हवाई अड्डों के रडार की ऊँचाई बनी बाधा, जयपुर सहित कई शहरों का विकास प्रभावित

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Published on : 24 Jan, 26 06:01

 हवाई अड्डों के रडार की ऊँचाई बनी बाधा, जयपुर सहित कई शहरों का विकास प्रभावित

एन जी भट्ट

विश्व विख्यात पर्यटन नगरी गुलाबी नगर जयपुर जिसे देश ही नहीं दुनिया की सबसे श्रेष्ठ नियोजित राजधानियों में गिना जाता है, आज एक अजीब विरोधाभास से जूझ रहा है। जयपुर में हीरे को तराशने और हैंडीक्राफ्ट्स के परम्परागत व्यवसाय तथा पर्यटन के साथ-साथ स्मार्ट सिटी,आईटी और रियल एस्टेट,फ़िल्म और वेडिंग डेस्टिनेशन आदि में  निवेश की अनेक संभावनाएँ मौजूद हैं, दूसरी ओर सांगानेर हवाई अड्डे से जुड़े ऊँचाई प्रतिबंध शहर के वर्टिकल विकास में सबसे बड़ी बाधा बनते जा रहे हैं। जयपुर हवाई अड्डे का प्रबन्धन कर रहे अड़ानी सहित कई अन्य ने अपने भवनों के निर्माण और ऊंचाई के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) के लिए एयरपोर्ट ऑथॉरिटी ऑफ़ इंडिया में आवेदन किया है लेकिन उन्हें वांछित स्वीकृति मिल नहीं रहें है। सवाल यह नहीं है कि विमानन सुरक्षा ज़रूरी है या नहीं? सवाल यह है कि क्या भारत में अपनाई जा रही ऊँचाई गणना प्रणाली आज भी प्रासंगिक है?

 

देश के अनेक बड़े शहरों में शहरी विकास की रफ्तार हवाई अड्डों पर लगे रडार और उड़ान सुरक्षा मानकों से जुड़ी ऊँचाई सीमाओं के कारण प्रभावित हो रही है। जयपुर, दिल्ली, मुंबई, सूरत, अहमदाबाद, लखनऊ और हैदराबाद जैसे शहरों में एयरपोर्ट के आसपास बहुमंजिला इमारतों, व्यावसायिक टावरों और आधुनिक आवासीय परियोजनाओं पर सख्त प्रतिबंध लागू हैं। इन प्रतिबंधों का मुख्य कारण विमानन सुरक्षा से जुड़े रडार, नेविगेशन सिस्टम और हवाई  मार्गो की संरक्षा है। राजस्थान की राजधानी जयपुर की बात करें तो सांगानेर एयरपोर्ट के चारों ओर निर्धारित ऊँचाई सीमा के चलते कई संस्थानों को अपने निर्माण कार्य तोड़ने पड़े है और प्रस्तावित परियोजनाएँ या तो रद्द करनी पड़ीं या उनका डिजाइन बदलना पड़ा है। रियल एस्टेट डेवलपर्स का कहना है कि ऊँचाई प्रतिबंधों के कारण शहर की भूमि का पूर्ण उपयोग नहीं हो पा रहा, जिससे निवेश घट रहा है और शहर का वर्टिकल ग्रोथ मॉडल बाधित हो रहा है। इसका असर रोजगार, अधोसंरचना विकास और नगर निगम की राजस्व प्राप्ति पर भी पड़ रहा है। नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए ) और एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एएआई ) का तर्क है कि विमान उड़ानों की सुरक्षा सर्वोपरि है। रडार और इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम (आईएलएस ) के आसपास किसी भी ऊँची संरचना से सिग्नल में बाधा, दृश्यता में कमी और आपात स्थितियों में जोखिम बढ़ सकता है। इसी कारण ‘ऑब्स्टेकल लिमिटेशन सरफेस’ (ओएलएस ) के तहत सख्त नियम बनाए गए हैं। हालांकि शहरी नियोजन विशेषज्ञ मानते हैं कि तकनीक के विकास के साथ संतुलन बनाना संभव है। कई देशों में उन्नत रडार टेक्नोलॉजी, पुनर्स्थापन (रिलोकेशन ) या एयरपोर्ट के आसपास ज़ोनिंग के नए मॉडल अपना कर शहरों के विकास को गति दी गई है। भारत में भी ड्रोन सर्वे, डिजिटल मैपिंग और चरणबद्ध ज़ोनिंग के जरिए समाधान खोजे जा सकते हैं। हाल ही हीरे और कपड़े के कारोबार के लिए प्रसिद्ध सूरत में भी रडार का स्थान परिवर्तित कर एयरपोर्ट की हद में आई  बिल्डिंग्स को राहत दी गई है अन्यथा ये सभी भवन अवैध (ईलिगल ) माने गए थे। राज्य सरकारें और नगर निकाय लंबे समय से केंद्र से ऊँचाई मानकों में व्यावहारिक ढील, स्पष्ट दिशानिर्देश और त्वरित एनओसी प्रक्रिया की मांग कर रहे हैं। यदि सुरक्षा से समझौता किए बिना नियमों का आधुनिकी करण किया जाए, तो जयपुर सहित देश के कई शहरों को संतुलित, सुरक्षित और तेज़ शहरी विकास की नई राह मिल सकती है।

