दयालु व दूरदर्शी के साथ राष्ट्रवादी सोच के मालिक थे महाराजा सूरजमल

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Published on : 13 Feb, 26 17:02

दयालु व दूरदर्शी के साथ राष्ट्रवादी सोच के मालिक थे महाराजा सूरजमल

हनुमानगढ़। महाराजा सूरजमल संगठन द्वारा भारतवर्ष के अजेय महायोद्धा, भरतपुर संस्थापक, अद्भय वीरता, त्याग और उदारता के प्रतीक अजेय योद्धा महाराज सूरजमल की 319 वीं जयंती सिविल लाइन्स में मनाई गई। संगठन की महिला विंग सदस्यों ने जाटों के प्लेटो धर्म रक्षक अफलातून महाराज सूरजमल के छायाचित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धा सुमन अर्पित किए। उनके वीरता पूर्वक किए गए कार्यों को याद किया। संगठन की जिलाध्यक्ष किरण जान्दू ने कहा कि महाराज सूरजमल किशोरावस्था से ही बहुत ताकतवर, साहसी यौद्धा, धैर्यवान, गंभीर, दयालु व दूरदर्शी तथा राष्ट्रवादी सोच के मालिक थे। दूरदर्शी सोच के कारण ही उन्होंने अजेय दुर्ग लोहागढ़ की स्थापना की थी। वीर शिरोमणि महाराजा सूरजमल का जन्म 13 फरवरी 1707 को भरतपुर के सिनसिनी गांव में हुआ था। कांता भादु ने कहा कि राजा सूरजमल ने अपने जीवन काल में मुगलो व अन्य राजाओ से 80 युद्ध लड़े और सभी मे विजय प्राप्त की भरतपुर के लोहागढ़ किले पर 13 बार आक्रमण करने के उपरांत भी कभी मुगल व अन्य किले को जीत नही पाए। महाराज सूरजमल के नेतृत्व में जाटों ने मुगलों को परास्त कर आगरा, फरुक्खाबाद से लेकर बिजनौर, पानीपत, दिल्ली तक के क्षेत्र पर अपना अधिकार कर लिया था। सुनीता रेवाड़ ने कहा कि 25 दिसम्बर 1763 की रात को दिल्ली के शाहदरा इलाके के पास हिंडन नदी के किनारे पर मुगल सेना द्वारा घात लगाकर किए गए एक हमले में महाराज सूरजमल वीरगति को प्राप्त हुए थे। महाराज की वीरता और शौर्य का मुगलों में इस कद़र खौफ था कि मृत्यु के पश्चात भी मुगलों को सहज ही ये विश्वास नहीं हुआ था कि सूरजमल मारे गए। मुगल शासक ये कहते थे कि 'जाट मरा तब जानिए जब तेरहवीं हो जाएं।' सुलोचना मांझू ने संबोधित करते हुए कहा कि महाराज सूरजमल ऐसे महान प्रतापी और पराक्रमी यौद्धा थे जो दोनों हाथों से तलवार चलाते थे। उन्होंने एक गरीब ब्राह्मण की लड़की को बचाने के लिए 'धर्म रक्षा' हेतु दिल्ली को फतेह किया था। इस मौके पर सोफिया झोरड़, कांता गोदारा, नीलम भादु, समायरा चौधरी, रेणु जाखड़, सुमन सहारण, अंकिता सिहाग आदि मौजूद रही।
 


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