अनुपम धरोहर हैं मावजी महाराज के चौपड़े,
इनमें समाया है पिण्ड से लेकर ब्रह्माण्ड तक का ज्ञान-विज्ञान,
सच हो रही हैं सदियों पूर्व की भविष्यवाणियां,
हर अक्षर और लकीर करती है रहस्योद्घाटन
- डॉ. दीपक आचार्य
देश में अलौकिक संतों एवं भक्त कवियों की परंपरा में आज से लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व वाग्वर प्रदेश अर्थात् दक्षिणी राजस्थान के मध्यप्रदेश एवं गुजरात के सटे दक्षिणांचल की पुण्य धरा पर अवतरित त्रिकालज्ञ संत मावजी महाराज दूर-दूर तक प्रसिद्ध हैं। कई लाख लोगों के लिए भगवद् स्वरूप मान्य मावजी महाराज को भगवान श्रीकृष्ण का लीलावतार मान कर अगाध श्रद्धा और आस्था भाव से स्मरण किया जाता है।
संत मावजी का जन्म विक्रम संवत् 1771 में वसन्त पंचमी के दिन साबला (डूंगरपुर जिला) में डालम ऋषि के घर माता केशरबाई की कोख से हुआ। घोर तपश्चर्या के उपरान्त दिव्य लीलावतार के रूप में उनका जग समक्ष प्राकट्य विक्रम संवत् 1784 में माघ शुक्ल एकादशी को हुआ। उन्हीं की स्मृति में बेणेश्वर महामेला भरता है। विलक्षण व्यक्तित्व एवं अलौकिक लीलाओं ने मावजी को अवतारी महापुरुष के रूप में स्थापित किया व वे भगवान कृष्ण के लीला अवतार के रूप में पूजे जाने लगे। उन्होंने बेणेश्वर तीर्थ सहित विभिन्न स्थानों पर रहकर घोर तपस्या की और गुफाओं में आत्मसाक्षात्कार किया।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार वृंदावन में जिस समय श्रीकृष्ण की रास लीला भंग हो गई तब गोपिकाओं की प्रार्थना पर कृष्ण ने कहा था कि कलियुग में वे मावजी के रूप में अवतार लेंगे और अधूरी रह गई रास लीला को बेणेश्वर टापू पर पूरी करेंगे। मावजी ने यहां इस अधूरी रास को पूरा किया तथा प्रेम, भक्ति एवं श्रृंगार की गंगा बहाई। मावजी के चमत्कारों की गाथाएं आज भी घर-घर में श्रद्धा के साथ सुनी जाती हैं्र।
मावजी त्रिकालद्रष्टा थे। अपनी दिव्य दृष्टि के माध्यम से उन्होंने भूत, भविष्य एवं वर्तमान की ढेरों घटनाओं को सुना कर लोगों को विस्मित किया। माव परम्परा संदर्भ के अनुसार उन्होंने अपने जीवन में सात लाख 96 हजार रचनाएं सृजित कीं। उनके द्वारा तपस्या पूरी होने के बाद अहमदाबाद से 14 पोटी कागज मंगवाए गए, जिन पर धोलागढ़ शेषपुर में एकांतवास कर मात्र साढ़े तीन दिन में पांच बड़े चौपड़े (विशाल ग्रंथ) तथा चौपड़ियां (लघु पुस्तिकाएं) लिख कर भूत, भविष्य एवं वर्तमान के संबंध में दिव्यवाणी को शब्द दिए। इन चौपड़ों का आकार किसी खाट से छोटा नहीं है।
उनकी तमाम भविष्यवाणियां आज भी अक्षरशः सिद्ध हो रही हैं। विस्तृत फलक वाले इन चौपड़ों में अनुपम रंगीन चित्रकृतियों से वर्ण्य विषय को अच्छी तरह स्पष्ट किया गया है। इन चौपड़ों को ‘मावजी महाराज ना चौपड़ा’ कहकर श्रद्धा का भाव व्यक्त किया जाता है।
गुरु सहजानंद से प्राप्त ज्ञान एवं योगमार्ग से प्राप्त दिव्य संकेतों को उन्होंने इन चौपड़ों में व्यक्त किया। उन्होंने अपने शिष्य जीवनदास, रतनदास एवं केहरीदास के माध्यम से भी लोगों में दिव्य वाणियों एवं भविष्यवाणियों को प्रचारित कर धार्मिक चेतना जगाई और लोगों को दिव्य जीवन जीने की प्रेरणा दी।
