पुस्तक समीक्षा : मणि दर्शन जीवनमूल्यों की स्थापना करती उम्दा पुस्तक

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Published on : 30 Jan, 26 16:01

समीक्षक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल लेखक एवं पत्रकार, कोटा

पुस्तक समीक्षा : मणि दर्शन जीवनमूल्यों की स्थापना करती उम्दा पुस्तक

उदयपुर की लेखिका सुलेखा श्रीवास्तव की गद्य पुस्तक मनी दर्शन डाक से प्राप्त हुई। पुस्तक के शीर्षक से ही भान होता है यह आध्यात्म के विचारों से ओतप्रोत कृति होगी। याद आया जब रामेश्वरम दर्शन पर गए थे तो वहां प्रातः जल्द मणि दर्शन कराए जाते है। पुस्तक को खोल कर देखा और अध्ययन किया तो अंदाजा सही निकला। पुस्तक के सभी 60 अध्याय पाठक को आध्यात्म की ओर तो प्रेरित करते ही हैं साथ ही संस्कारित कर जीवन मूल्यों की स्थापना भी करते हैं। इस दृष्टि से पुस्तक अत्यंत उपयोगी और प्रेरक है। पुस्तक में संदर्भों को वर्तमान पारिवारिक और सामाजिक परिवेश और संदर्भों से भी बखूबी जोड़ा है। मूल विषय के नेपथ्य में चरमराते पारिवारिक ढांचे , बच्चे के जन्म लेने पर उस पर चिपकने वाले लेवल और कई सामाजिक विषमताओं से सावचेत करते हुए आँखें खोलती हैं लेखिका। पुस्तक का प्रत्येक अध्याय कोई न कोई संदेश देता है ,जो पाठक में नकारात्मक विचारों को दूर कर सकारात्मक भावना भरने का काम करता है। अध्यात्म के साथ मनुष्य में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करना भी लेखन का प्रमुख उद्देश्य है। इनके लेखों में इनके विचारों की गहराई और विषय के प्रति चिंतन साफ दिखाई देता है। भाषा इतनी सहज और सरल है कि बच्चों के भी समझ में आ जाए। लेखों की शैली कहीं - कहीं कथात्मक और वर्णनात्मक प्रतीत होती है। 
    दुनिया शीर्षक प्रथम अध्याय में दुनिया की उत्पत्ति,  वैश्विक जनसंख्या का विकास, सभ्यताओं  और संस्कृतियों का उदय, परंपराएं, रीत - रिवाज, जीवन शैली, व्यापार विनिमय के साथ मुद्रा का प्रचलन, भारत का  सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग से कलयुग को रेखांकित किया है। लेखिका कहती है कलयुग भी चरम तक पहुंच गया है और कुछ व्यक्ति दूसरों के साथ पशुओं से भी बत्तर व्यवहार करने लगे हैं। मानती हैं सत युग ने भी दस्तक दे दी हैं । सकारात्मक परिवर्तन और आध्यात्मिक विकास की संभावनाओं के द्वार भी खुले हैं। ( पृष्ठ 1)
     ध्यान अध्याय में ध्यान की यौगिक क्रिया की विभिन्न पद्धतियों से  एक फलने फूलने वाले उद्योग बनाने पर चिंता जताते हुए लिखती हैं ध्यान का मुख्य ध्येय है परम शांति प्राप्त करना जहां भय और दुःख के सभी बंधन समाप्त हो जाते है। आप एक स्थान पर बैठे हों और अपनी आंखें बंद करें। चाहे आप सक्रिय रूप से सोचें या न सोचें, आपकी ऊर्जा संचित होती है। यह किसी बाद्य गतिविधि में व्यय नहीं हो रही है। धीरे-धीरे, यह बची हुई ऊर्जा आपके मूलाधार चक्र में संग्रहित होने लगती है। जैसे ही आप एक निश्चित समय तक अपने विचारों को नियंत्रित करते हैं, ब्रह्मांड से आप पर आध्यात्मिक ऊर्जा बरसने लगती है। ऊर्जा को मूलाधार चक्र में एकत्र करने में समय लगता है। जब आपके शरीर में मौजूद सभी ऊर्जा मूलाधार चक्र में संग्रहित हो जाती है, तो यह चक्र खुलने लगता है और कुंडलिनी ऊपर उठने लगती है। इस क्षण को कुण्डलिनी जागरण के रूप में जाना जाता है। जब ऊर्जा ऊपर उठती है, तो यह सात चक्रों के माध्यम से गुजरती है, जिससे विविध अनुभव जैसे जीवंत रंग, प्राकृतिक दृश्य, भूतकाल और भविष्य की झलकियां और तकनीकी क्षमताएं उत्पन्न होती हैं। ( पृष्ठ 3)
   पंच तत्व से बने शरीर में प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने और नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित करने में मानव शरीर के सात चक्रों के महत्व को इसी शीर्षक लेख में बखूभी समझाया गया है। ये चक्र हैं मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र,अनाहत चक्र, विशुद्धि चक्र, सहसार अथवा आज्ञा चक्र। इनके महत्व को प्रतिपादित कर सकारात्मक जीवन जीने का मार्ग बताया गया है। ( पृष्ठ 38)
   विचारों की शक्ति, भावनाओं की शक्ति, बुद्धि की शक्ति, अहंकार, मन की सात परतें, मानव शरीर के सात रूप, आत्मा के सात गुण, मनुष्य की नौ शक्तियां, आसक्ति को समझे, आत्मज्ञान का मार्ग, चेतना ध्यान और एकाग्रता, मन के रहस्य,वैराग्य मार्ग, मुक्ति मार्ग, द्वैत अद्वैत , पूजा और भक्ति वैज्ञानिक कारण आदि रचनाएं आध्यात्मिक भाव से प्रेरित है और मनुष्य को आध्यात्म और सदाचार की और ले जाती हैं।
    परिवर्तन का मार्ग एक ऐसे सैन्य अधिकारी की कहानी है जो बार - बार चेतावनी के बाद अपनी गलतियों को नहीं सुधारता है और उसे बर्खास्त कर दिया जाता है। इसे वह अपना अपमान समझ कर गलतियों को सुधारता है और पुनः सेना में सैनिक के रूप में भर्ती हो जाता है। उसके बदले स्वरूप को देख कर सभी आश्चर्यचकित रह जाते हैं। युद्ध छिड़ने पर वह अदम्य साहस से अपना पराक्रम दिखता है जिसके लिए उसे राष्ट्रपति पदक और पदोन्नति मिलती है। लेखिका ने इसके माध्यम से बताने का प्रयास किया है कि अपनी गलतियों सुधार कर आदमी असफलताओं को पीछे छोड़ सकता है। ( पृष्ठ 115 )
  अवबोधन का महत्व बदलती हुई  परिवार व्यवस्था, टूटते पारिवारिक मूल्य, सोच में आ रहे परिवर्तनों और दो पीढ़ियों में पैठ कर गए वैचारिक अंतराल को बखूबी सामने लाने का प्रयास किया है। लड़कों से बराबरी करने और कैरियर बनाने में लड़कियों की निकलती विवाह उम्र, परिवार व्यवस्था को चुनौती देती है। जिन बातों को घर के बड़े बूढ़े आसानी से समझा देते हैं उसी के लिए परामर्श केंद्र खुल गए हैं। इस से बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि बूढ़े वृद्धाश्रम में बैठे हैं और बेटे परामर्श केंद्र पर।( पृष्ठ 184 )
     परिवर्तन प्रकृति का नियम है। जो कुछ हम देखते हैं, सोचते हैं अगले ही पल वह बदल जाता हैं। पूर्व जन्म किसने देखा पुनर्जन्म का पता नहीं जो इस जन्म वर्तमान है उसका काल खंड भी सीमित अपनी अपनी उम्र के हिसाब से हैं। इसी सत्य के भ्रम को लेखिका ने बड़ी खूबी से तर्क के साथ समझने का प्रयास किया है। ( पृष्ठ 189 )
    संग्रह की रचनाओं में संरक्षण की आवश्यकता, यथार्थ और छाया, कर्म का नियम, मन की शांति, क्या जीवन जटिल है, विकल्प और परिणाम, मानसिक स्थिरता, अवसर या अधिकार, एक बिंदु, अंतर्मन की आवाज आदि रचनाएं मानवमूल्यों की ओर प्रवृत्त करती हैं। 
   पुस्तक के आमुख में लेखिका लिखती हैं  कि मणि दर्शन एक गद्य पुस्तक है जिसमें आध्यात्मिक विषयों पर विशद विवेचन है जो आपके अंदर वैराग्य की भावना उत्पन्न करके आपके आध्यात्मिक विकास की यात्रा को गति प्रदान करते हैं।  जीवन को विभिन्न दृष्टिकोणों से आंकने की उनकी क्षमता का प्रतिनिधित्व करती है। में आध्यात्मिक विषयों का चयन कर मानव मात्र में सामान्यतः उम्र के साथ बदलती भावनाओं, विकासशील बुद्धि, दबे हुए दुखदायी मुद्दों, मानव स्वभाव में प्रतिबिंबित होने वाले मूल संस्कारों, मानव जीवन के सभी क्षेत्रों और चरणों में प्रभावशाली घटनाओं के प्रभाव की गहराई को सरल शब्दों की माला में पिरोकर चित्रित करने का प्रयास किया है।"
कह सकते हैं मानव की आध्यात्म की ओर प्रेरित कर जीवन मूल्यों की स्थापना की दिशा में एक उम्दा पुस्तक है।
पुस्तक : मणि दर्शन
लेखिका : सुलेखा श्रीवास्तव
प्रकाशन : हिमांशु पब्लिकेशन, उदयपुर
मूल्य : 295 ₹
प्रकार :पेपर बैक ,     पृष्ठ : 191

