विद्यापीठ - विश्वविद्यालय का 40 वा स्थापना दिवस हर्षोल्लास मनाया।

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Published on : 12 Jan, 26 18:01

विद्यापीठ - विश्वविद्यालय का 40 वा स्थापना दिवस हर्षोल्लास मनाया।

उदयपुर /सिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद ने अपने उद्बोधन की शुरूआत में कहा कि दुनिया भर से मारे, पिटे, भगाये गये लोगो का आसरा कोई बनी तो वह भारत की भूमि है और वहॉ का मैं प्रतिनिधित्व करता हॅू। भारत सदैव विश्व कल्याण की भावना ले कर चलता है। हमारे यहॉ तो मंदिर का पुजारी भी पुजा के बाद बोलता है कि धर्म की जय हो, अधर्म का  नाश हो, प्रणियों में सदभावना हो और अंत में बोलते है विश्व का कल्याण हो। भारत हमेशा विश्व कल्याण की बात करता है किसी का विरोधी नहीं हो सकता। वो सही अर्थो में आज का हिन्दुत्व है।  विश्व पटल पर भारत को लेकर व्याप्त भ्रांतियों तथा देश की शैक्षिक और वैज्ञानिक प्रगति के प्रति फैली अनभिज्ञता को दूर करने का ऐतिहासिक कार्य स्वामी विवेकानंद ने किया। उन्होंने भारतीय सनातन संस्कृति और जीवन मूल्यों के माध्यम से भारत की वैश्विक छवि को सुदृढ़ किया। मानवता को केंद्र में रखते हुए स्वामी विवेकानंद ने ‘दरिद्रनारायण की सेवा’ को ही ईश्वर सेवा बताया और यह स्पष्ट किया कि भारत की आत्मा धर्म और अध्यात्म में निहित है।

समाज परिवर्तन से आयेगा बदलाव - निम्बाराम

निम्बाराम ने कहा कि सत्ता के बल पर परिवर्तन नहीं आ सकता, सत्ता अनुकूल रहनी चाहिए प्रतिकुल नही होनी चाहिए। साधक हो बाधक न हो, परिवर्तन समाज बदलने से आयेगा। हर व्यक्ति को समाज में अपनी भूमिका अदा करनी होगी जिसकी शुरूआत आने आप से व अपने घर से करनी होगी। 2027 में विकसित भारत में मेरी क्या भूमिका है इस पर विचार करना होगा।
 
मातृभूमि को सर्वोपरि मानते हुए उन्होंने राष्ट्रप्रेम के साथ तकनीकी और वैज्ञानिक विकास को समावेशी रूप देने का संदेश दिया तथा एक उन्नत, सशक्त और आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना प्रस्तुत की। संस्कारों, भारतीय मूल्यों और धर्मयुक्त स्वदेशी विचारों से समृद्ध भारत के निर्माण का उनका यह स्वप्न आज भी अधूरा है, जिसे पूर्ण करने की जिम्मेदारी हम सभी की है।
उक्त विचार सोमवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्रीय प्रचारक निंबाराम ने राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के 40वें स्थापना दिवस पर एग्रीकल्चर महाविद्यालय के कृषि भवन में आयोजित  समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किए।
निंबाराम ने कहा कि भारत युवाओं का देश है और नरेंद्र से विवेकानंद बनने की यात्रा में राजस्थान की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद की ऐतिहासिक सहभागिता और भारत के गौरवपूर्ण प्रतिनिधित्व का उल्लेख किया।

युवाओं को रोजगार लेने वाला नहीं , रोजगार देने वाला बनाने की जरूरत - निम्बाराम

उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के आधार पर स्वावलंबन की दिशा में कार्य करना आज की प्रमुख आवश्यकता है। बेरोजगारी की समस्या के समाधान हेतु श्रम के प्रति श्रद्धा विकसित करना आवश्यक है। युवाओं में स्वबोध और स्वावलंबन के विचारों का बीजारोपण कर, उन्हें कौशलयुक्त बनाकर ही विकसित और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण संभव है। युवाओं को रोजगार लेने वाला नहीं , रोजगार देने वाला बनाना होगा।

