लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव गिरा: संसदीय परंपराओं की बड़ी परीक्षा में रहे सफल

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Published on : 11 Mar, 26 17:03

गोपेन्द्र नाथ भट्ट 

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव गिरा: संसदीय परंपराओं की बड़ी परीक्षा में रहे सफल

संसद के उच्च सदन के समान ही लोकसभा भी लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्थाओं में से एक है, जहां सदन की कार्यवाही को निष्पक्ष और सुव्यवस्थित ढंग से चलाने की जिम्मेदारी लोकसभा अध्यक्ष की होती है। बुधवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाया गया अविश्वास प्रस्ताव सदन में गिर गया। सदन में हमेशा हसमुख रहने वाले ओम बिरला राजस्थान के कोटा संसदीय क्षेत्र के सांसद है। वे अविश्वास प्रस्ताव पर चली बहस के दौरान नैतिकता का पालन करते हुए अपने आसन पर नहीं बैठे और लोकसभा का संचालन सभापति पेनल के सदस्यों ने किया।


लोकसभा में अध्यक्ष के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। सरकार की ओर से जवाब देते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष पर जोरदार हमला किया और विशेष रूप से नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस नेता राहुल गाँधी को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि विपक्ष लोकतांत्रिक संस्थाओं को राजनीतिक हथियार बनाकर संसद की कार्यवाही को बाधित करने का प्रयास कर रहा है।
सदन में बोलते हुए अमित शाह ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने हमेशा निष्पक्षता और संसदीय नियमों के अनुसार सदन की कार्यवाही का संचालन किया है। इसके बावजूद विपक्ष द्वारा उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना केवल राजनीतिक नाटक है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, लेकिन संस्थाओं को कमजोर करना किसी भी तरह उचित नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी और विपक्ष के कुछ नेता संसद की गंभीरता को समझने के बजाय केवल राजनीतिक लाभ के लिए मुद्दों को उछालते हैं। शाह ने कहा कि संसद बहस और नीति निर्माण का मंच है, न कि आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति का अखाड़ा।उन्होंने यह भी कहा कि जब भी अध्यक्ष नियमों के अनुसार कार्यवाही चलाते हैं और हंगामे के कारण सदन की व्यवस्था बनाए रखने के लिए कदम उठाते हैं, तब विपक्ष इसे पक्षपात बताने लगता है। शाह के अनुसार यह रवैया लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप नहीं है।
चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि सरकार विपक्ष की आलोचना से नहीं डरती, बल्कि स्वस्थ बहस का स्वागत करती है। लेकिन यदि विपक्ष केवल अवरोध और हंगामे की राजनीति करेगा तो इससे संसद का समय और जनता का विश्वास दोनों प्रभावित होंगे। उन्होंने विपक्ष से आग्रह किया कि वे सदन में रचनात्मक भूमिका निभाएं और जनता के मुद्दों पर सार्थक चर्चा करें।

इस घटनाक्रम ने भारतीय संसदीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दे दिया है कि क्या लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका पूरी तरह निष्पक्ष रहती है या राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों से प्रभावित होती है।लोकसभा अध्यक्ष के पद को भारतीय लोकतंत्र में अत्यंत गरिमामय और निष्पक्ष सर्वोच्च संसदीय पदों में से एक माना जाता है। अध्यक्ष का दायित्व होता है कि वह सभी दलों को समान अवसर देते हुए सदन की कार्यवाही को नियमों के अनुसार संचालित करें। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया था कि सदन की कार्यवाही के संचालन में सरकार को अधिक प्राथमिकता दी जा रही है और विपक्ष को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहा है। इन्हीं आरोपों के आधार पर विपक्षी दलों ने अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का निर्णय किया।
हालांकि जब यह प्रस्ताव सदन में चर्चा के लिए आया तो सत्ता पक्ष ने इसे पूरी तरह निराधार बताया। सरकार समर्थक सांसदों का कहना था कि अध्यक्ष ने हमेशा संसदीय परंपराओं और नियमों के अनुसार ही कार्यवाही चलाई है। उनका तर्क था कि विपक्ष द्वारा लाया गया यह प्रस्ताव राजनीतिक रणनीति का हिस्सा मात्र है, जिसका उद्देश्य सदन के कामकाज को प्रभावित करना है।चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने अपने-अपने तर्क रखे। विपक्ष का कहना था कि लोकतंत्र में असहमति की आवाज को दबाया नहीं जाना चाहिए और अध्यक्ष को सभी दलों के प्रति समान व्यवहार करना चाहिए। वहीं सत्ता पक्ष ने कहा कि संसद के नियमों के अनुसार ही निर्णय लिए गए हैं और अध्यक्ष की निष्पक्षता पर सवाल उठाना संसदीय गरिमा के खिलाफ है। 

