“परमात्मा और आत्मा को जान कर आचरण को सुधारना है जिससे हमारा जीवन दिव्य जीवन बन जायेः आचार्य जगदीप आर्य”

( 1119 बार पढ़ी गयी)
Published on : 01 Feb, 26 17:02

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“परमात्मा और आत्मा को जान कर आचरण को सुधारना है जिससे हमारा जीवन दिव्य जीवन बन जायेः आचार्य जगदीप आर्य”

     आर्यसमाज धामावाला, देहरादून के आज दिनांक 1-2-2026 को आयोजित रविवारीय सत्संग में प्रातः 8.30 बजे से यज्ञशाला में यज्ञ सम्पन्न किया गया। यज्ञ के पश्चात भजन, सामूहिक प्रार्थना तथा ऋषि दयानन्द के जीवन चरित्र से कुछ अंशों का पाठ सुनाया गया। आज का प्रवचन देहरादून के आर्य विद्वान आचार्य जगदीप आर्य जी का हुआ। आचार्य जगदीप आर्य ने कहा कि जब मनुष्य की आत्मा में यह स्पष्ट हो जाये कि परमात्मा आत्मा में भीतर और बाहर व्यापक है और वह इस संसार और हमारे बारे में सब कुछ जानता है तब हम बुरे कर्मों से बच जाते हैं। उन्होंने कहा कि परमात्मा और आत्मा के विषय से सम्बन्धित सत्य ज्ञान का नाम ही अध्यात्म विद्या है। आचार्य जी ने कहा कि परमात्मा और आत्मा को जानकर मनुष्य को अपना जीवन व आचरण सुधारना होता है। ऐसा करने से हमारा जीवन दिव्य जीवन बन जाता है। हमारे पूर्वज ऋषि व मुनि जो वेदों के जानकार व अनुयायी थे, उनका जीवन दुरितों से सर्वथा दूर हुआ करता था। 

    आचार्य जगदीप आर्य जी ने कहा कि हमारे दुःखों का कारण हमारे जीवन के दोष हुआ करते हैं। उन्होंने कहा कि हमें परमात्मा की सर्वव्यापकता को जानना है और उसे अपने व्यवहार में लाना है। आचार्य जी ने श्रोताओं को बताया कि हमारे और परमात्मा के बीच दूरी नहीं है। अज्ञान होने के कारण हम परमात्मा से दूर रहते हैं। आचार्य जी ने कहा कि परमात्मा तो हमारी आत्मा के भीतर व बाहर हर तरफ है, आत्मा की परमात्मा से दूरी का प्रश्न ही नहीं है। आचार्य जगदीप आर्य जी ने कहा कि महर्षि दयानन्द जी ने अट्ठारहवीं शताब्दी के उत्तर काल में जब सारा देश व विश्व ईश्वर और आत्मा आदि के विषय में ज्ञान की दृष्टि से अन्धकार में थे, तब उन्होंने ईश्वर, आत्मा और प्रकृति का सत्य स्वरूप हमारे सामने रखा। उन्होंने कहा कि उस समय देश के लोग ईश्वर के सत्यस्वरूप के विषय में अनभिज्ञ व उससे विमुख थे। आचार्य जी ने कहा कि जीव वा आत्मा को एकदेशी व अल्पज्ञ होने के कारण साधनों अर्थात् शरीर, मन, कर्मेन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों की आवश्यकता होती है। परमात्मा को आचार्य जी ने सर्वदेशी, सर्वव्यापक व सर्वज्ञ बताया। इस कारण परमात्मा को हमारी तरह साधनों की आवश्यकता नहीं होती। आचार्य जी ने श्रोताओं को बताया कि परमात्मा इस संसार की रचना, पालन करने सहित इसकी अवधि पूर्ण होने पर इसकी प्रलय करते हैं। 

    आचार्य जगदीप आर्य ने कहा कि संसार में सुख अधिक हैं तथा दुःख सुखों की तुलना में कम हैं। परमात्मा के सत्य स्वरूप को जानने व धारण करने से हम काम, क्रोध, लोभ व मोह से बच जाते हैं। लोभ आदि दुर्गुणों से बचने के लिये हमें प्रतिक्षण ईश्वर को स्मरण रखना होता है। आचार्य जी ने कहा कि सत्य व यथार्थ ज्ञान हमारी आत्मा का भोजन होता है। ज्ञान से आत्मा तृप्त होती है। आचार्य जी ने सभी मनुष्यों, स्त्री, पुरुषों, युवक व युवतियों को वैदिक ग्रन्थों के स्वाध्याय की प्रेरणा की। आचार्य जी ने कहा कि मनुष्यों के द्वारा रचित अनार्ष कोटि के ग्रन्थों में ग्रन्थकारों की अल्पज्ञता के कारण सम्पूर्ण यथार्थ व सत्य ज्ञान नहीं होता। वेद, ऋषियों व आप्त पुरुषों के ग्रन्थों में अल्पज्ञता का दोष न होने के कारण उनके ग्रन्थों में उपलब्ध ज्ञान यथार्थ ज्ञान होता है। 

