राजस्थान विद्यापीठ के संघटक स्कूल ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज की ओर से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद - भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान हैदराबाद के सौजन्य से विद्यार्थियों के लिए तिलहनी फसलें, कृषि अवशेष एवं लैंटाना खरपतवार से बायोचार निर्माण विषय पर आयोजित पांच दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का समापन कृषि भवन के सभागार में हुआ।
मुख्य अतिथि कुलपति प्रो. शिवसिंह सारंगदेवोत ने कहा कि जल्द एवं अधिक पैदावार लेेने के कारण रासायनिक खादों का भरपुर उपयोग किया जा रहा है जिसके कारण आमजन में नितनयी बिमारी हो रही है। हमें पुनः परम्परागत खेती की ओर लौटना होगा और आधुनिकता के साथ परम्परागत खेती का समावेश करना होगा। इसके लिए केन्द्र एवं राज्य सरकारों योजनाए जारी की है जिसका किसानों को अधिक से अधिक लाभ उठाने की जरूरत है। जिस पर सब्सिडी भी दी जा रही है। ये शिविरकृषि अवशेष प्रबंधन, बायोचार निर्माण, जैविक खेती एवं टिकाऊ कृषि प्रणाली की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। कई किसान परम्परागत खेती की बढती लागत और कम मुनाफे से परेशान होकर आधुनिक तकनीक का सहारा ले रहे है और अपने खेतों में पाॅली हाउस लगाकर सब्जियों की खेती कर रहे है जिससे उन्हे अच्छी आमदनी हो रही है।
अध्यक्षता करते हुए भंवर लाल गुर्जर ने कहा कि जैविक खेती आज की आवश्यकता बताते हुए कहा कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की सेहत गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है। किसानों को इससे बचने के लिए जैविक एवं प्राकृतिक विकल्प अपनाने चाहिए।
प्रशिक्षण के नोडल अधिकारी डॉ. आई. जे. माथुर ने कहा कि वर्तमान समय में मृदा प्रदूषण एक गंभीर वैश्विक चुनौती बन चुका है। बायोचार, कम्पोस्ट एवं अन्य जैविक तकनीकें मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और प्रदूषण कम करने में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो रही हैं।
विशिष्ट अतिथियों डॉ. युवराज सिंह राठौड, डॉ. डी. पी. सिंह ने भी प्रशिक्षुओं को बायोचार तकनीक को फसल प्रबंधन और कृषि उत्पादकता में अत्यंत उपयोगी बताते हुए इसके नियमित उपयोग पर बल दिया।
संचालन डॉ. सौरभ राठौड़ ने किया, जबकि आभार डॉ. एन. एस. सोलंकी ने जताया।