“परमात्मा असत्य बोलने वाले मनुष्य की आयु को क्षीण कर देता है: आचार्य सत्यदेव निगमालंकार”

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Published on : 18 Jan, 26 17:01

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“परमात्मा असत्य बोलने वाले मनुष्य की आयु को क्षीण कर देता है: आचार्य सत्यदेव निगमालंकार”

     आज रविवार दिनांक 18-1-2026 को हम प्रातः आर्यसमाज धामावाला, देहरादून के सत्संग में सम्मिलित हुए। प्रातः 8.30 बजे से आर्यसमाज की यज्ञशाला में पं. विद्यापति शास्त्री जी के पौरोहित्य में सामूहिक यज्ञ हुआ। यज्ञ के पश्चात आर्यसमाज के सत्संग भवन में सामूहिक प्रार्थना, भजन एवं ऋषि दयानन्द के जीवन चरित से पाठ हुआ। आज आर्यसमाज में गुरुकुल कागंड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, वेद विभाग आचार्य डा. सत्यदेव निगमालंकार जी को व्याख्यान के लिये आमंत्रित किया गया था। आचार्य जी ने आज ऋषि दयानन्द के जीवन को अपना मुख्य विषय बनाकर अपने जीवन का कल्याण करने के बहुत ही उपयोगी सुझाव दिए। अपने प्रवचन में आचार्य सत्यदेव निगमालंकार ने कहा कि बालक मूलशंकर, जो बाद में स्वामी दयानन्द व ऋषि दयानन्द के नाम से जाने गये, अपने जन्म स्थान टंकारा से मृत्यु को जीत लेने के लिये चल पड़े थे। उन्होंने सत्यान्वेषण के मार्ग में आयी सभी बाधाओं को पार किया और अपने पथ पर चलते चले गये। ऐसा करके उन्होंने अपने उद्देश्य ईश्वर के सत्यस्वरूप, उसकी प्राप्ति के साधनों तथा मृत्यु की ओषधि - ईश्वरोपासना से मुक्ति को प्राप्त कर लिया था। 

    आचार्य सत्येदव निगमालंकार जी ने बताया कि स्वामी दयानन्द जी ने योगी योगानन्द गिरी जी से योगविद्या प्राप्त की थी। उन्होंने ईश्वर का ध्यान करने व समाधि लगाने का अभ्यास किया था तथा उसे सिद्ध भी किया था। आचार्य जी ने कहा स्वामी जी ने योग एवं विद्या के क्षेत्र में जो भी उपलब्धियां प्राप्त की, उससे सभी मनुष्यों को लाभान्वित किया। आचार्य सत्यदेव जी ने स्वामी दयानन्द जी द्वारा मथुरा में स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी से वेद, व्याकरण व वेदांगो के अध्ययन पर भी विस्तार से चर्चा की और इससे जुड़े अनेक प्रसंगों को प्रभावशाली ढंग से श्रोताओं को बताया। आचार्य जी ने कहा कि स्वामी दयानन्द के अध्ययन काल में पं. अमरनाथ जोशी ने उनको तीन वर्षों तक भोजन कराया एवं अन्य सुविधायें भी प्राप्त की थी। जोशी जी के इस कार्य के लिये वह ऋषि दयानन्द जी की ही तरह हमेशा के लिये अमर हो गये हैं। 

