फागुन की मौज-मस्ती में नहा रहा है वागड़

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Published on : 01 Mar, 26 17:03

- डॉ. दीपक आचार्य

फागुन की मौज-मस्ती में नहा रहा है वागड़

                यों तो जीवन के अनेकानेक रंग हैं पर फागुन का कहना ही क्या। वसंत के बाद फागुन की चंग पर पड़ती मादक थाप से जीवन की लय और ताल जब वनवासियों के मानस पटल पर उतरती है तो नृत्य की अपनी विशिष्ट उमंग का वातावरण हर ओर छा जाता है।

                यह फागुन ही है जो हर तरफ मदमस्त बयारों के साथ मादक उल्लास का ज्वार उमड़ता है। दक्षिणांचल की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान त्योहारों, मेलों, हाट-बाजारों और रहन-सहन के तौर तरीकों से प्रतिभासित होती है।

                उमड़ता है उल्लास के रस-रंगों का ज्वार

                आम आदमी के जीवन में विडंबना व यथार्थ की जो त्रासदी है उससे अधिक अभावग्रस्त होने के बावजूद पर्वों को अपने जीवन के साथ एक रस कर ग्राम्य समुदाय अनन्य ढंग से जीवन जीते हुए आनन्दित होता है, जैसे आनंद के अवसर उपस्थित करते हुए मौज-मस्ती का उल्लास प्राप्त करना इनके जीवन की विलक्षण कला है।

                वागड़ संस्कृति के सर्वोत्कृष्ट आह्लादकारी रंग फागुन में परिलक्षित होते हैं जो न केवल एक-दो दिन बल्कि पूरे पखवाड़े और माह-माह भर तक अपनी गंध बिखेरते हैं। इस अंचल में इन दिनों हर कहीं छाए हुए फागुन के रंगों को देख लगता है मानों प्रकृति ने इस ऋतु के सारे रंग वनवासी अंचल पर छिटका दिए हैं।

                आम तौर पर कृषि कर्म से जीवनयापन करने वाले ग्रामीण जनजाति भाई फसल की कटाई हो चुकने तथा शीतलहर की ठंढ़ी बयारों से निजात पाने के बाद फुरसत का अहसास करते हैं तब वासंती हवाओं से मन प्राणों को सींचते हुए फागुन की ओर मुखातिब होते हैं। यही तो वे दिन हैं जब लगता है जैसे मौज-मस्ती का पूरा आलम ही गली कूँचों, गांव-बीहड़ों, ढांणियों में उतर आया है।

                विवाहोत्सव की धूम

                फागुन ही तो है जब आदिवासी अंचलों में विवाहोत्सव के गीत और रंगों की अजस्र धाराएं बह निकलती हैं। गांव-शहर हो या गली-मोहल्ले, चौबारे, हर कहीं हर तरफ वनवासी दुल्हे-दुल्हन अपने नाते रिश्तेदारों व मित्रों की टोली के साथ मांगलिक दर्शन सहज ही करा देते हैं। शरीर पर हल्दी की गाढ़ी पीठी का उबटन लगाए, गले में फूल-हार, परंपरागत परिधानों, रजत एवं स्वर्ण के आभूषणों से लदे हुए तथा हाथ में रंग-बिरंगे रुमाल से लिपटी कटार या तलवार लिए यत्र-तत्र छाये रहते हैं। तब इन तरुण-तरुणियों का रूप लावण्य नैसर्गिक शोभा बढ़ाता लगता है वहीं वातावरण में सर्वत्र इसकी अजीब सी खुनक हवा के साथ तैरती रहती है।

                जब ये दूल्हे-दुल्हन शहरों में आते हैं तब इनके परिचित एवं रिश्तेदार पुष्पहार खरीद कर इन्हें गले में पहनाते हैं व पान का बीड़ा खिलाते हैं। इससे जहां होठ लाल सूर्ख बने रहते हैं वहीं पूरा शरीर पुष्पहारों से भर जाता है और लगता है मानों किसी दूसरे लोक से देवी-देवताओं का अवतरण हो गया हो।

                मुग्ध करती हैं मनोहारी परम्पराएं

                ढोल-ढमाकों, कौण्डियों, कांसे की थालियों, तम्बूरे, नन्हें नगाडे़ आदि सुलभ वाद्यों को गाते-बजाते नृत्य करते जब दूल्हा-दुल्हनों की बरातें गुजरती हैं तो चारों और परम्परागत और आह्लादकारी वनवासी रंगों की बौछारें उन्मुक्त हास्य बिखेरती हैं। तब का दृश्य इतना मनमोहक होता है कि राहगीर तक ठहर कर इन नजारों का आनंद लेने में मग्न हो जाते हैं। यही नहीं तो हर मार्ग पर चलने वाली बसों की छतों पर बैठी बारातों द्वारा ढोल-ढमाकों की गूंज का भी जवाब नहीं। आदिवासियों में विवाहों के दौरान ऐसी-ऐसी परंपराएं हैं जो मनोरंजन के विविध रंगों को सामाजिक दर्शन से जोड़ती है।

                घोटिया आम्बा मेले में होता है समापन  

                मालवा, राजस्थान और गुजरात की जनजाति बहुल संस्कृतियों के इस महात्रिवेणी स्थल में करीब एक माह तक चलने वाले फागुनोत्सव पर्व का महामिलन घोटिया आम्बा तीर्थ पर लगने वाले मेले में होता है। जहां फागुनी अंदाज में पुराने वर्ष को विदा किया जाता है और नव वर्ष के स्वागत में जश्न मनाए जाते हैं। जंगल में मंगल की उक्ति को इस मेले में शत-प्रतिशत सार्थक हुआ देखा जा सकता है।

                घोटिया आंबा स्थल अत्यंत प्राचीन एवं पौराणिक तीर्थ है, जहां वनवास के दौरान पाण्डव रहे हैं। बांसवाड़ा जिला मुख्यालय से चालीस किलोमीटर दूर पहाड़ों के बीच अवस्थित इस दुर्गम तीर्थ पर फाल्गुन अमावस्या (अमान्त पद्धति के अनुसार) को बड़ा भारी मेला लगता है जो इस अंचल का सबसे बड़ा मेला है।

                यहां वर्ष संक्रमणोत्सव का पूरा-पूरा माहौल करीब तीन-चार दिन तक छाया रहता है। तीनों ही पड़ोसी राज्यों के कोई तीन-चार लाख वनवासी अपने परिजनों के साथ इस मेले में हिस्सा लेते हैं। इन दिनों मेले का चप्पा-चप्पा वनवासी लोक संस्कृति के विभिन्न रंगों और रसों से परिपूर्ण हो उठता है।

                मेलार्थी यहां आकर पाण्डवों के शौर्य, त्याग एवं पराक्रम का स्मरण करते हैं तथा प्राचीन शिवालय घोटेश्वर महादेव, रामजी, हनुमान आदि देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना एवं दर्शन कर अपने आपको धन्य मानते हैं। यहाँ के पवित्र भीमकुण्ड में स्नान और कदली वृक्षों तथा साल के पौधों का भी अपना विशेष महत्व है।

                घोटिया आंबा मेला फागुनी रंगों के मिलन एवं मदनोत्सव का प्रमुख धाम है, जहां वेदनाएं पलायन कर जाती हैं, वर्ष बदल जाता है और इसका स्थान ले लेती हैं, नववर्ष की अथाह  प्रेम और उल्लास भरी शुरूआत...।


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