मावजी महाराज के पांच चौपड़ों में से चार इस समय यहां सुरक्षित हैं। इनमें ‘मेघसागर’ हरि मंदिर साबला में है, जिसमें गीता ज्ञान उपदेश, भौगोलिक परिवर्तनों की भविष्यवाणियां हैं। ‘सामसागर’ शेषपुर में है, जिसमें शेषपुर एवं धोलागढ़ का वर्णन तथा दिव्य वाणियां हैं। तीसरा ‘प्रेमसागर’ डूंगरपुर जिले के ही पुंजपुर में है, जिसमें धर्मोपदेश, भूगोल, इतिहास तथा भावी घटनाओं की प्रतीकात्मक जानकारी है, जबकि चौथा चौपड़ा ‘रतनसागर’ बांसवाड़ा शहर के त्रिपोलिया रोड स्थित विश्वकर्मा मंदिर में सुरक्षित है, इसमें रंगीन चित्र, रासलीला, कृष्णलीलाओं आदि का मनोहारी वर्णन सजीव हो उठा है। ‘अनन्त सागर’ नामक पांचवा चौपड़ा मराठा आक्रमण के समय बाजीराव पेशवा द्वारा ले जाया गया, जिसे बाद में अंग्रेज ले गए। बताया जाता है कि इस समय यह लंदन के किसी म्यूज़ियम में सुरक्षित है। इसमें ज्ञान-विज्ञान की जानकारियां समाहित हैं।
सम्पूर्ण विश्व में अद्भुत साहित्य का यह सृजन अपूर्व एवं अलौकिक है, जिसके शब्द-शब्द और हर चित्र में जीवंत भाव भरे हुए हैं। देवनागरी लिपि में अंकित वागड़ी मावजी की मुख्य भाषा रही है, जिसमें गुजराती और मेवाड़ी का साफ प्रभाव परिलक्षित होता है।
सहज, सरल एवं प्रवाहमयता के साथ अभिव्यक्ति हर किसी को भीतर तक प्रभावित करती है। कुशल चित्रकार के रूप में मावजी ने रंगों के संयोजन से जिन चित्रों का निर्माण किया है वे आज भी स्पष्ट एवं चटख हैं।
भविष्यवाणियों, ज्ञान-विज्ञान, होने वाले आविष्कारों, लोक व्यवहार के बदलने वाले स्वरूपों, समाजशास्त्रीय परिवर्तनों, परिवेशीय बदलाव, भक्तिधारा, लीलाओं, रास, महारास, कृष्णलीला के मनोहारी क्षणों, सुर-ताल, राग-रागिनियों, भावनाओं आदि की जो अभिव्यक्ति मावजी के चौपड़ों में हुई है वह मावजी को अलौकिक सर्जक, अप्रतिम चित्रकार और विलक्षण संगीतज्ञ के रूप में प्रकट करती है।
आमतौर पर इन ग्रंथों के प्रति युगों से श्रद्धा की चरम अभिव्यक्ति रही है, किंतु सामान्यजन इन्हें मात्र ‘भविष्यवाणियों का दुर्लभ चौपड़ा’ कहकर पूजते रहे हैं। इन ग्रंथों को मात्र श्रद्धा का संग्रहित बिंदु माने जाने से आम जन की पहुंच इनसे दूर है।
साबला में निष्कलंक सम्प्रदाय के विश्व पीठ हरि मंदिर का चौपड़ा बसंत पंचमी को पूजा जाता है, जबकि दीवाली को तमाम चौपड़ों की पूजा की जाती है। वर्ष में केवल एक बार इन ग्रंथों को पूजन के लिए प्रकाशित किया जाता है। बरसों से होती रहने वाली पूजा से भी इनके चित्र एवं पृष्ठ खराब भी होते रहे हैं। विशेष अवसरों पर इनका पठन होता है और वह भी मावजी महाराज के प्रति अनन्य भक्ति रखने वाला जानकार व्यक्ति ही कर सकता है।
अब तो इस प्राचीन एवं दुर्लभ साहित्य को प्रकाश में लाने के लिए स्वयं पीठाधीश्वर गोस्वामी श्री अच्युतानन्दजी महाराज एवं मावजी फाउण्डेशन द्वारा व्यापक प्रयास किए गए हैं। इससे आम जिज्ञासुओं के लिए यह जानकारी पाना अत्यन्त सहज हो चला है।
लोगों की इन चौपड़ों के प्रति इतनी अगाध श्रद्धा है कि चौपड़ों में लिखा या बताया हुआ कभी असत्य हो ही नहीं सकता। आज समाज-जीवन, राष्ट्र-संसार में जो-जो भी परिवर्तन दिख रहे हैं उनकी झांकी मावजी के चौपड़ों में प्रतीकात्मक रूप से साफ वर्णित है।
मावजी महाराज द्वारा सृजित इन चौपड़ों को प्रकाश में लाकर इनके अध्ययन एवं शोध की प्रवृत्ति विकसित करने के मकसद से बेणेश्वर पीठाधीश्वर द्वारा सार्थक प्रयास किए जा रहे हैं। मावजी फाउण्डेशन की स्थापना और संग्रहालय विकसित करने के बाद इसमें गति आयी है।
इसमें मावजी महाराज के चौपड़ों में समाहित चित्रों, लिपियों आदि को प्रदर्शित किया गया है। जो भी लोग बेणेश्वर धाम आते हैं वे मनोयोगपूर्वक इस संग्रहालय में प्रदर्शित सामग्री को देखते हैं और संत मावजी महाराज एवं उनकी दिव्य परम्परा के प्रति अभिभूत होते हुए श्रृद्धा से सर झुकाकर कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं।