‘सनातन संस्कृति की अटल दृष्टि’ केवल एक राजनेता की जीवनी या विचार-संग्रह नहीं है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता, संस्कृति और राष्ट्रबोध को समझने का एक वैचारिक प्रयास है। राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने इस पुस्तक के माध्यम से भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन, चिंतन और कार्यों को सनातन संस्कृति की दृष्टि से देखने का सार्थक प्रयास किया है। यह कृति अटल जी के व्यक्तित्व को राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठाकर एक सांस्कृतिक और नैतिक प्रतिमान के रूप में स्थापित करती है।
पुस्तक का केंद्रीय भाव यह है कि अटल बिहारी वाजपेयी केवल एक कुशल राजनीतिज्ञ या प्रधानमंत्री नहीं थे, बल्कि वे भारतीय सनातन संस्कृति के जीवंत प्रतिनिधि थे। लेखक मानते हैं कि अटल जी की सोच, भाषा, व्यवहार और निर्णयों में भारतीय सभ्यता के शाश्वत मूल्य सहिष्णुता, समन्वय, मानवता, करुणा और राष्ट्रप्रेम स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। पुस्तक में यह स्थापित किया गया है कि अटल जी का राष्ट्रवाद आक्रामक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास से उपजा हुआ था।
वासुदेव देवनानी अपनी इस पुस्तक में सनातन संस्कृति की परिभाषा को संकीर्ण धार्मिक दायरे से बाहर निकालकर एक व्यापक जीवन-दर्शन के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार सनातन का अर्थ है जो शाश्वत है, जो समय के साथ बदलता नहीं, बल्कि समय को दिशा देता है। अटल बिहारी वाजपेयी इसी सनातन चेतना के वाहक थे। चाहे संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में दिया गया उनका ऐतिहासिक भाषण हो या विपक्ष में रहते हुए भी लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन—हर प्रसंग में लेखक सनातन मूल्यों की झलक दिखाते हैं।
पुस्तक की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसमें अटल जी के प्रमुख राजनीतिक निर्णयों को सांस्कृतिक दृष्टि से समझने का प्रयास किया गया है। पोखरण परमाणु परीक्षण को केवल सामरिक निर्णय न मानकर लेखक उसे राष्ट्र की आत्मसम्मान और स्वाभिमान से जोड़ते हैं। इसी प्रकार, सड़क, संचार और आधारभूत ढांचे से जुड़ी योजनाओं को ‘राष्ट्र निर्माण के यज्ञ’ के रूप में देखा गया है। लेखक यह तर्क देते हैं कि अटल जी का विकास मॉडल केवल भौतिक उन्नति तक सीमित नहीं था, बल्कि वह सांस्कृतिक और मानवीय विकास को भी समान महत्व देता था।
शैली की दृष्टि से पुस्तक सरल, प्रवाहपूर्ण और प्रभावशाली है। भाषा न तो अत्यधिक दार्शनिक है और न ही शुष्क राजनीतिक। यही कारण है कि यह पुस्तक सामान्य पाठकों, विद्यार्थियों और युवा पीढ़ी के लिए भी सहज रूप से पठनीय बन जाती है। लेखक का अनुभव और वैचारिक स्पष्टता हर अध्याय में महसूस होती है। कई स्थानों पर अटल जी के विचार, कथन और घटनाएं पाठक को भावनात्मक रूप से भी जोड़ती हैं।
पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि इसमें अटल बिहारी वाजपेयी को एक आदर्श लोकतांत्रिक नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेखक बताते हैं कि सत्ता में रहते हुए भी अटल जी ने कभी अहंकार को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। विरोधियों के प्रति सम्मान, संवाद की संस्कृति और संसदीय मर्यादाओं के प्रति उनकी प्रतिबद्धता आज के राजनीतिक परिदृश्य में और अधिक प्रासंगिक प्रतीत होती है। पुस्तक अप्रत्यक्ष रूप से यह प्रश्न भी उठाती है कि क्या आज की राजनीति अटल जी के मूल्यों से कुछ सीख लेने को तैयार है?
