फागुनी लोक लहरियों पर थिरक रही हैं अरावली की वादियां

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Published on : 01 Mar, 26 17:03

- डॉ.  दीपक आचार्य

फागुनी लोक लहरियों पर थिरक रही हैं अरावली की वादियां

राजस्थान का समूचा वनवासी बहुल दक्षिणांचल वागड़ क्षेत्र होली के रंगों में सराबोर है और सदियों पुरानी आकर्षक परम्पराओं का अद्भुत नज़ारा इन दिनों हर किसी का मन मोह रहा है। हवाओं में फागुनी रसों की भीनी-भीनी महक तैरने लगी है और फिज़ाओं में लोक रस्मों के जाने कितने रंग रह-रहकर मदमस्ती का ज्वार उफना रहे हैं।

ख़ासकर मालवा और गुजरात की लोक संस्कृतियों को अपने में आत्मसात किए हुए सीमावर्ती डूँगरपुर और बाँसवाड़ा दोनों जिलों में शहरों और गाँवों का माहौल होली की पारम्परिक लोक रस्मों से भर आया है। इन दिनों वाग्वर अंचल में होली की अनूठी परम्पराओं भरा माहौल हर किसी का मन मोहने लगा है।

वनवासी इलाकों में अरावली की उपत्यकाओं से रह-रहकर ढोल-कौण्डियों, चंग और टाँसों के साथ ही परम्परागत लोक वाद्यों की स्वर लहरियाँ और फागुनी गीत प्रतिध्वनित हो रहे हैं।

फागणिया गान और गैर नृत्यों की धूम

समूचे वनवासी अंचल डूंगरपुर और बांसवाड़ा में फागुनी रंगों का माहौल परवान चढ़ता जा रहा है। इन दिनों तमाम गांवों और शहरों में गैर की टोलियां ढोल-नगाड़ों, कौण्डियों और थालियों की आवाजों पर फागणिया गायन की परंपरा यौवन पर हैं वहीं गैर नृत्यों की धूम मची हुई है। महूए की मादक गंध भी जहां-तहां हवाओं में घुलने लगी है।

प्रतिध्वनित हो रही लोक वाद्यों की धुनें

आदिवासी बहुल दोनों जिलों में होली के दो दिन पहले से ही गांवों में देर रात तक चौराहों पर विभिन्न समुदायों और वर्गों के लोगों द्वारा उल्लास का इज़हार करने कई-कई ढोल, कौण्डों और अन्य लोक वाद्यों की तान दूर-दूर तक फैलकर पहाड़ों से प्रतिध्वनित होने लगी है। वागड़ के कई गांवों में होली के बाद तक इन लोक वाद्यों का सामूहिक वादन जारी रहेगा।

सामाजिक लोकोत्सव  ‘ढूँढ़’ की धूम

पूरे वनांचल में इन दिनों शिशुओं की पहली होली के उपलक्ष में सामाजिक रस्म भरे लोकोत्सव ‘ढूण्ढ’ का माहौल यौवन पर है। होली के दो-चार दिन पहले से शुरू हो जाने वाला यह लोकोत्सव उन हजारों परिवारों में शादी-ब्याह जैसा ही मांगलिक आयोजन बना हुआ है, जिसमें संतान की पहली होली है।

इसके उपलक्ष में इन परिवारों में ढूंढ के अनुष्ठान जारी हैं। इसके अन्तर्गत शिशु के विभिन्न अनिष्टों के निवारण की कामना से पूजा-अर्चना व लोक रस्मों को पूरा करने के बाद इन शिशुओं को घर-परिवार के लोग तथा नाते-रिश्तेदार नवीन वस्त्र उपहार स्वरूप भेंट करते हैं। इन वस्त्रों को स्थानीय भाषा में ‘फईयरयू’ या ‘ढूण्ढिया’कहते हैं।

पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक होली पर ढूण्ढा नामक राक्षसी अपने प्रभाव से शिशुओं का रक्त शोषण कर उन्हें बीमार कर देती है। होली के दिनों में बच्चों को इस राक्षसी के प्रकोप से मुक्त रखने के लिए वागड़ अंचल भर में लोग नन्हें बच्चों खासकर इस वर्ष जन्मे शिशुओं को होलिका दहन स्थलों पर ले जाते हैं।

होलिका की तपन देती है सुकून

जिन बच्चों की ढूंढ़ पूर्व के वर्षो में हो चुकी होती है उन्हें  भी होलिका की परिक्रमा करवायी जाती है। इसके अलावा बड़े-बूढ़े लोग भी जलती होली की विषम संख्या में परिक्रमा करते हैं।

लोगों का पुराने समय से विश्वास चला आ रहा है कि  होलिकाग्नि से तपे बालकों की व्याधियां एवं अनिष्ट समाप्त हो जाते हैं। इसके अलावा होलिका दहन स्थलों पर सामाजिक लोक रस्म ढूण्ढ के सामूहिक आयोजनों की धूम भी रहती है।