 

जयपुर का सांगानेर हवाई अड्डा की समुद्र तल से ऊँचाई (एएमएसएल) शहर के अन्य हिस्सों की तुलना में कम होने के कारण शहरी विकास में एक भौगोलिक और तकनीकी असंतुलन पैदा हो रहा है। यह असंतुलन केवल इमारतों की ऊँचाई तक सीमित नहीं है, बल्कि शहर की समग्र योजना, निवेश, यातायात और सौंदर्यबोध को भी प्रभावित कर रहा है।सांगानेर हवाई अड्डा अपेक्षाकृत निम्न भू-स्तर पर स्थित है, जबकि जयपुर के उत्तरी और पश्चिमी हिस्से जैसे विद्याधर नगर, वैशाली नगर, झोटवाड़ा, आमेर रोड और अरावली की तलहटी प्राकृतिक रूप से अधिक ऊँचाई पर हैं। विमानन नियमों में ऊँचाई का आकलन समुद्र तल से (एएमएसएल) किया जाता है, न कि केवल जमीन से (एजीएल ) किया जाता है। परिणामस्वरूप जो क्षेत्र पहले से ऊँचाई पर हैं, वहाँ अपेक्षाकृत कम मंज़िलों की अनुमति मिलती है। वहीं शहर के निचले हिस्सों में तुलनात्मक रूप से अधिक ऊँचाई संभव होती है। इससे शहर में विकास का असमान वितरण होता है। हवाई अड्डे के कारण लागू ऑब्स्टेकल लिमिटेशन सर्फेस (ओएलएस ) नियमों का असर खासकर उन इलाकों पर अधिक पड़ता है जो एयरपोर्ट से उड़ान मार्ग (फ्लाइट पाथ ) की दिशा में हैं या पहले से ऊँचाई पर बसे हुए हैं। नतीजतन उत्तरी जयपुर में हाई-राइज़ प्रोजेक्ट सीमित है और दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों में अपेक्षाकृत अधिक वर्टिकल ग्रोथ है। इससे शहर का स्काईलाइन संतुलित नहीं रह पा रहा है । समुद्र तल से ऊँचाई के इस अंतर के कारण एक ही एफएआर (फ़्लोरी एरिया रेश्यो ) होने के बावजूद अलग-अलग क्षेत्रों में निर्माण क्षमता अलग-अलग हो जाती है। डेवलपर्स ऊँचाई-प्रतिबंध वाले इलाकों से निवेश हटाकर उन क्षेत्रों में जाते हैं जहाँ नियम अपेक्षाकृत ढीले हैं। इससे कुछ क्षेत्र अत्यधिक घनीकरण (ओवर -डेंसिफिकेशन ) की ओर और कुछ क्षेत्र विकास से वंचित रह जाते हैं। ऊँचाई प्रतिबंधों के कारण शहर का वर्टिकल बैलेंस बिगड़ता है। आधुनिक कार्यालय, होटल और मिक्स्ड-यूज़ टावर सीमित हो जाते हैं। सड़क, सीवर और जल निकासी जैसी अधोसंरचना पर असमान दबाव पड़ता है।विशेषज्ञों के अनुसार यह स्थिति प्लान्ड सिटी जयपुर की मूल अवधारणा के विपरीत है। जयपुर मास्टर प्लान बनाते समय प्राकृतिक भू-स्तर और एएमएसएल आधारित विमानन नियमों का पर्याप्त समन्वय नहीं हो पाता। जिससे एक ही शहर में दो तरह के विकास मानक लागू हो जाते हैं। एक एयरपोर्ट जैसे संवेदनशील क्षेत्र के लिए, दूसरा सामान्य शहरी क्षेत्र के लिए। परिणामस्वरूप, एक ही प्रकार की इमारत को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग अनुमति मिलती है और विकास असंतुलित हो जाता है।

