जगत जगदीश का तो, संसार मनुष्य काः किरीट भाई

( 687 बार पढ़ी गयी)
Published on : 30 Mar, 26 15:03

जगत जगदीश का तो, संसार मनुष्य काः किरीट भाई


उदयपुर। तुलसी परिवार व नन्दी वन वैदिक गौशाला धाम भुज के तत्वावधान में ए.एस.राठौड़ की ओर से भुवाणा रोड़ स्थित देेवेन्द्र धाम में आयोजित हो रही भागवत कथा में ब्रह्मऋषि किरिट भाई ने उपस्थित श्रद्धालुओं को जगत, जीव, परमात्मा और संसार के बीच सम्बन्धों के बारे में बताते हुए कहा कि जगत तो जगदीश का होता है और संसार मनुष्य का होता है। संसार में काम क्रोध, मोह, माया, लोभ के साथ ही भोग विलास का प्रमुख सिान होता है जबकि जगदीश द्वारा बनाये गये जगत में जल, अग्रि, वायु, पेड़-पौधे होते हैं। कई बार संसार में रहने वाला जीव अपने आपको परमात्मा से भी बड़ा समझने लगता है। उसकी परमात्मा में कोई आस्था नहीं होती है। जबकि बिना परमात्मा में आस्था के जीवन शुण्य होता है, अगर परमात्मा में जीव आस्था नहीं करेगा तो उसका कभी कल्याण भी नहीं होगा।
किरिट भाई ने कहा कि भागवत कथा मात्र कोई कथा ही नहीं है बल्कि यह तत्वज्ञान है।  इसमें निष्काम भक्ति, परमात्मा से मिलन और ज्ञान-वैराग्य की प्राप्ति है। यह कथा सिखाती है कि संसार में रहते हुए भी भगवान के प्रति समर्पण, कथा श्रवण और हरि स्मरण से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं और जीव को मोक्ष मिलता है। यह वेदों का निचोड़ है, जो जीवन का अंतिम लक्ष्य परम तत्व की प्राप्ति बताता है। भगवत कथा श्रवण करनें मात्र से जीव भोग से मुक्ति पाकर योग की तरफ आ जाता है। जो भोगी होते हैं उनके लिए संसार है लेकिन जो योगी है उनके लिए परमात्मा हैं। जीवन में अगर कुछ पाना है, अपना कल्याण करना है तो परमात की स्तुति तो करना ही चाहिये। परमात्मा की स्तुति करने से आत्मज्ञान होता है। जिसे आत्मा का ज्ञान होता है वही परमात्मा के बारे में समझ सकता है। क्योंकि आत्मा सो परमात्मा। अगर आपकी आत्मा शुद्ध है, आपने अपने ज्ञान, ध्यान, योग, भक्ति- भाव और स्तुति से आत्मा को जीत लिया या उस पर विजयी प्राप्त कर ली तो समझलो आपकी आत्मा और परमात्मा के बीच की दूरी भी खत्म हो गई और आपकी आत्मा परमात्मा में विलीन हो गई है। इसलिए अगर जगदीश के जगत में प्रवेश करना है तो अध्यात्म और परमात्मा की भक्ति और स्तुति से नाता जोड़े रखना होगा और अगर जीवन को संसार ही रास आ रहा है तो फिर भोग-विलास और सांसारिक मोह- माया से कभी पीछा छूट ही नहीं सकता और अगर ऐसा ही चलता रहा तो मोक्ष और मुक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती।


साभार :


© CopyRight Pressnote.in | A Avid Web Solutions Venture.