आरोग्य एवं दीर्घायु के लिए ढूण्ढ

होली से पहले परिवार में जन्म लेने वाले पहले बालक की ढूण्ढ को विवाह के बराबर की मान्यता है। आकर्षक परिधानों एवं आभूषणों में सुसज्जित बालक को घर-परिवार के लोग शुभ मुहूर्त में परिजनों के समूह के साथ गाजे-बाजे से होलिका दहन स्थल पर ले जाते हैं।  ये समूह जलती होली के इर्द-गिर्द घेरा लगाकर बैठे और पण्डित के द्वारा मंत्रोच्चार से होलिका पूजन-अर्चन तथा बाल रक्षा मंत्रों का अनुष्ठान कराते हैं। नवजात शिशु के दीर्घायु एवं आरोग्य की कामना से ‘वारिये उतारने’ की खास रस्म पूरी की जाती है। इसमें लकड़ी के वारिये (डण्डियों) खाली मटकी में बजाते रहकर शिशु को इसकी आवाज सुनाई जाती है। इसके उपरान्त माता या पिता बच्चे को गोद में लेकर होलिकाग्नि की परिक्रमा करते हैं। होलिका दहन स्थलों पर जमा समूहों द्वारा सामूहिक ढूण्ढ की रस्म पूरी होने के बाद बच्चों को लेकर होलिकाग्नि की परिक्रमा की जाती है।

बड़े-बुजुर्ग भी आगामी वर्ष में आरोग्य एवं अनिष्ट शमन की कामना से जलती होली की विषम संख्या में परिक्रमा करते हैं। घर-परिवार में सामूहिक भोज, बतौर उपहार वस्त्र भेंट करने आदि के आयोजन इन दिनों होली के दिन या आस-पास जारी रहते हैं। लोग जलती होली में नारियल डाल कर इसे वापस निकालते व प्रसाद बांटते हैं। समूचे वागड़ अंचल में पिछले दो-चार दिन से इस पुरातन लोक रस्म की रंगत दिखाई दे रही है।

 यों बंटती है मिठास

वागड़ अंचल भर में  होली सिर्फ मदमस्ती भरे रंगों  और उल्लास के रंगों का त्योहार ही नहीं है बल्कि सामाजिक सौहार्द और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का पैगाम गुंजाने वाला वह पर्व है जिसमें सामाजिक सद्भाव की मिठास बंटती है। गांवों में आज भी होली के दिनों में घर-घर गुड़ बांटने की प्रथा चली आ रही है।

पहली संतानोत्पत्ति और ढूण्ढ की खुशी में सभी को हिस्सेदार बनाने ढूण्ढ वाले बालक के परिवार की ओर से घर-घर आधा किलो/एक किलो या निश्चित मात्रा में गुड़ वितरित किया जाता है।

हर्बल रंग

रसायनिक एवं हानिकारक रंगों के प्रचलन के दौर में आज भी ग्राम्यांचलों में कई लोग ऐसे हैं जो वानस्पतिक रंगों का प्रयोग करते हैं। ये लोग टेसू और अन्य वृक्षों के पुष्पों से बने रंगों का प्रयोग करते हैं।

फागोत्सव और लोक लहरियों का ज्वार

वाग्वर अंचल भर में होली और इलाकों की तरह सिर्फ एक-दो दिन चलकर सिमट नहीं जाती बल्कि होली के रंग पखवाड़े भर तक धूम मचाते हैं। मन्दिरों में  फागोत्सव के आयोजन शुरू हो चुके हैं जो देर रात तक चलने लगे हैं। होली के सौन्दर्य-श्रृंगार भरे भजन-कीर्तनों के आयोजन भक्तों को भाव-विभोर करने लगे हैं। इसके साथ ही चंग की थाप पर पूरे माहौल में फगुनाहटी लोक लहरियाँ घुलती रहकर लोक जीवन को आह्लादित करने लगी हैं।

बरस रहा अपार उल्लास

समूचे वागड़ में इन दिनों फागुनी परिवेश और होली को लेकर खासा जोश बना हुआ है। पर्वतीय अंचलों में दूरदराज की पालों-ढाणियों, फलों से लेकर गांव, कस्बों, शहरों और सीमावर्ती इलाकों में लोक लहरियों से पूरा परिवेश होली के रंग बरसा रहा है।

समूचे वनांचल में होली पर ढेरों अनूठी परंपराएं युगों से विद्यमान रही हैं जिनका दिग्दर्शन करना ही रोमांच भरा है। लेकिन अपेक्षित प्रचार-प्रसार के अभाव में यह राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया की पहुंच से दूर रही हैं।


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