 

जयपुर हवाई अड्डे की समुद्र तल से कम ऊँचाई है, जबकि शहर के कई हिस्सों का भू-स्तर अधिक होना, तकनीकी रूप से ऊँचाई प्रतिबंधों को कठोर बना देता है। इससे शहरी विकास असंतुलित, निवेश असमान और स्काईलाइन विकृत हो रही है। यदि विमानन सुरक्षा से समझौता किए बिना एएमएसएल आधारित नियमों की पुनर्समीक्षा, ज़ोन-वार ऊँचाई मॉडल और आधुनिक रडार तकनीक को अपनाया जाए, तो जयपुर जैसे ऐतिहासिक और नियोजित शहर में संतुलित विकास संभव हो सकता है।

 

पुरानी गणना, नया शहर

 

भारत में हवाई अड्डों के आसपास इमारतों की ऊँचाई तय करने का आधार मुख्यतः एएमएसएल (अबोव मीन सी लेवल) यानी समुद्र तल से ऊँचाई है। यह प्रणाली 1950–60 के दशक में विकसित हुई थी,जब रडार तकनीक सीमित थी और डिजिटल सिमुलेशन उपलब्ध नहीं था। साथ ही शहरी घनत्व आज जैसा नहीं था। समस्या यह है कि जयपुर का भू-स्तर असमान (अंड्युलेटिंग टरैन ) है। शहर के कई हिस्से जैसे वैशाली नगर, विद्याधर नगर, झोटवाड़ा, आमेर रोड आदि प्राकृतिक रूप से ऊँचाई पर स्थित हैं, जबकि हवाई अड्डा अपेक्षाकृत निचले स्तर पर है । एएमएसएल आधारित नियम इन क्षेत्रों को “दंडित” करते हैं, भले ही वास्तविक विमानन जोखिम न के बराबर हो। अंतरराष्ट्रीय विमानन संस्था आईसीएओ (इंटरनेशनल सिविल एविएशन ऑर्गनाइजेशन ) स्पष्ट कहती है कि *कोई भी संरचना विमान संचालन या रडार/नेविगेशन सिस्टम की कार्यक्षमता में बाधा नहीं डालनी चाहिए। यह नियम पूर्ण ऊँचाई प्रतिबंध की बात नहीं करता, बल्कि प्रभाव (इम्पैक्ट) की बात करता है। इसके विपरीत भारत में अक्सर यह मान लिया जाता है कि ऊँचाई बढ़ी कि खतरा बढ़ा और फिर बिना विस्तृत तकनीकी अध्ययन एनओसी अस्वीकार कर दी जाती है यही वह बिंदु है जहाँ नीति और तकनीक के बीच दूरी पैदा होती है। हवाई अड्डों के रडार (राडार/ सीएनएस –एटीएम उपकरण) और उनके आसपास बनने वाली इमारतों की ऊँचाई के लिए एनओसी (नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट ) देने के विषय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई देश-विशेष कानून नहीं, बल्कि आईसीएओ (इंटरनेशनल सिविल एविएशन ऑर्गेनाइजेशन ) द्वारा तय किए गए मानक और अनुशंसित व्यवहार (SARPs) लागू होते हैं। भारत सहित अधिकांश देश इन्हीं नियमों को अपने राष्ट्रीय कानूनों में अपनाते हैं।

 

विकसित देश क्या अलग कर रहे हैं?

