वर्ल्ड कैंसर डे के अवसर पर उदयपुर की एक ऐसी शख्सियत से बातचीत की गई, जो न सिर्फ कैंसर की भयावहता को नजदीक से देख चुकी हैं, बल्कि चार बार इस बीमारी को मात देकर आज भी दूसरों के लिए आशा की किरण बनी हुई हैं।
हम बात कर रहे हैं डॉ. रेनू खमेशरा की—वरिष्ठ न्यूरो फिजिशियन, आरएनटी मेडिकल कॉलेज, उदयपुर से 2006 में एसोसिएट प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त। सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका सेवा भाव थमा नहीं। आज भी वे जरूरतमंदों को निशुल्क न्यूरोलॉजिकल सलाह और जांच उपलब्ध कराती हैं। उनके क्लिनिक के दरवाजे कभी बंद नहीं होते।
डॉ. रेनू खमेशरा को पहली बार 1994 में कैंसर हुआ—वह भी शादी से मात्र 15 दिन पहले। साधारण पेट दर्द समझा गया यह मामला जांच में गंभीर ओवरी कैंसर निकला, जो फटकर पूरे एब्डोमेन में फैल चुका था। स्थानीय इलाज के बाद उन्हें टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल, मुंबई रेफर किया गया।
“मैंने डॉक्टरों से कहा—यहाँ मैं डॉक्टर नहीं, सिर्फ मरीज हूँ। जैसा कहेंगे, वैसा ही करूंगी,”
डॉ. रेनू कहती हैं।
तीन कीमोथेरेपी के बाद भी सुधार नहीं हुआ। हालत बिगड़ती चली गई—हीमोग्लोबिन 3, काउंट 1000 और यूरिन आउटपुट बेहद कम। दोबारा सर्जरी में एक छिपी हुई कैंसर ग्रंथि निकली। उसके बाद जैसे चमत्कार हुआ और हालत सुधरने लगी।
इसके बाद 1995, 2002 और फिर 2023 में कैंसर ने दोबारा दस्तक दी। तीसरी बार आंतों में ऑब्स्ट्रक्शन हुआ, इमरजेंसी सर्जरी और कीमोथेरेपी करानी पड़ी। लंबे इलाज के दुष्प्रभावों से आंखों की रोशनी चली गई, नसें खराब हो गईं, फ्रैक्चर हुए—लेकिन हौसला नहीं टूटा।
2023 में एक सामान्य सीटी स्कैन में अचानक चौथा कैंसर सामने आया—इस बार यह न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर था। कोई लक्षण नहीं, कोई दर्द नहीं।
डॉ. रेनू ने सर्जरी से पहले मेडिकल कॉन्फ्रेंस अटेंड की, फिर ऑपरेशन कराया।
सर्जरी के मात्र 5 दिन बाद, पेट पर 36 टांकों के साथ उन्होंने फिर से ड्यूटी जॉइन कर ली।
डॉ. रेनू मानती हैं कि 1994 और आज के कैंसर इलाज में ज़मीन-आसमान का फर्क है।
“आज लोग दो-तीन कैंसर के साथ भी सामान्य और खुशहाल जीवन जी रहे हैं। सबसे ज़रूरी है—डरना नहीं, समय पर इलाज कराना और हौसला बनाए रखना।”
वर्ल्ड कैंसर डे के स्लोगन “I Am, I Will” को वे अपने जीवन का मंत्र मानती हैं।
कैंसर से जूझने के बावजूद डॉ. रेनू की सोच हमेशा आगे की रही। वे उदयपुर में DNB Neurology कोर्स शुरू कराने के लिए प्रयासरत हैं, ताकि नई पीढ़ी के डॉक्टर क्लीनिकल स्किल्स और मानवीय संवेदना दोनों सीख सकें।
“आज मशीनें बहुत हैं, लेकिन मरीज को सुनना और समझना सबसे बड़ी दवा है,” वे कहती हैं।
बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं पर डॉ. रेनू का कहना है—
“जीवन ईश्वर का दिया हुआ उपहार है। कठिनाइयाँ भगवान राम, कृष्ण और शिव ने भी देखीं, लेकिन जीवन नहीं छोड़ा। सेवा, धैर्य और उद्देश्य ही जीवन को अर्थ देते हैं।”
उनका मानना है कि माता-पिता का आचरण, संस्कार और परिवार की भूमिका आज पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
डॉ. रेनू खमेशरा सिर्फ कैंसर सर्वाइवर नहीं हैं—
वह जिंदगी से जीतने की मिसाल हैं।
वर्ल्ड कैंसर डे पर उनकी कहानी यह सिखाती है कि
बीमारी बड़ी हो सकती है, लेकिन इंसान का हौसला उससे कहीं बड़ा।