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ऐसा देश है मेरा/ साहित्य : डॉ.युगल सिंह का बाल साहित्य पर बड़ा काम.....

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27 May 24
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डॉ.प्रभात कुमार सिंघल, कोटा

ऐसा देश है मेरा/ साहित्य : डॉ.युगल सिंह का बाल साहित्य पर बड़ा काम.....

...

कांटों को फूल समझ, घबराना नहीं ,

चलते ही रहना ,रुक जाना नहीं ,

चलना अकेले हैं ना मेले, ना ठेले हैं , 

ना कोई आस है ना कोई पास है,

पांव में छाले हैं धूप में पाले हैं, कुछ रिश्ते टूटे हैं, कुछ पीछे छूटे हैं।

उनके श्रापों से डर जाना नहीं ,

मर जाना नहीं, चलते ही रहना.....

जीवन में आए कांटों को फूल समझ,अकेले ही चलना है, रिश्तें पीछे रह जायेंगे, श्राप भी मिलेंगे पर घबराना नहीं है और चलते ही रहना है। संकटों का सामना कर आगे बढ़ने का खूबसूरती से संदेश देती कविता आशाएं जगती हैं, होंसला बढ़ाती है। यह सृजन रचनाकार डॉ.( श्रीमती ) युगल सिंह का अत्यंत प्रेरणात्मक गीत है। समाज में आत्मघात की प्रवृति पर ऐसी ही संदेश परक रचना "आत्मघात नहीं है समाधान" की बानगी देखिए जिसमें वे किस प्रकार आत्मघात जाने वालों का मनोबल बढ़ाने का संदेश देती हैं..................

एक कागज परीक्षा का ,

तुझे असफल नहीं कर सकता, जीवन की परीक्षा में।

मत हो हताश,अभी राहे और भी है।

मत हो निराश,,अभी इम्तिहान और भी है।

चल उठ बड़ा कदम ,

मृत्यु पर पा विजय ,साहस के साथ। 

जीवन ना मिलेगा दुबारा।

भाग्य में लिखा भी बदल जाएगा, परिश्रम से।

 हिम्मत से रखनी है, तुझे भविष्य की बुनियाद। आत्मघात नहीं है कोई समाधान, स्वयं को नई दिशा कर प्रदान। 

असफलता सफलता का प्रथम सोपान है ,

कर पुनरावृति ,अन्यथा घेर ना ले तुझे अवसाद,चक्रव्यूह के समान। 

बाधाओं पर कर प्रहार ,मान मत अपनी हार ।

सत्य को कर अंगीकार ,जीवन नहीं है भार ।

आत्मघात नहीं है कोई समाधान।

सामाजिक समस्याओं के प्रति चेतना जगाती रचनाकार पर्यावरण के प्रति भी कितनी संवेदनशील हैं "सरिता " अर्थात एक नदी को केंद्र बिंदु मान कर बेजान धरा को तृप्त करती है,जन - जन की प्यास बुझती है, मालिन करने पर क्रोधित होती है और पुकारती हे मानव मुझे मैला मत कर वरना जब तू पानी बोतल की जगह इंजेक्शन से पिएगा, नदी की व्यथा और घटते पेयजल संकट को भावपूर्ण शब्दों में अभिव्यक्त करती हैं कुछ इस तरह............

मैं सरिता हूं ,निर्मल शीतल

अनवरत गतिमान ।

पर्वतों का सीना चीरकर,

तृप्त करती हूं धरा बेजान।

साथ ही जन-जन की तृष्णा को,

निस्वार्थ निशुल्क ।

मानव धृष्टता पर अश्रु बहाती हूं, आंखें मींचती, होंठ भिंचती हूं। 

एक ओर मानव है, नित्य मलिन करता है मुझे।

तनिक लज्जा नहीं आती उसे,

कितने पाप धोऊंगी मैं अब उसके। 

डरती हूं कहीं सूख न जाए मेरी छाती ,

क्या होगा जब नीर विहीन  हो जाएगी मानव जाति ?