 

यूरोप, जापान, सिंगापुर जैसे देशों में शहरी हवाई अड्डे शहर के बीचोंबीच हैं। फिर भी वहाँ 3-डी रडार सिम्यूलेशन,डिजिटल टेरेन मॉडलिंग तथा बीम इम्पैक्ट एनालिसिस के आधार पर कंडिशनल एनओसी दी जाती है। यानी यदि इमारत से रडार या उड़ान में वास्तविक बाधा नहीं है तो अनुमति दी जाती है । यदि आंशिक प्रभाव पड़ता भी हों तो डिज़ाइन या रडार को लोकेशन बदलकर समाधान निकाला जाता है,जैसा मुंबई एवं सूरत आदि शहरों में किया गया है । भारत में अभी भी ज़्यादातर निर्णय 2-डी ड्रॉइंग और केस एज्यूम्पशन पर आधारित हैं। विकसित देशों में तस्वीर अलग है। सिंगापुर, टोक्यो, लंदन और फ्रैंकफर्ट जैसे शहरों में हवाई अड्डे शहरी क्षेत्र के बीच स्थित हैं, फिर भी वहाँ 3-डी रडार सिमुलेशन, डिजिटल टेरेन मैपिंग और प्रोजेक्ट-आधारित तकनीकी मूल्यांकन के आधार पर अनुमति दी जाती है। यदि किसी इमारत से आंशिक प्रभाव की आशंका हो, तो उसके डिज़ाइन में बदलाव कर समाधान निकाला जाता है लेकिन भारत में अभी भी ज़्यादातर निर्णय 2-डी प्रोफाइल और ‘वर्स्ट केस’ मान्यताओं पर आधारित हैं।

 

 जयपुर में असर क्या हो रहा है?

 

जयपुर में इसके दुष्परिणाम साफ दिखते हैं। कई संभावित होटल, आईटी पार्क और मिक्स्ड-यूज़ प्रोजेक्ट या तो रद्द हो चुके हैं या शहर के बाहरी इलाकों की ओर खिसक गए हैं। इससे न केवल निवेश प्रभावित हुआ है, बल्कि रोजगार और नगर निकायों के राजस्व पर भी असर पड़ा है। ऊँचाई प्रतिबंधों को लेकर बढ़ते न्यायालयी विवाद इस बात का संकेत हैं कि मौजूदा प्रणाली पर असंतोष गहराता जा रहा है। इस नीति का प्रभाव केवल डेवलपर्स तक सीमित नहीं है वरन्  इसका असर असंतुलित शहरी विकास पर हो रहा है क्योंकि शहर में कुछ इलाके अत्यधिक घने और कुछ क्षेत्र विकास से वंचित है । इस कारण निवेश का पलायन हो रहा है तथा होटल, आईटी पार्क, मिक्स्ड-यूज़ टावर अन्य शहरों की ओर जा रहें है । इसका जयपुर के राजस्व अर्जन और रोजगार पर भी असर पड़ रहा है तथा नगर निगम और राज्य को संभावित टैक्स हानि हो रही है । साथ ही  न्यायालयी विवादों की भरमार तथा एनओसी को लेकर हाई कोर्ट में लगातार मुकदमे बढ़ रहें है।समाधान के तौर पर जयपुर के लिए वैकल्पिक हाईट मॉडल अपनाया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जयपुर जैसे शहर के लिए एडाप्टिव हाईट रेग्युलेशन मॉडल अपनाया जा सकता है, जिसमें ज़ोन-आधारित ऊँचाई नीति अपना कर तथा क्रिटिकल एविएशन जोन,कंडीशनल डेवलपमेंट जोन  तथा फ्री अर्बन ग्रोथ जोन बना कर आगे बढ़ा जा सकता है।

  

नीति सुधार से डर क्यों?

