सोमवार को ही राजकीय वरिष्ठ उपाध्याय संस्कृत विद्यालय, सविना खेड़ा में भी दस दिवसीय संस्कृत संभाषण शिविर शुरू हुआ था। 
शिविर का औपचारिक उद्घाटन निंबार्क शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय के प्राचार्य हनुमान प्रसाद शर्मा, निंबार्क एसटीसी महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. माया खंडेलवाल, उपप्राचार्य पंकज पारीक तथा संस्कृत भारती, उदयपुर के विभाग सह संयोजक नरेंद्र शर्मा के सान्निध्य में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर अध्यापक मधुबाला जैन एवं दयाशंकर सहित महाविद्यालय परिवार की उपस्थिति ने आयोजन को गरिमा प्रदान की।
कार्यक्रम का शुभारंभ ध्येय मंत्र से हुआ, जिसे छात्रा सरोज कुमावत ने प्रस्तुत किया। इसके पश्चात परी व्यास, खुशबु जोशी एवं सरोज कुमावत ने सामूहिक सरस्वती वंदना प्रस्तुत कर वातावरण को पूर्णतः संस्कृतमय बना दिया। उद्घाटन अवसर पर अतिथिगणों एवं साथियों ने संस्कृत के स्वागत का सामूहिक संकल्प भी लिया।
निंबार्क बी.एड. महाविद्यालय के प्राचार्य हनुमान प्रसाद शर्मा ने कहा कि संस्कृत हमारी सांस्कृतिक जड़ों का आधार है और महाविद्यालय की ओर से इसके उन्नयन एवं प्रसार के लिए हरसंभव सहयोग प्रदान किया जाएगा। उन्होंने विद्यार्थियों को संस्कृत संभाषण से जुड़कर अपनी परंपरा से परिचित होने की आवश्यकता पर बल दिया और संत परंपरा की पुण्य धारा में संस्कृत के समावेश को समाज के लिए दिशा प्रदायक बताया।
ज्ञातव्य है कि संस्कृत भारती द्वारा निरंतर विभिन्न स्थानों पर दस दिवसीय संस्कृत संभाषण शिविर आयोजित किए जा रहे हैं। प्रतिदिन दो घंटे संचालित इन शिविरों में खेल, संवाद, गीत और विविध गतिविधियों के माध्यम से सरल एवं व्यवहारिक पद्धति से संस्कृत बोलना सिखाया जाता है। उद्देश्य संस्कृत को केवल शास्त्रीय अध्ययन तक सीमित न रखकर उसे जनमानस की व्यवहारिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करना है। शिक्षक विस्तारक गौरव साहू ने बताया कि एक वर्ष में ऐसे 51 शिविरों के आयोजन का संकल्प है। 
 


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