गाँव, संस्कृति और साहित्य से ही मजबूत होगा भारत : पद्मश्री श्याम सुंदर पालीवाल

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Published on : 27 Feb, 26 18:02

चित्तौड़गढ़ साहित्य उत्सव–2026 : तीसरे दिन विचार, विमर्श और काव्य का विराट संगम

गाँव, संस्कृति और साहित्य से ही मजबूत होगा भारत : पद्मश्री श्याम सुंदर पालीवाल

चित्तौड़गढ़ । 21वीं सदी के राजस्थान साहित्यिक आंदोलन की श्रृंखला में आयोजित चित्तौड़गढ़ साहित्य उत्सव–2026 के तीसरे दिन विचार, संस्कृति, पत्रकारिता, सिनेमा और कविता का अद्भुत संगम देखने को मिला। दिनभर चले विविध सत्रों में देश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों, विद्वानों और कलाकारों ने भागीदारी की।

तीसरे दिवस के उद्घाटन सत्र में पद्मश्री श्याम सुंदर पालीवाल, श्री कल्लाजी वैदिक विश्वविद्यालय के चेयरमेन श्री कैलाश मूंदड़ा, दिल्ली दूरदर्शन के सम्पादक डॉ. ओ.पी. यादव, राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता श्री चिन्मय भट्ट तथा 21वीं सदी के राजस्थान साहित्यिक आंदोलन के संस्थापक प्रवर्तक श्री अनिल सक्सेना ‘ललकार’ की गरिमामयी उपस्थिति रही।

पद्मश्री श्याम सुंदर पालीवाल ने अपने उद्बोधन में कहा कि गाँव, संस्कृति और साहित्य की सशक्त परंपरा ही भारत को आत्मनिर्भर, जागरूक और मजबूत राष्ट्र बना सकती है। वक्ताओं ने भारतीय संस्कृति, शिक्षा, मीडिया की जिम्मेदारी और साहित्य की सामाजिक भूमिका पर सारगर्भित विचार व्यक्त किए।

पुस्तक परिचर्चा सत्र में ‘सुधियों के झरोखे से’ की लेखिका डॉ. राखी सिंह से डॉ. नयना डालीवाल ने संवाद किया। वार्ता में स्मृतियों, संवेदनाओं और समकालीन समाज में स्त्री लेखन की भूमिका पर गंभीर चर्चा हुई।
भारतीय संस्कृति, साहित्य और पत्रकारिता सत्र में दिल्ली दूरदर्शन के सम्पादक डॉ. ओ.पी. यादव (दिल्ली) , लोकेश कुमार सिंह ‘साहिल’ (जयपुर), भुवनेश व्यास (चित्तौड़गढ़), किशन रतनानी (कोटा) और डॉ. विदुषी आमेटा (दरभंगा) ने भाग लिया। वक्ताओं ने कहा कि भारतीय पत्रकारिता को अपनी जड़ों और सांस्कृतिक दृष्टि से जुड़े रहकर समकालीन चुनौतियों का सामना करना होगा।
‘भारत 2047’ : भाषा, संस्कृति और विचार की दिशा सत्र में डॉ. अर्जुन चव्हाण (कोल्हापुर), डॉ. आनन्दवर्धन शुक्ल (जयपुर), निशांत मिश्रा (जयपुर) और डॉ. वीणा जोशी (जयपुर) ने भारत के अमृतकाल की सांस्कृतिक रूपरेखा, भाषा की भूमिका और वैचारिक आत्मनिर्भरता पर अपने विचार रखे।
लेखन एवं रचनात्मक कार्यशालाएँ रचनात्मक सत्र में डॉ. गोविंद गुप्ता, शिव मृदुल, डॉ. रमेश मयंक, डॉ. विदुषी और डॉ. मनीषा दाधीच ने नवोदित रचनाकारों को लेखन की बारीकियों, शिल्प और विषय चयन के व्यावहारिक आयामों से परिचित कराया।
सिनेमा, टीवी और ओटीटी कंटेंट : कानून, नैतिकता और दर्शक अधिकार सत्र में कलाकार डॉ. आनन्दवर्धन शुक्ल, फिल्म निर्माता चिन्मय भट्ट, फिल्म कलाकार ब्रजेश कुमार मिश्रा और नीलम प्रजापति ने भाग लिया। चर्चा में कंटेंट की स्वतंत्रता, सामाजिक जिम्मेदारी और दर्शकों के अधिकारों पर संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया।
उल्लेखनीय है कि गुरुवार को देर रात्रि तक चले राष्ट्रीय काव्य गोष्ठी में देश के विविध अंचलों से आए कवियों ने काव्य पाठ कर वातावरण को भावमय बना दिया। अध्यक्षता श्री लोकेश कुमार सिंह ‘साहिल’ (जयपुर) ने की तथा मुख्य अतिथि श्री अर्जुन गणपति चव्हाण (कोल्हापुर) रहे। विशिष्ट अतिथियों में श्री आलोक ‘अविरल’ (नोएडा) और श्री प्रमोद रामावत उपस्थित रहे।
काव्य पाठ करने वाले प्रमुख रचनाकारों में श्री अब्दुल जब्बार (चित्तौड़गढ़), श्री चेतन आनंद (गाजियाबाद), डॉ. सारंगदेव ‘असीम’ (बिजनौर), डॉ. शकुंतला सरूपरिया (उदयपुर), डॉ. राखी सिंह (बड़ोदरा), डॉ. नयना डालीवाल (अहमदाबाद), श्री गोविंद गुप्ता (लखीमपुर-खीरी), श्री निशांत मिश्रा (जयपुर), श्री प्रशांत मिश्रा (लखीमपुर-खीरी), श्री किशन रतनानी (कोटा), श्री दिनेश दीवाना (भीलवाड़ा), श्रीमती वीना जोशी (जयपुर), डॉ. अवधेश जोहरी (भीलवाड़ा), श्रीमती वंदना योगी (नीमच), श्रीमती आरती शर्मा (उदयपुर) सहित
रमेश मयंक, शिव मृदुल, अमृत वाणी, पंडित नन्द किशोर निर्झर, अब्दुल सत्तार, सुनील बाटू और मुन्नालाल डाकोत ने अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
तीसरे दिन का समापन राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक चेतना और साहित्यिक प्रतिबद्धता के संदेश के साथ हुआ। समस्त सत्रों का समन्वय शांति सक्सेना ने किया। अतिथियों का स्वागत शाश्वत सक्सेना ने किया। 
चित्तौड़गढ़ की ऐतिहासिक धरती पर तीन दिवसीय यह महाउत्सव साहित्य, संस्कृति और विचार के नवसंवाद का सशक्त मंच बनकर उभरा।


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