 

यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि नियमों का आधुनिकीकरण सुरक्षा से समझौता नहीं बल्कि यह आईसीएओ के मूल उद्देश्य के अधिक निकट है। आज सवाल यह है कि क्या हम 21वीं सदी के शहरों को 20वीं सदी की गणनाओं से चलाएंगे? एएमएसएस के साथ एजीएल और टेरेन की समन्वय केवल समुद्र तल नहीं, बल्कि ज़मीन की वास्तविक ऊँचाई,रडार बीम की दिशा और भू-आकृतिक सुरक्षा (टेरेन शिल्डिंग ) को भी गणना में शामिल किया जाना चाहिए। साथ ही हर हाई-राइज़ प्रोजेक्ट पर ब्लैंकेट बैन की बजाय तकनीकी अध्ययन,3-डी सिमुलेशन कर और फिर निर्णय लिया जाए । अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (आईसीएओ ) के नियम स्पष्ट हैं। वे यह नहीं कहते कि किसी शहर में ऊँची इमारतें नहीं बन सकतीं, बल्कि यह कहते हैं कि कोई भी संरचना विमान संचालन या रडार और नेविगेशन सिस्टम की कार्यक्षमता में बाधा नहीं डालनी चाहिए। यानी मापदंड ऊँचाई नहीं, बल्कि उसका वास्तविक प्रभाव होना चाहिए। इसके बावजूद भारत में अक्सर यह मान लिया जाता है कि ऊँचाई बढ़ना अपने आप में जोखिम है और बिना विस्तृत तकनीकी अध्ययन के ही एनओसी अस्वीकृत कर दी जाती है।

 

जयपुर की ऊँचाई समस्या वास्तव में विमानन सुरक्षा की नहीं, बल्कि पुरानी गणना सोच की समस्या है। यदि एएमएसएस तकनीक और नीति में संतुलन बैठाया जाए, तो विमान भी सुरक्षित रहेंगे और शहर भी आगे बढ़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि समाधान नियमों को हटाने में नहीं, बल्कि उन्हें आधुनिक बनाने में है। जयपुर जैसे शहर के लिए ज़ोन आधारित ऊँचाई मॉडल अपनाया जा सकता है। जहाँ रनवे और रडार के निकट क्षेत्रों में सख्त प्रतिबंध हों, जबकि अन्य क्षेत्रों में प्रोजेक्ट-वार तकनीकी अध्ययन के आधार पर अनुमति दी जाए। साथ ही, केवल  एएमएसएस नहीं, बल्कि जमीन की वास्तविक ऊँचाई, भू-आकृति और रडार बीम की दिशा को भी गणना में शामिल किया जाना चाहिए। इसलिए यह कहना सही है कि जयपुर की समस्या ऊँचाई नहीं, बल्कि पुरानी गणना पद्धति है। जहर्म मॉडल इकाई के भीतर रहते हुए सुरक्षा और विकास दोनों को ही साधा सकता है। इधर एयर पोर्ट अथॉरिटी आफ़ इंडिया का तर्क है कि जयपुर का अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट नई दिल्ली के इन्दिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का वैकल्पिक एयरपोर्ट है और दिल्ली में मौसम ख़राब होने ,कोहरा होने और कंजैक्शन आदि परिस्थितियों में फ्लाइटस को डाइवर्ट करना पड़ता है। ऐसे में राडार की ऊँचाई बढ़ाने आदि के विकल्पों पर अमल करना विमान यात्रियों के जीवन के साथ खिलवाड़ करने जैसा होगा। अंततः सवाल यही है कि क्या 21वीं सदी के शहरों को 20वीं सदी की गणनाओं से संचालित किया जाना चाहिए? यदि विमानन सुरक्षा से समझौता किए बिना नीति और तकनीक में संतुलन स्थापित किया जाए, तो जयपुर न केवल सुरक्षित रहेगा, बल्कि एक आधुनिक, संतुलित और निवेश-अनुकूल शहर के रूप में आगे बढ़ सकेगा।

 

जयपुर का मामला केवल एक शहर का नहीं, बल्कि उन तमाम भारतीय शहरों का प्रतीक है जहाँ हवाई अड्डे और विकास आमने-सामने खड़े कर दिए गए हैं, जबकि दुनिया ने दोनों को साथ चलाना सीख लिया है।


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