    आचार्य सत्यदेव निगमालंकार जी ने कहा कि जो मनुष्य देश, धर्म व संस्कृति की उन्नति के कार्यों में दान देते हैं परमेश्वर उन दान देने वालों का निश्चय ही कल्याण करते हैं। आचार्य जी ने कहा कि आर्यसमाज अपने अनाथालयों के बच्चों से भिक्षावृत्ति नहीं कराता अपितु उन बच्चों को शिक्षा व अच्छे संस्कार देकर उनमें स्वाभिमान, देश प्रेम तथा अपनी संस्कृति के प्रति गौरव को उत्पन्न करता है। आचार्य जी ने श्रोताओं को बताया कि संसार में यदि किसी व्यक्ति ने सभी विषयों पर संसार का हित व उपकार करना ठाना है तो उस व्यक्ति वा महापुरुष का नाम ऋषि दयानन्द सरस्वती है। उन्होंने बताया कि ऋषि दयानन्द ने ही हमें व संसार को व्याकरण के क्षेत्र में अनार्ष व अनार्ष दो शब्द दिए हैं। स्वामी दयानन्द ने संसार को बताया कि वेद और उनका ज्ञान अपौरुषेय हैं। वेदों का ज्ञान ईश्वर से सृष्टि के आरम्भ में संसार के सभी मनुष्यों के लिए आदि चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा के द्वारा प्राप्त हुआ है। ऋषि दयानन्द ने वेदानुकूल मान्यताओं एवं सिद्धान्तों को मान्य तथा वेदविरुद्ध सभी विचारों, मान्यताओं को अमान्य बताया। उन्होंने कहा कि उन्होंने देश के सभी पण्डितों को पूछा था कि बतायें कि वेदों में कहां लिखा है कि मूर्तिपूजा करनी चाहिये। आचार्य जी ने कहा कि कोई भी पण्डित वेदों से न तो प्रमाण बता सका और न ही मूर्तिपूजा को वेदानुकूल व तर्क आदि प्रमाणों से सिद्ध कर सका। आचार्य जी ने वेद वाक्य ‘न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद् यशः’ का भी उल्लेख कर इसके अर्थों पर प्रकाश डाला और कहा कि इससे सिद्ध होता है कि ईश्वर की मूर्ति नहीं बन सकती और मूर्तिपूजा वेदानुकूल नहीं होती। आचार्य जी ने वेदों के पाठ के लिये आठ प्रकार के विकृति पाठों की भी चर्चा की और कहा कि इसके द्वारा वेदों के पाठ व लेखन में कहीं किसी मिलावट की सम्भावना नही होती। इन पाठों के कारण ही आज भी वेदों का पाठ पूरी तरह से सुरक्षित रह सका है। दक्षिण भारत आदि अनेक स्थानों पर आज भी सहस्राधिक ब्राह्मण बन्धु वेदों का निष्कारण व निष्प्रयोजन प्रतिदिन पाठ करते हैं व उसे सुरक्षित रखे हुए हैं। आचार्य जी ने ऐसे ब्राह्मण बन्धुओं की प्रशंसा की। 

    आचार्य जी ने कहा कि ऋषि दयानन्द जी ने देखा था कि भारत देश धर्म व संस्कृति के क्षेत्र में गहरे अन्धकार में जा चुका था। धर्म व संस्कृति में अनेक पाखण्ड, अन्धविश्वास एवं कुरीतियां सम्मिलित हो गई थीं जिनको हमारे सनातनी धर्माचार्य धर्म मानते थे। ऋषि दयानन्द ने देश को इस अन्धकार से बाहर निकालने का सफल प्रयास किया। इसी कारण उन्होंने अन्धविश्वासों को मानने वाली किसी संस्था से धर्म की मान्यताओं के बारे में किसी प्रकार का कोई समझौता नहीं किया और वेदों के सत्यस्वरूप के अनुसार वेदों का प्रचार करते रहे। आचार्य जी ने श्रोताओं को यह भी बताया कि ऋषि दयानन्द ने अपने समय में ईश्वर के सत्यस्वरूप को लोगों को बताया। उनके समय में लोगों को ईश्वर का सत्यस्वरूप तथा उपासना की सत्य विधि विदित नहीं थी। उन्होंने कहा कि ऋषि दयानन्द के ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश के प्रथम समुल्लास में ईश्वर का सत्यस्वरूप विस्तार से बताया गया है। यहां ऋषि दयानन्द ने ईश्वर के एक सौ नामों पर प्रकाश डालकर बताया है कि अग्नि, मित्र, वरुण, ब्रह्मा, शिव, विष्णु, माता, पिता आदि एक ही ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव व सम्बन्ध वाचक नाम हैं। आचार्य जी ने ईश्वर के प्रमुख नाम सच्चिदानन्दस्वरूप सहित अन्य नाम निराकार एवं सर्वशक्तिमान आदि के सत्य अर्थों पर भी प्रकाश डाला। आचार्य जी ने अपने व्याख्यान में अन्धविश्वास व कुरीतियों का उल्लेख कर देवदासी प्रथा तथा कावंड़ की मिथ्या प्रथाओं का भी खण्डन किया। आचार्य जी ने कहा कि हमारे पौराणिक सनातनी भाईयों को यह नहीं पता कि हमारे बड़े बड़े मन्दिरों में जो प्रसाद चढ़ता है उनको बनाता कौन है? आचार्य जी ने कहा कि आर्यसमाज हिन्दुओं को जगाने का काम करता है। 