लेखिका परिचय:
सुलेखा श्रीवास्तव की लेखन यात्रा 13 वर्ष की उम्र में आरंभ हो गई थी जब  विद्यालय से प्रतिवर्ष प्रकाशित होने वाली पत्रिका में आपकी स्वरचित कविताएं प्रकाशित होती थी।
आपने हिंदी और अंग्रेजी विषयों में स्नातकोत्तर तथा बीएड की शिक्षा प्राप्त की है। आप हिन्दी एवं अंग्रेजी दोनों भाषाओं में  भजन, कहानी कविता मुक्त, रिपोर्ताज, आलेख एवं विनोद वार्ता लिखने में सिद्धहस्त हैं। आपकी रचनाएं  चैनलों, वेबसाइटों ,आकाशवाणी एवं विभिन्न अन्य मंचों पर प्रकाशित एवं प्रसारित होती  है तथा हिन्दी एवं अंग्रेजी समाचार पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होती हैं। अपने 33 वर्षों तक शिक्षा विभाग राजस्थान में अपनी निष्कलंक सेवाएं देने के उपरांत अधिवार्षिकी सेवानिवृत्ति प्राप्त की। आप कई वर्षों से भारतीय कला, संस्कृति, त्योहारों और विभिन्न अन्य विषयों के क्षेत्रों में अंग्रेजी समाचार पत्र "रॉयल हारबिंगर" की संपादकीय टीम को एक नई दिशा प्रदान करने के लिए, संपादकीय अनुभाग में सक्रिय रूप से सतत् प्रयत्नशील हैं।
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