    आचार्य जी ने श्रोताओं को कहा कि यह सत्य सिद्धान्त है कि जिस का जन्म हुआ है उसकी मृत्यु अवश्य होगी। अच्छे व बुरे कर्मों का फल सभी मनुष्यों को इस जन्म व इसके बाद भी विभिन्न योनियों में जन्म लेकर भोगना पड़ता है। आचार्य जी ने कहा कि परमात्मा और आत्मा का यथार्थ ज्ञान होने पर मनुष्य निष्काम भाव से कर्मों को करता है और उसके बुरे परिणाम दुःख आदि उसको नहीं होते। आचार्य जी ने कहा कि परमात्मा के सत्य स्वरूप को जान लेने पर हमारा मोह व शोक दूर हो जाता हैं। आचार्य जी ने श्रोताओं को कहा कि हमें जितेन्द्रिय होकर अर्थात् अपनी सभी इन्द्रियों को अपने वश में करके अपने शरीर व इन्द्रियों का राजा बनना है। हम इन्द्रियों के दास न बने जिसका परिणाम दुःख होता है। आचार्य जी ने कहा कि ईश्वर को जान लेने पर मनुष्य संसार के किसी प्रलोभन से प्रभावित नहीं होता है। 

    आचार्य जी ने कहा कि हम मनुष्य योनि में जन्में हैं। मनुष्य योनि अन्य सभी योनियों से श्रेष्ठ है। मनुष्यों से इतर सभी योनियां भोग योनियां होती हैं जिनमें प्राणी अपने मनुष्य जीवन में किये हुए अशुभ व पाप कर्मों का फल भोगते हैं। मनुष्य योनि में ज्ञान को प्राप्त होकर आत्मा की उन्नति की जा सकती है। हम मनुष्य योनि में ज्ञान को प्राप्त होकर तथा साधना एवं सत्कर्मों को करके आवागमन वा जन्म-मरण के चक्र से छूट कर मोक्ष तक को प्राप्त हो सकते हैं। आचार्य जगदीप आर्य जी ने कहा कि महर्षि दयानन्द जी ने सत्य और असत्य तथा विद्या एवं अविद्या का परिचय कराकर हम पर महान कृपा की है। सत्य, ज्ञान व न्याय पर आधारित वैदिक परम्पराओं को प्रचलित करने के लिए ऋषि दयानन्द जी ने वेदों का प्रचार किया तथा इस काम को सुव्यवस्थित एवं दीर्घकाल तक करते रहने के लिये आर्यसमाज की स्थापना की थी। आचार्य जी ने कहा कि ईश्वर की उपासना हम केवल अपनी आत्मा से व शरीर से सत्य का आचरण करके ही कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि आत्मा और शरीर दोनों अलग अलग पदार्थ हैं। यह दोनों एक नहीं हैं। दोनों को एक मानने को उन्होंने अज्ञान व अविद्या बताया। आचार्य जी ने ऋषि दयानन्द जी के जीवन के साहस एवं निर्भीकता के उदाहरण भी प्रस्तुत किये। उन्होंने बताया कि उन्होंने बरेली में कलेक्टर आदि बड़े बड़े अंग्रेज अधिकारियों की उपस्थिति में ईसाई मत की असत्य बातों का खण्डन किया था। आचार्य जी ने कहा कि ऋषि दयानन्द ने ईश्वर विषयक वैदिक मान्यताओं पर किसी अन्य संस्था से जो वेदों के विपरीत मान्यतायें रखती थीं, किसी प्रकार का समझौता नहीं किया। ऋषि अपने जीवनपर्यन्त वेद प्रतिपादित ईश्वर के सत्य स्वरूप पर अडिग रहे। वैदिक सत्य सिद्धान्तों पर अडिग रहना उनके जीवन की विशेषता थी। 

    आचार्य जगदीप आर्य ने कहा कि शाश्वत सुखों की प्राप्ति और दुःखों की निवृत्ति के लिए धर्म के सत्य स्वरूप का पालन करना होगा। इसे उन्होंने ऋषि वचन बताया। सत्य व धर्म का पालन किये बिना हम अपने जीवन व आत्मा की रक्षा नहीं कर सकते। अपने व्याख्यान को विराम देते हुए आचार्य जगदीप आर्य जी ने कहा कि हमें परमात्मा की सर्वज्ञता व सर्वव्यापकता को समझना है और उसे जानकर इसके अनुकूल आचरण करना है। 

    कार्यक्रम का संचालन श्री नवीन भट्ट जी ने किया। उन्होंने आज के सुन्दर व ज्ञानवर्धक व्याख्यान के लिये आचार्य जगदीप आर्य जी का धन्यवाद भी किया। पं. विद्यापति शास्त्री ने शान्ति पाठ के मन्त्र का पाठ कराया। आज आर्यसमाज के सत्संग में बड़ी संख्या में स्त्री पुरुष उपस्थित थे। कार्यक्रम में उपस्थित कुछ प्रमुख नाम हैं श्रीमती जगवती चैधरी, श्रीमती स्नेहलता खट्टर, श्रीमती सुदेश भाटिया जी, श्री प्रताप सिंह रोहिल्ला, श्री कुलभूषण कठपालिया, श्री मदन मोहन जी, श्री सतीश आर्य जी, श्री धीरेन्द्र मोहन सचदेव, श्री पवन कुमार, श्री बसन्त कुमार, श्री देवेन्द्र सैनी एवं श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम के बच्चे। ओ३म् शम्। 
-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः09412985121
 


साभार :


© CopyRight Pressnote.in | A Avid Web Solutions Venture.