अंततः जब सदन में प्रस्ताव पर मतदान हुआ तो यह प्रस्ताव बहुमत हासिल नहीं कर सका और गिर गया। इसके साथ ही अध्यक्ष के पद पर ओम बिरला का विश्वास बरकरार रहा। यह परिणाम स्पष्ट संकेत देता है कि सदन में सरकार के पास पर्याप्त समर्थन मौजूद है और विपक्ष की रणनीति अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी।इस घटनाक्रम का राजनीतिक महत्व भी कम नहीं है। एक ओर विपक्ष ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा का प्रयास बताया, वहीं सत्ता पक्ष ने इसे अनावश्यक विवाद पैदा करने वाला कदम करार दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद में इस प्रकार के प्रस्ताव अक्सर राजनीतिक संदेश देने के लिए भी लाए जाते हैं। भारत की संसदीय परंपरा में अध्यक्ष का पद दलगत राजनीति से ऊपर माना जाता है। जब कोई सांसद अध्यक्ष चुना जाता है तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वह पूरी तरह निष्पक्ष होकर कार्य करे। इसी कारण से अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव जैसी घटनाएं अपेक्षाकृत कम देखने को मिलती हैं। इसलिए यह प्रकरण अपने आप में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विश्लेषकों का यह भी मानना है कि संसद में संवाद और सहमति की परंपरा को मजबूत करना समय की आवश्यकता है। यदि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद की कमी बढ़ती है तो ऐसे विवाद बार-बार सामने आ सकते हैं। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि सभी पक्ष एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करते हुए संसदीय मर्यादाओं का पालन करें।
अंततः यह कहा जा सकता है कि लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव भले ही गिर गया हो, लेकिन इसने संसदीय कार्यप्रणाली, विपक्ष की भूमिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संसद में सहयोग और संवाद की संस्कृति किस प्रकार आगे बढ़ती है और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को किस तरह बनाए रखा जाता है।

इधर वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव, युद्ध जैसी परिस्थितियों और आर्थिक अनिश्चितता के बीच भारत की राजनीति में भी तीखी बयानबाजी देखने को मिल रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने एक बयान में  आरोप लगाया है कि वैश्विक संकट में कांग्रेस राजनीति कर रही है। जब दुनिया कई संकटों से जूझ रही है, तब भी कांग्रेस राष्ट्रीय हित से ऊपर राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता दे रही है।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान समय में दुनिया अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध जैसे हालात, ऊर्जा संकट, महंगाई और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता ने कई देशों को प्रभावित किया है। ऐसे समय में भारत को एकजुट होकर इन चुनौतियों का सामना करना चाहिए, लेकिन कांग्रेस लगातार सरकार की नीतियों का विरोध करके राजनीतिक माहौल को गर्माने की कोशिश कर रही है।
मोदी ने कहा कि जब देश कठिन दौर से गुजर रहा होता है, तब जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका सरकार को रचनात्मक सुझाव देने की होती है। लेकिन कांग्रेस और उसके कुछ नेता केवल आरोप लगाने और विवाद खड़ा करने की राजनीति कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि संसद और सार्वजनिक मंचों पर देश की उपलब्धियों को भी नकारने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है।
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत ने हाल के वर्षों में वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत पहचान बनाई है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, आर्थिक सुधार और विकास योजनाओं के माध्यम से देश की स्थिति लगातार मजबूत हुई है। उनके अनुसार ऐसे समय में राष्ट्रीय एकता और सहयोग की आवश्यकता होती है, लेकिन कांग्रेस का रवैया इसके विपरीत दिखाई देता है।
उन्होंने कांग्रेस पर यह आरोप भी लगाया कि पार्टी कई मुद्दों पर देश के हितों के बजाय राजनीतिक लाभ के लिए बयान देती है। प्रधानमंत्री के अनुसार वैश्विक संकट के समय राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता देना ही सही दृष्टिकोण है। हालांकि कांग्रेस इन आरोपों को स्वीकार नहीं करती। पार्टी का कहना है कि लोकतंत्र में सरकार की नीतियों की आलोचना करना विपक्ष का अधिकार और जिम्मेदारी दोनों है। कांग्रेस का तर्क है कि वह जनता से जुड़े मुद्दों को उठाती है और सरकार को जवाबदेह बनाने का प्रयास करती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार और विपक्ष के बीच यह टकराव भारतीय लोकतंत्र का सामान्य हिस्सा है। हालांकि वैश्विक संकट के दौर में यह बहस और भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि राजनीतिक दल किस हद तक राष्ट्रीय हित और राजनीतिक रणनीति के बीच संतुलन बनाए रखते हैं।
कुल मिलाकर इन बयानों ने देशम  एक बार फिर राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि वैश्विक चुनौतियों के बीच भारतीय राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है और सरकार तथा विपक्ष किस तरह अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं।


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