स्वामी विवेकानंद के विचारों का संदर्भ देते हुए निंबाराम ने युवाओं से राष्ट्र प्रतीकों, राष्ट्रीय गणों, महापुरुषों और संविधान के प्रति सम्मान बनाए रखने का आह्वान किया।
उन्होंने सामाजिक समरसता पर बल देते हुए कहा कि छुआछूत जैसी कुरीतियों के उन्मूलन के लिए तथाकथित बड़ों को विनम्रता के साथ आगे आना होगा तथा पिछड़े वर्गों को आत्मग्लानि से मुक्त होकर समाज निर्माण के प्रयासों में सहभागी बनना होगा। आज औपनिवेशिक मानसिकता और भौतिकतावाद के प्रभाव में हम अपने ही महापुरुषों को विभाजित कर रहे हैं, जो चिंताजनक है।
निंबाराम ने प्राचीनता और आधुनिकता के समन्वय, समरसता और सद्भाव, विविधता और एकात्मकता के विचारों को अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्र निर्माण केवल बड़े प्रयासों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे कार्यों के माध्यम से प्रत्येक नागरिक की सहभागिता से संभव है।
समाज परिवर्तन के लिए परिवार को केंद्र में रखते हुए कुटुंब प्रबोधन, संवाद की संस्कृति, मातृभाषा के प्रति सम्मान और उसके प्रयोग को अपनाकर ही आज का युवा पुनः राष्ट्र निर्माण में प्रभावी भूमिका निभा सकता है।

पंच परिवर्तन से ही होगा सशक्त और आत्मनिर्भर भारत का मार्ग प्रशस्त - प्रो. सारंगदेवोत

प्रारंभ मंे अतिथियों का स्वागत करते हुए एवं विषय प्रवर्तन पर अपनी बात रखते हुए कुलपति
कुलपति प्रो. शिवसिंह सारंगदेवोत ने कहा कि स्थापना दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि विचार, मूल्यों, राष्ट्र चिंतन और राष्ट्र प्रेम के भाव पर मनन करने का महत्वपूर्ण दिवस है। यह जनुभाई के चार दशकांे की यात्रा पूरी होने का उत्सव है।
जनुभाई ने 21 अगस्त, 1937 को संस्थान की नींव रखी थी और 50 वर्ष बाद 12 जनवरी 1987 को विश्वविद्यालय के रूप में क्रमोनत हुआ। उनका ध्येय केवल शिक्षा या साक्षर करने का न रह कर , संस्कारित शिक्षा देने का रहा। जनुभाई का ध्येय वाक्य है सरस्वती देवयंतों हवन्तं, हम ऐसी शिक्षा दे जिससे युवाओं में देवत्व, मनुष्यत्व जागृत हो।
उन्होंने कहा कि राष्ट्र का निर्माण नागरिकों के आचरण से होता है, जिसे ‘पंच परिवर्तन’ के माध्यम से दिशा और मार्गदर्शन प्राप्त होता है। पंच परिवर्तन में स्वदेशी एवं आत्मनिर्भरता, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, नागरिक कर्तव्य बोध तथा पारिवारिक संस्कार जैसे मूल तत्व शामिल हैं।
प्रो. सारंगदेवोत ने कहा कि राष्ट्र निर्माण बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से प्रारंभ होने वाली एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें नागरिक चेतना की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। चेतन और जागरूक नागरिक ही सशक्त राष्ट्र निर्माण की आधारशिला होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बड़े परिवर्तन छोटे-छोटे संकल्पों से ही मूर्त रूप में सामने आते हैं।
उन्होंने विचारों, भाषा और आचरण में स्वच्छता के साथ-साथ मूल्यों से युक्त सोच की आवश्यकता पर बल दिया। कुलपति ने कहा कि जब तकनीक के साथ मूल्य और विकास के साथ सेवा को जोड़ा जाएगा, तभी हमारे युवा गौरवशाली भारत के निर्माण में प्रभावी योगदान दे सकेंगे।

प्रगति एवं परिवर्तन का आधार शिक्षा - प्रो. सोडाणी

विशिष्ट अतिथि प्रो. कैलाश सोडाणी सलाहकार राज्यपाल उच्च शिक्षा ने  स्थापना दिवस पर विद्यापीठ की विकास यात्रा, परंपरा और नवाचार  अपनाने के लिए सराहना की। उन्होंने  कहा कि युवा दिवस के मौके पर स्वामी विवेकानंद  ने भारतीय संस्कार, ज्ञान और संस्कृति को पूरे विश्व के सामने रख कर राष्ट्र गौरव का प्रभाव सभी को दिखाया। प्रगति एवं परिवर्तन का आधार शिक्षा है। शिक्षा की साख ही है देश में शिक्षण संस्थानों की बढ़ती संख्या हमारी प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर रही है। भारतीय ज्ञान और भारतीय इतिहास के साथ व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा के मध्य भारतीय चिंतन और स्वास्थ्य परंपराओं को विद्यार्थियों और युवाओं तक पहुंचाने की आवश्यकता बताया।
प्रो. सोडाणी ने अपने उद्बोधन में राजस्थान विद्यापीठ की स्थापना से लेकर वर्तमान तक की विकास यात्रा, उसकी परंपराओं तथा नवाचार को अपनाने की प्रवृत्ति की सराहना की। उन्होंने कहा कि युवा दिवस के अवसर पर स्वामी विवेकानंद ने भारतीय संस्कारों, ज्ञान और संस्कृति को विश्व मंच पर प्रस्तुत कर राष्ट्र गौरव की भावना को सशक्त किया।
प्रो. सोडाणी ने कहा कि प्रगति और परिवर्तन का आधार शिक्षा है। शिक्षा की सुदृढ़ता ही किसी राष्ट्र की पहचान होती है। देश में शिक्षण संस्थानों की बढ़ती संख्या हमारी विकास यात्रा को आगे बढ़ाने का कार्य कर रही है। आजादी के समय सिर्फ 22 विश्वविद्यालय थे आज 1150 है इसी आधार पर भारत चौथी से तीसरी महाशक्ति बनने जा रहा है।
उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा और भारतीय इतिहास के साथ-साथ व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता बताते हुए कहा कि भारतीय चिंतन और स्वास्थ्य परंपराओं को विद्यार्थियों और युवाओं तक प्रभावी रूप से पहुंचाना समय की मांग है।