मत कर मैला मुझे ,

मैं सतत पयस्विनी बन ,

दूंगी वरदान तुझे ,

अन्यथा आज जो पानी बोतल के रूप में मिलता है तुझे,

कल मिलेगा इंजेक्शन के रूप में तुझे।

संभल जा अभी भी।

वरना बीता वक्त नहीं आएगा कभी भी ।

 मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने वाली रचनाकार हिंदी,राजस्थानी , हाड़ोती, उर्दू भाषाओं में गद्य और पद्य विधाओं में कविता, संस्मरण, लघु कथा, छंद, मुक्तक , ग़ज़ल और कहानी आदि विधाओं में निरंतर लेखन रत हैं।

श्रृंगार, शांत, हास्य, ओज रस इन्हें विशेष प्रिय है। इनकी कविताएं समसामयिक विषयों पर, प्रेरणात्मक ,प्रकृति एवं हमारे त्यौहार एवं भारतीय संस्कृति का उद्घोष करने वाली हैं।

अपनी कविताओं के माध्यम से ये नारी शक्ति ,भारतीय संस्कृति का पुनः उत्थान, समनता, सहिष्णुता भाईचारा,अपनत्व,राष्ट्रीय एकता, देश प्रेम एवं समाज को नई दिशा देने का सकारात्मक प्रयास करती हैं। कॉलेज के समय में महादेवी वर्मा, तुलसीदास,प्रेमचंद, सुमित्रानंदन पंत, निराला,मैथिली शरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर से बहुत प्रभावित थी और कुछ ना कुछ लिखती रहती थी। कोटा के साहित्यकार जितेंद्र जी निर्मोही की प्रेरणा से इनके लेखन कार्य ने गति पकड़ी। 

"सांप्रदायिक सद्भाव " की हामी रचनाकार ने कितनी खुबसूरती से भावपूर्ण शब्दों में अभिव्यक्ति दी है अपने मन की भावनाओ को जो समाज की जीती जागती तस्वीर बयां करती है, और सोचने को मजबूर करती है............ 

सांप्रदायिक सद्भाव किस चिड़िया का नाम है, क्या आपको पता है?

पहले गांव में किसी एक पर संकट आता था, तो सारा गांव सहयोग करने उमड़ पड़ता था,

पहले किसी गरीब की बेटी सारे गांव की बेटी होती थी, पर आज....?

किस पर करें विश्वास?

जब माली ही चमन उजाड़ने पर उतारू हो,तो गुलों का रखवाला कौन?  

आज सड़क पर एकाकी चलना डराता क्यों है?

हर शख्स कातिल नजर आता क्यों है ?

हर हाथ में खंजर है, कैसा यह मंजर है? मन हो गए बंजर है !

मूक हुआ गजर क्यों है?

क्या यही राम ,रहीम ,कबीर ,रसखान की भूमि है?

वह भाईचारा, सहिष्णुता, सदाशयता, शर्म ओ हया, लोक-लज्जा कहां हवा हो गई?

आज मंदिर में कम और मॉल में ज्यादा नजर आते क्यों हैं?

आज लापसी खीर हलवा मुंह चिढ़ाते क्यों है? पिज़्ज़ा बर्गर पास्ता लुभाते क्यों है? 

बेटियों की लाश कभी तंदूर, कभी फ्रिज, कभी जंगल में मिलती क्यों है?

क्या यही मेरा देश है?

सांप्रदायिक सद्भाव के साथ " प्यारा भारत देश" कविता में देश प्रेम की भावना को बलवती बनाने के लिए कितना सुंदर संदेश दिया है, बानगी देखिए...................

आओ मिलकर प्यारा भारत देश बनाएं ,

आर्यावर्त में सद्भाव की सरिता बहाएं ।

निर्झरों को सहिष्णुता का संगीत सुनाएं,

राष्ट्रीय एकता के नए सेतु बनाएं।

माना कंटकाकीर्ण है पथ हमारा,

आओ बंधु मिलकर इस पर पुष्प बिछाएं ।

मान भी जाओ व्यर्थ है मुर्दाबाद का नारा,

मिलकर वसुधैव कुटुंबकम को अपनाये।

यह मेरा यह तेरा व्यर्थ झगड़ना भाई,

मानवता का हर अंतस में दीप जलाएं।

सुख शांति अमन हो नारा हमारा, आओ एक बार फिर से दोहराएं।

नवयुग की नव रोशनाई बने हम, सकारात्मक एवं भावात्मकता का इतिहास रचाये।

निर्मल हृदय कर वैमनस्यता का मैल हटाए,

हंसी-खुशी से नाचे गाए ढोल बजाए।

      इन्होंने ऐसे ही विषयों पर दरकते रिश्ते, नारी स्वातंत्र्य, युवाओं की हताशा ,बालको में घर करती निराशा,मोबाइल में खोता उनका बचपन आदि अनेक कहानियां लिखी हैं। कुछ संस्मरण एवं यात्रा वृतांत भी लिखें हैं। उपन्यास लिखने की भी इनकी योजना है। 

