गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर मौजी बाबा धाम प्रांगण में अखिल भारतीय साहित्य परिषद की ओर से वंदेमातरम् भारत के राष्ट्रगीत पर परिचर्चा कार्यक्रम का आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि अजय सिंघल पूर्व निदेशक कला साहित्य हरियाणा( राज्य मंत्री ) ने वंदेमातरम् क्यों विषय पर अपने उद्बोधन में कहा कि देश को आजादी दिलाने और वर्तमान में देश को एक जुट रहने में वंदेमातरम् की महत्वपूर्ण भूमिका बताया।
सिंहल ने कहा वंदे मातरम हमारे देश की स्तुति का गान और भारत के स्वतंत्रता संग्राम का मंत्र है। यह प्रत्येक भारतीय के मन की संवेदना है। जो लोग वंदे मातरम को सांप्रदायिकता बता रहे हैं वह भारत को अपनी पुण्य भूमि मातृभूमि और जन्मभूमि नहीं मानते।
उन्होंने कहा भगवान श्री राम ने जब लंका को विजयी किया तो उन्होंने अपने अनुज लक्ष्मण को कहा कि अपि स्वर्णमयी लंका न में लक्ष्मण रोचते... जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। अर्थात हे लक्ष्मण! मुझे यह सोने की लंका अच्छी नहीं लगती मुझे तो मेरी जन्मभूमि स्वर्ग से भी प्रिय है।
उन्होंने कहा हमारे देश का चिंतन है कि जिसने हमें दिया है उसको हमने मां कहा है। हमने धरती को माता कहा तुलसी को माता कहा गाय को माता कहा गीता को माता कहा तो अपने देश से भी वात्सल्य पूर्ण संबंध स्थापित किया है। यह देश मात्र भूमि का टुकड़ा नहीं अपितु हमारे लिए मां स्वरूप है। बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा लिखित वंदे मातरम का गायन हमारे प्राणों के लिए आवश्यक हमारे हृदय का स्पंदन है।
संचालन करते हुए चित्तौड़ प्रान्त के संरक्षक रामेश्वर शर्मा "रामू भैया" ने वंदेमातरम् के भावार्थ पर सुन्दर कविता पाठ किया। दुर्गा शंकर ने देश भक्तिपूर्ण कविता और श्रीमती पल्लवी दरक न्याती ने भजन प्रस्तुत किया। योगी राज योगी ने परिषद की ओर से अजय सिंघल का अपर्णा तथा मोती हार पहनाकर स्वागत किया । महामंत्री राम मोहन कौशिक ने अध्यक्षता कर आभार व्यक्त किया।
सिंघल का अभिनंदन :
इस अवसर पर समरस संस्थान साहित्य सृजन भारत गांधी नगर, गुजरात की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. शशि जैन, राजस्थान प्रांत प्रभारी डॉ. वैदेही सहित अन्य सदस्यों ने डॉ.अजय सिंहल का अभिनंदन पत्र भेंट कर अभिनंदन किया तथा श्रीमती श्रुति सिंहल का स्वागत किया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि ने दीप प्रज्वलित कर किया। इस अवसर पर कई साहित्यकार उपस्थित रहे।