तंत्र बढ़ गया आगे, गण रह गया पिछलग्गू

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Published on : 27 Jan, 26 09:01

तंत्र बढ़ गया आगे, गण रह गया पिछलग्गू

-   डॉ. दीपक आचार्य

 आज के दिन हर कहींहर बार मचता है शोरऔर दो-चार दिन की धमाल के बाद फिर खो जाता हैबिना पेड़ों वाली पहाड़ियों के पार। आजादी के इतने सालों बाद भी गण को जिस तंत्र की तलाश थी उसका पूरा-पूरा गर्भाधान तक नहीं हो सका अब तकया कि लाख प्रयासों के बाद भी समय-समय पर होते रहे एबोर्शन ने कहाँ पनपने दिया है तंत्र के पुतले को।

रोटीकपड़ा और मकान के लिए आज भी आम आदमी दर-दर की ठोकरें खा रहा है। नून-तेल लकड़ी की जुगाड़ में इतनी उमर खपाने के बाद भी गणतंत्र का परसाद वह अच्छी तरह चख भी नहीं पाया है।

हमारा गणतंत्र बढ़ती उमर के बावजूद बौनसाई हालत में कैद पड़ा है। तंत्र तितर-बितर हो रहा हैकहीं इसे कुतरा-कुचला जा रहा है तो कहीं यह दीमकों के डेरों की भेंट चढ़ रहा है। कहीं पेन की नोक वाले पेंगोलिन तंत्र से चिपटकर खुरचने में लगे हैं। और कहीं इशारों और अपनी अंगुलियों के सहारे माउस को मनमर्जी मुताबिक नचाने वाले बिल्ले और पिल्ले पता नहीं कौन-कौन से अक्स और तस्वीरें दिखा रहे हैं।

किसी जमाने में गण के लिए बना तंत्र अब गिन-तंत्र बन गया है। जहां गण से वास्ता दूर होता जा रहा है और हर कोई गिनने में दिन-रात जुटा हुआ है। जिन मल्लाहों के भरोसे गणतंत्र की नैया लहरों को पार करती रही है वे पाल की आड़ में पाँच साल तक एक-एक दिन गिन-गिनकर गिनने में जुटे हुए हैं।

फाईव स्टार होटलोंए.सी. दफ्तरों से लेकर रिसोर्ट्स और फार्म हाऊसों तक में आराम फरमाते हुए प्लानिंग बनाने वाले अपुन के कर्णधारों का अब न गुण से वास्ता रहा है न गण से। अलग-अलग रंगों के झण्ड़ोंटोपियों और उपरणों के साथ गण की सेवा में उतरने वाले अखाड़चियों की हकीकत किसी से छिपी हुई नहीं है।

गणतंत्र के कल्पवृक्ष ने पिछले बरसों में इतने निर्मम पतझड़ देखे हैं कि बेचारा गण सूखी पीली पत्तियों की तरह दूर से दूर छिटकहवा में उड़ता रहा है। हर पाँच साल में हवाएँ आती हैं और गण को बहला फुसलाकर रफू हो जाती हैं। ऐेसे में बेचारा गण न घर का रहा न घाट का।

शिलान्यास से लेकर उद्घाटनलोकार्पणविमोचनस्वागत- सम्मानअभिनन्दनरैलियोंबैठकोंजन सुनवाइयों और सभाओं से लेकर दफ्तरों तक पसरे हुए तंत्र के नाम पर अब आई.ए.एस.आर.ए.एसआई.पी.एसआर.पी.एस. और जाने कौन-कौन से आई.एस.आई. मॉर्का वाले तांत्रिकों की पण्डा परम्परा आम गण का भाग्य बाँचने दिन-रात भिड़ी हुई है।

कभी लाल टोपीसफेद टोपी तो कभी कालीकभी किसी रंग का लिबास तो कभी कोई और चौगा। और कभी सभी रंगों का भरपूर घालमेल चोखा। यदा-कदा बन्दर छाप टोपियां भी नज़र आ ही जाती हैं। यहाँ सब कुछ बदल जाता है गाँधी छाप को देखकर।

ख़ास लोग दरवाजे से लेकर दिल्ली तक रंग बदल लेते हैं। कपड़ों की तरह बदल लेते हैं ईमान-धरम। गण बेचारा टुकर-टुकर कर देखता जाता है। कभी वह हॉकिम को बिसलरी की बोतल से हलक तर करते देखता है तो कभी फंक्शन्स में मेवों-मिठाइयों के बीच रमे हुए। लाल-पीली-नीली बत्ती वाली गाड़ी के खतरों को अब अच्छी तरह  समझने लगा है गण। भला हो इन बत्तियों का जो अमर हैंजाते-जाते वापस लौट जो चली हैं वरना तो कलियुगी अश्वत्थामाओं को यही अहसास हो चला था कि माथे की मणि अब वापस नहीं आने वाली।

हर साल आता है गणतंत्र का यह महापर्व। एक दिन गण का और बाकी दिन तंत्र वाले तांत्रिकों के। दान-दच्छिना मिली नहीं कि फाइलों में मंत्र फूंक कर प्राणदान करने से लेकर सारे तंतर-मंतर में माहिर हैं अपने ये उस्ताद। तमाम किस्मों के दरबारियों तक को अपने वशीकरण मंत्रों से बोतल में बन्द करने की कला से वाकिफ हैं ये। आखिर अंग्रेजों की शिक्षा-दीक्षा को ये काले अंग्र्रेज अभी नहीं तो कब आजमाएंगे।

समस्याओं के पहाड़ों और अभावों की गहरी घाटियों के बीच धंसा गण कराहने लगा हैदफ्तरों में लम्बी लाइनें हैं और फाइलों की रेल छुक-छुक कर चलती है उधार के ईंधन से। यहां सब फ्री स्टाईल चल रहा है। गण को दरकिनार कर तंत्र हावी होता जा रहा है।

बिना कुछ दान-दक्षिणा के कौन सा देवता रीझता है फिर ये हाकिम तो इंसान हैं। इनके भी अपने पेट हैंबाल-बच्चे हैंबैंक लॉकर हैं और लक्ष्मी को कैद करने के तमाम नुस्खों की महारथ। ये ही तो वह बात है जिसने इन्हें गण से गणमान्य बना डाला है।

आईये गणतंत्र के इस महान पर्व पर हम अपने स्वयंभू गणमान्यों का खुले दिल से अभिनंदन-वन्दन करें और ठिठुरते-कराहते शोषित पीड़ित और अपने आप को हर क्षण लुटा हुआ महसूस करने वाले निरीह गण के प्रति आत्मीय सहानुभूति व्यक्त कर उसे सान्त्वना प्रदान करें।

सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ....।


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