    आचार्य सत्यदेव निगमालंकार जी ने स्वामी श्रद्धानन्द जी द्वारा हरिद्वार में गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना से जुड़े प्रसंगों पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। आचार्य जी ने कहा कि आर्यसमाज के संन्यासी सनातनी पौराणिक संन्यासियों की दृष्टि से अत्यन्त साधारण एवं सरल जीवन व्यतीत करते हैं। आचार्य जी ने स्वामी श्रद्धानन्द जी द्वारा स्थापित गुरुकुल कुरुक्षेत्र की स्थापना की पृष्ठ भूमि पर भी प्रकाश डाला। वेदों के शीर्ष विद्वान आचार्य डा. सत्यदेव निगमालंकार जी ने कहा कि आर्यसमाज की सन् 1875 में स्थापना होने पर देश-विदेश में धर्म के क्षेत्र में सत्यज्ञान का प्रकाश पुंज वा उजाला फैला। 

    आचार्य जी ने कहा कि परमात्मा असत्य बोलने वाले मनुष्य की आयु को धीरे धीरे क्षीण कर देता है। उन्होंने कहा कि असत्य बोलने वालों को जीवन के उत्तर काल में अनेक गम्भीर रोग लग जाते हैं और उसकी मृत्यु हो जाती है। आचार्य जी ने सब श्रोताओं को जीवन में सत्य बोलने व सत्य व्यवहार करने की प्रेरणा की। आचार्य जी ने कहा कि ऋषि दयानन्द ने हमें जिस कल्पवृक्ष, वेद की मान्यताओं का पालन व प्रचार, के नीचे बैठाया है वह वस्तुतः महान एवं दिव्य है। आचार्य जी ने कहा कि हम सबको सत्य का ही आचरण करना है। कृष्ण जी के शब्दों का उल्लेख कर आचार्य सत्यदेव निगमालंकार जी ने कहा कि अपने धर्म में ही मरना उत्तम है। उन्होंने कहा कि दूसरों का धर्म भयावह है वा हमारे भावी जन्मों को बिगाड़ने वाला सिद्ध होगा। अपने भाषण को विराम देते हुए आचार्य सत्यदेव जी ने कहा कि क्रान्तिकारी देशभक्त भगतसिंह ने उनको सलाह दिये जाने पर भी क्षमायाचना नहीं की थी। उन्होंने कहा था कि उन्होंने असेम्बली में बम फेंका था और इसके लिये उन्हंे कोई पश्चाताप व खेद नहीं है। आचार्य जी ने कहा कि भगतसिंह जी ने सत्य की रक्षा की और लगभग 23 वर्ष की आयु में देश के लिये अपने प्राणों का बलिदान किया। 

    आर्यसमाज के प्रधान श्री सुधीर गुलाटी जी ने आज के व्याख्यान की प्रशंसा की और आचार्य सत्यदेव निगमालंकार जी का धन्यवाद किया। उन्होंने आर्यसमाज के सदस्य श्री ओम प्रकाश नागिया जी के दिनांक 14 जनवरी 2026 को निधन की सूचना दी। श्री नागिया को मौन श्रद्धांजलि दी गई। इसके बाद संगठन सूक्त व शान्ति पाठ के मन्त्रों से आज के सत्संग का समापन हुआ। आज के सत्संग में बड़ी संख्या में स्त्रियां व पुरुष तथा श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम के बच्चे सम्मिलित हुए। आज के सत्संग में आर्यसमाज के वरिष्ठ सदस्य श्री कुलभूषण कठपालिया जी, श्री धीरेन्द्र मोहन सचदेव जी, श्री देवकी नन्दन शर्मा जी, श्री पवन कुमार जी तथा श्री सतीश आर्य जी आदि भी पधारे थे। ओ३म् शम्। 
-मनमोहन कुमार आर्य
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