मुंबई के NMACC के ग्रैंड थिएटर में एक यादगार संध्या देखने को मिली, जब राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक महेश काले ने बुडापेस्ट स्कोरिंग ऑर्केस्ट्रा के साथ मंच साझा किया। यह पहली बार था जब भारतीय शास्त्रीय संगीत का संगम एक पूर्ण वेस्टर्न सिम्फ़ोनिक ऑर्केस्ट्रा के साथ इस तरह प्रस्तुत किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत महेश काले ने अपने दिवंगत गुरु पंडित जितेंद्र अभिषेकी को नमन करते हुए राग जोग की शांत और भावपूर्ण प्रस्तुति से की। इसके बाद ऑर्केस्ट्रा धीरे-धीरे संगीत में शामिल हुआ और बिना शास्त्रीय भाव को प्रभावित किए, सुरों को एक नई गहराई दी। भारतीय रागदारी और पश्चिमी हार्मनी के इस मेल ने तुरंत ही सुनने वालों का मन मोह लिया। संध्या में शुद्ध शास्त्रीय रचनाओं से लेकर उप-शास्त्रीय, रागमाला, अभंग और महेश काले की मौलिक रचनाएँ प्रस्तुत की गईं। कार्यक्रम में ‘लागी कलेजवा कटार’, ‘छाप तिलक’, ‘हे सुरांनो चंद्र व्हा’, ‘जानकी नाथ’ और ‘झीनी रे झीनी’ जैसी प्रस्तुतियाँ शामिल रहीं। इन सभी रचनाओं को ऑर्केस्ट्रा का भव्य साथ मिला, लेकिन उनकी भारतीय आत्मा और भाव पूरी तरह बरकरार रहे।
सैन फ्रांसिस्को में आधारित महेश काले भारतीय शास्त्रीय संगीत को नए श्रोताओं तक पहुँचाने के लिए जाने जाते हैं। इस सहयोग के बारे में बताते हुए महेश काले ने कहा, “इस विचार की शुरुआत मेरे मित्र और संगीत निर्देशक राहुल रानाडे ने की थी। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत और वेस्टर्न सिम्फ़नी के बीच एक अनोखे सहयोग का सुझाव दिया, कुछ ऐसा, जो पहले कभी नहीं हुआ था। बाद में अनुभवी संगीतकार और अरेंजर कमलेश भड़कामकर टीम से जुड़े और इस प्रोजेक्ट ने आकार लेना शुरू किया।”
इस उपलब्धि को और भी खास बनाता है यह तथ्य कि महेश काले और बुडापेस्ट स्कोरिंग ऑर्केस्ट्रा की मुलाकात कार्यक्रम से केवल तीन दिन पहले ही हुई थी। इसके बावजूद मंच पर उनकी तालमेल वर्षों पुरानी लग रही थी। मध्य यूरोप में स्थित, प्रतिष्ठित बुडापेस्ट स्कोरिंग ऑर्केस्ट्रा सदियों पुरानी यूरोपीय संगीत परंपरा को अत्याधुनिक एनालॉग और डिजिटल रिकॉर्डिंग सुविधाओं के साथ एकीकृत करता है। ऑर्केस्ट्रा के सीईओ Balint Sapzson ने कहा, “हम पहली बार 100 प्रतिशत भारतीय शास्त्रीय संगीत प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय शास्त्रीय संगीत और वेस्टर्न सिम्फ़नी का यह मेल हमारे समझ से बिल्कुल नया है, और यही बात हमारे लिए इसे बेहद रोमांचक बनाती है।”
ऑर्केस्ट्रा के कंडक्टर George Gulyas-Nagy ने भी इस भावना को दोहराते हुए कहा कि अलग-अलग संगीत परंपराओं से आने के बावजूद कलाकारों के बीच तुरंत एक अनकहा रिश्ता बन गया। उन्होंने कहा, “हमारी लय, स्वर और संरचना अलग हैं, फिर भी हमने बिना शब्दों के एक-दूसरे को समझ लिया। संगीत सच में एक अंतरराष्ट्रीय भाषा है। महेश काले न केवल बेहद प्रतिभाशाली हैं, बल्कि बहुत पेशेवर भी हैं, जिससे यह सहयोग सहज और स्वाभाविक बन गया।”
कार्यक्रम के अंत में महेश काले ने कहा, “खुशियों के पल बहुत क्षणिक होते हैं।” इस यादगार शाम का समापन उन्होंने भगवान विट्ठल को समर्पित एक भावपूर्ण रचना से किया, जिसके बाद ‘कानड़ा राजा पंडरीचा’ प्रस्तुत किया गया और दर्शकों को साथ गाने के लिए आमंत्रित किया गया। अंत में श्रोता मंच के पास आए और कलाकारों को नमन किया—यह केवल संगीत का नहीं, बल्कि संस्कृतियों, दूरियों और दिलों को जोड़ने का भी एक सुंदर क्षण बना।