हालाँकि, पुस्तक का वैचारिक झुकाव स्पष्ट है और यह अटल जी के व्यक्तित्व का अत्यंत सकारात्मक चित्र प्रस्तुत करती है। आलोचनात्मक विश्लेषण की अपेक्षा करने वाले पाठकों को यह पक्ष थोड़ा सीमित लग सकता है। फिर भी, पुस्तक का उद्देश्य आलोचना नहीं, बल्कि प्रेरणा देना है—और इस कसौटी पर यह पूरी तरह सफल होती है।
निष्कर्ष रूप में ‘सनातन संस्कृति की अटल दृष्टि’ एक प्रेरक, विचारोत्तेजक और समयानुकूल कृति है। यह पुस्तक अटल बिहारी वाजपेयी को समझने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति और राष्ट्रचिंतन को भी गहराई से समझने का अवसर देती है। जो पाठक अटल जी के विचारों, सनातन संस्कृति के मूल्यों और भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को जानना चाहते हैं, उनके लिए यह पुस्तक अवश्य पठनीय है। यह केवल अटल जी को स्मरण करने की पुस्तक नहीं, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात करने का आमंत्रण है।
राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी द्वारा लिखित इस पुस्तक “सनातन संस्कृति की अटल दृष्टि” का भव्य लोकार्पण विगत 23 दिसम्बर को माननीय उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन द्वारा उपराष्ट्रपति एनक्लेव, नई दिल्ली में गरिमामय वातावरण में किया गया । इस अवसर पर केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी, केन्द्रीय कृषि राज्य मन्त्री भागीरथ चौधरी , राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख माननीय सुनील आम्बेकर, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के अध्यक्ष मिलिंद मराठे उपराष्ट्रपति के सचिव अमित खरे,भाजपा के नेता वी.सतीश,जयपुर के पूर्व सांसद रामचरण बोहरा सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।
पुस्तक लेखक विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी, कहते है कि मुझे संघ ने गढ़ा है। लंबे समय तक शिक्षा से जुड़ा रहा हूं। अटलजी के जन्मदिवस को सुशासन के रूप में मनाया जाता है। अटलजी संसदीय परंपराओं के गहन अध्येता थे। उनके जीवन आदर्शों ने मुझे पुस्तक लिखने और सनातन संस्कृति के आलोक में अटलजी के जीवन को देखने को प्रेरित किया। वह संघ प्रचारक, राजनेता और देश के प्रधानमंत्री बने। संघ ऐसे लोगों को गढ़ता है। संघ से निकला व्यक्ति कैसे सनातन की अलख जगाता है। इस बारे में पुसतक में एक अलग से भाग है। मैंने राजस्थान के शिक्षा मंत्री के रूप में पाठ्यपुस्कतों को ठीक करने का काम भी किया। बात चाहे बीर सावरकर की हो या अकबर महान के स्थान पर महाराणा प्रताप महान की हो। इसके लिए मुझे काफी कुछ झेलना पड़ा लेकिन इसकी प्रेरणा मुझे संघ से ही मिली है। संसद में अटलजी के भाषण सहज और सरल होते थे। उनकी पहचान जननेता की थी। अटल जी संसदीय संस्कति का पूरा अध्याय थे। उनमें भाषा के प्रति गर्व की अनुभूति थी। वह समभाव से सुशासन की दृष्टि रखते थे। सनातन संस्कृति के आलोक में अटलजी के व्यक्तित्व को देखने की जरूरत है। पुस्तक लिखने का यह मेरा पहला प्रयास है।
पुस्तक का प्रकाशक प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली के प्रभात कुमार और पीयूष कुमार ने किया है । पुस्तक का प्रकाशक करने के लिए उनसे मिले सहयोग के लिए आभारी हूँ ।