समर्पित कार्यकर्ताओं की बदौलत विद्यापीठ इस मुकाम पर - भंवर लाल गुर्जर

अध्यक्षता करते हुए कुल प्रमुख एवं कुलाधिपति भंवरलाल गुर्जर ने विश्वविद्यालय की स्थापना, उसके उद्देश्य और वर्तमान तक की विकास यात्रा को रेखांकित करते हुए कहा कि विपरित परिस्थितियों आजादी के आंदोलन के पूर्व 1937 में संस्थापक जनुभाई ने विद्यापीठ की स्थापना की जब पढना, पढाना अपराध माना जाता था। 1987 में पांच पाठ्यक्रमों से शुरू इस विश्वविद्यालय में वर्तमान में 100 से अधिक पाठ्यक्रम चल रहे है और सभी युजीसी से मान्यता प्राप्त है।  उन्होंने विद्यापीठ की उन्नति का श्रेय नेतृत्व के साथ-साथ समर्पित कार्यकर्ताओं को देते हुए कहा कि सामूहिक प्रयासों से ही संस्थान निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर है।
उन्होंने आने वाले समय में विद्यापीठ को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए सभी कार्यकर्ताओं से समर्पण भाव से कार्य करने का आह्वान किया।

समारोह में समाजसेवी हिम्मत सिंह झाला, पीठ स्थविर डॉ. कौशल नागदा, रजिस्ट्रार डॉ. तरूण श्रीमाली ने भी अपने विचार व्यक्त किए और विद्यापीठ के शैक्षिक व सामाजिक योगदान की सराहना की।

समारोह से पूर्व अतिथियों द्वारा मॉ सरस्वती, भारतमाता एवं स्वामी विवेकानंद के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें नमन किया।

प्रांरभ में कुलपति प्रो. एस.एस. सारंदेवोत के सानिध्य में श्रमजीवी महाविद्यालय एवं प्रतापनगर परिसर में लगी संस्थापक जनुभाई की आदमकद प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर नमन किया।

समारोह में प्रो. सुमंत  व्यास - कुलपति बीकानेर वेटनरी विश्विद्यालय, प्रो. शिव शर्मा , डीन - वेटनरी महाविद्यालय नवनिया, पीठ स्थविर डॉ कौशल नागदा,  प्रताप गौरव केंद्र के निदेशक अनुराग सक्सेना, हरि शंकर, विष्णु मेनारिया, धनराज, परीक्षा नियंत्रक डॉ पारस जैन, डॉ. युवराज सिंह राठौड, डॉ. भवानीपाल सिंह राठौड, प्रो. जी.एम. मेहता, प्रो. सरोज गर्ग, प्रो. गजेन्द्र माथुर, प्रो. मंजू मंडोत, डॉ. शैलेन्द्र मेहता, डॉ हेमेंद्र चौधरी, डॉ. धमेन्द्र राजौरा, डॉ. हीना खान, डॉ. निरू राठौड, डॉ.अमी राठौड़, डॉ. बलिदान जैन, डॉ. निवेदिता, डॉ. शैलेन्द्र मेहता,  डॉ. सुनिता मुर्डिया, डॉ भूरालाल श्रीमाली , सहित विद्यापीठ के डीन, डायरेक्टर , अकादमिक, गैर अकादमिक कार्यकर्ताओं के अलावा विद्यार्थी एवं शहर के गणमान्य नागरिक एवं पूर्व कार्यकर्ता  ने शिरकत की।
संचालन डॉ. हरीश चौबीसा ने किया जबकि आभार रजिस्ट्रार डॉ. तरूण श्रीमाली ने जताया।
 


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