नई दिल्ली | पर्यावरणीय सुस्थिरता, पारिस्थितिक विवेक, प्रकृति के साथ मानवीय सामंजस्य, पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान तथा पंचमहाभूत (भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश) के संतुलन पर आधारित भारतीय जीवनदृष्टि से ही वैश्विक पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान निकलेगा तथा जैव विविधता समृद्ध होगी।
यह विचार विद्या भवन पॉलिटेक्निक, उदयपुर के प्राचार्य एवं पर्यावरण चिंतक डॉ. अनिल मेहता ने जन संचार एवं पत्रकारिता प्रशिक्षण के राष्ट्रीय संस्थान, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन (आईआईएमसी) नई दिल्ली ,में सोमवार को आयोजित विशेष शिक्षण सत्र में व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि भारत का वैज्ञानिक ज्ञान पर्यावरण विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान, मनोविज्ञान, नैतिकता और आध्यात्मिकता को समग्र रूप में समाहित करता है। भारतीय ज्ञान परंपरा पारिस्थितिकी संरक्षण और मानवीय जिम्मेदारियों के संतुलित निर्वहन का संदेश देती है।
मेहता ने बढ़ती पर्यावरणीय आपदाओं, जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिकी असंतुलन पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो मानवता गंभीर संकट का सामना करेगी। पूरे विश्व में युद्ध व्यापक हो रहे है जो केवल मानव जीवन ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय तंत्र को भी गहरी क्षति पहुंचा रहे हैं, जिसका दुष्प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा।
डॉ. मेहता ने कि इन संकटों का समाधान करुणा व अहिंसा पर आधारित भारतीय वैज्ञानिक पर्यावरण दर्शन, पृथ्वी को माता मानने की संस्कृति तथा पंचमहाभूत आधारित जीवनशैली में है । भारतीय पर्यावरण दृष्टि एवं परंपराए प्रकृति के प्रति सात्विक आचरण को प्रेरित करती है।
उन्होंने संसाधनों के संतुलित उपयोग पर जोर देते हुए ईशोपनिषद के “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा…” सूत्र का उल्लेख किया और इसे सर्कुलर बायोइकोनॉमी, जीरो-वेस्ट जीवनशैली तथा सुस्विथिर विकास का आधार बताया।
मेहता ने "हरित" , हॉलिस्टिक एक्शंस फॉर रिवाइटलाइजेशन ऑफ इंडीजिनस ट्रेडिशंस की अवधारणा को जन-जन तक पहुंचाने में पत्रकारिता के विद्यार्थियों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
डॉ. मेहता ने कहा कि प्रचलित "ग्रीन" का सिद्धांत ग्रीड को कम नहीं करता जबकि ‘हरित’ में समस्त प्राकृतिक स्रोतों में 'हरि’ के दर्शन का भाव है। केवल “ग्रीन” अवधारणा पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रकृति में दिव्यता का अनुभव ही वास्तविक समाधान है।
मेहता ने तकनीक-केंद्रित दृष्टिकोण के बजाय जीवनशैली-केंद्रित दृष्टिकोण का आह्वान किया और संतुलित, संयमित तथा प्रकृति-पूजक जीवनशैली अपनाने की आवश्यकता बताई।
शिक्षण सत्र का आयोजन प्रो संगीता प्रणवेंद्र तथा प्रखर अग्रवाल के संयोजकत्व में हुआ।