    पीएच.डी. के लिए अपने शोध प्रबंध

"हाडोती अंचल के बाल साहित्यकार" विषय पर शोध कर महत्वपूर्ण साहित्यिक सेवा की हैं। इसमें 17 बाल साहित्यकारों के बाल सृजन के विविध पक्षों सामाजिक चेतना, पर्यावरणीय चेतना, राष्ट्रीय, साहित्यिक, सामाजिक चेतना, बाल साहित्य में चेतनाओं के विविध रूप और बाल साहित्यकारों का कृतित्व, व्यक्तित्व, मूल कथ्य और संवेदना के साथ - साथ राष्ट्रीय और हाड़ोती के बाल साहित्यकारों का तुलनात्मक अध्ययन को शामिल किया है। निष्कर्ष निकला है कि हाड़ोती में वेविध्यपूर्ण बाल साहित्य का खूब सृजन हो रहा है पर यहां के साहित्यकारों को वह स्थान नहीं मिल पा रहा है जो मिलना चाहिए और न ही सृजित बाल साहित्य बच्चों की पहुंच में है। सृजन का पूरा लाभ तब ही माना जाएगा जब ये बच्चों तक पहुंचे। बच्चों तक सृजित साहित्य पहुंचाने के लिए उपाय भी सुझाए हैं। हाड़ोती अंचल के साहित्य के क्षेत्र में युगल सिंह का बाल साहित्य पर यह अध्ययन निश्चित ही आने वाले समय में मार्ग दर्शक सिद्ध होगा ऐसी आशा कर सकते हैं। यह शोध प्रबंध प्रकाशनाधीन है। इस शोध का उपसंहार हाल ही में लखनऊ से डॉ.सुरेंद्र विक्रम सिंह एवं डॉ  नागेश पांडे ने मंगवाया है। राष्ट्रीय स्तर के बाल साहित्य में उसे सम्मिलित करने की उनकी योजना है। सद्य प्रकाशित ' श्री राम चरित्र वर्णन ' पुस्तक का सह संपादन भी इन्होंने किया है।

परिचय 

हाड़ोती के बाल साहित्य में शोध करने वाली रचनाकार डॉ.युगल सिंह का जन्म  19 सितंबर 1958 को पिता स्व. महावीर प्रसाद पंचोली एवं  माता स्व. सुशीला देवी पंचोली के आंगन में कोटा में हुआ। आपने हिंदी साहित्य,संस्कृत, राजनीति विज्ञान और अंग्रेजी विषयों में एम. ए., बीएड, एमएड तक शिक्षा प्राप्त कर पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के पत्र - पत्रिकाओं में इनके

संस्मरण, कविताएं ,बाल कविताएं प्रकाशित हुई हैं। विभिन्न राष्ट्रीय और स्थानीय संस्थाओं, ऑन लाइन काव्य मंचो से जुड़ी हैं और काव्य पाठ करती हैं। कई बार विभिन्न संस्थाओं द्वारा आपको पुरस्कृत और सम्मानित भी किया गया है। अध्ययन, अध्यापन, काव्य पाठ, गायन,मंच संचालन और साहित्य सृजन में आपकी अभिरुचि है।आप एक निजी शिक्षण संस्थान में प्रधानाचार्य पद पर सेवारत हैं। चलते - चलते..........

एक कागज का टुकड़ा, (प्रश्न पत्र)निर्णायक नहीं है तेरे जीवन का ,

नहीं कर सकता वह तेरे जीवन का अंत,

चल उठ अभी तो अवसर हैं अनंत,

जिंदगी ना मिलेगी दुबारा,

तुझ में समाहित है दैवीय शक्तियां तू क्यों परिस्थितियों से हारा?

संपर्क :

199 शास्त्री नगर, दादाबाड़ी,

 कोटा 324009( राजस्थान )

मोबाइल :82090 47043

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