उदयपुर आनंद मार्ग प्रचारक संघ, उदयपुर डायोसिस यूनिट के टेकरी-मादरी रोड स्थित जागृति परिसर में दिनांक 10 से 12 अप्रैल 2026 तक प्रथम चरण के त्रिदिवसीय डिट स्तरीय सामाजिक-आध्यात्मिक सेमिनार का आयोजन हुआ. सेमिनार का शुभारम्भ शुक्रवार को आनंद मार्ग के संस्थापक श्री श्री आनंदमूर्ति जी की प्रतिकृति पर माल्यार्पण तथा दीप प्रज्ज्वलन द्वारा हुआ. तत्पश्चात सभी साधकों ने अष्टाक्षरी एक प्रहरीय अखंड कीर्तन 'बाबा नाम केवलम' के गायन द्वारा हरिपरिमण्डल का गठन किया. इसके बाद स्वाध्याय में कीर्तन की महत्ता पर प्रकाश डाला गया. इस अष्टाक्षरी सिद्ध महामंत्र कीर्तन के भावपूर्ण गायन से सभी जागतिक, मानसिक तथा मानसाध्यत्मिक क्लेशों का निवारण होता है.
शनिवार तथा रविवार को सेमिनार के मुख्य प्रशिक्षक डॉ. एस. के. वर्मा ने 'साधना', 'तंत्र साधना और समाज पर उसके प्रभाव', 'प्रगति और पञ्च वेदना' तथा सेमिनार की आवश्यकता एवं साधक के जीवन में गुरु सकाश, पांचजन्य तथा षोडश विधि के महत्व जैसे विषयों पर गहन पर चर्चा की गयी.
उन्होंने बताया की आध्यत्मिक साधना, साधक के जीवन में समस्त आंतरिक और बाहरी बाधाओं के विरुद्ध संग्राम है जो शाक्त अवस्था से प्रारम्भ होकर वैष्णवी अवस्था द्वारा शिवत्व में प्रतिष्ठित करती है. वास्तव में साधना ही तंत्र और तंत्र ही साधना है जो अष्ट पाश व षडरिपु के बंधनों से मुक्त कर मन को विस्तृत करते हुए परम चैतन्य अवस्था में ले जाती है. तंत्र साधना में प्रतिष्ठित व्यक्ति ही समाज की अग्रगति में सहायक होता है. प्रगति का अर्थ शुभ से परम शुभ की और चलना होता है जो जागतिक तथा मानसिक क्षेत्रों में संभव नहीं है. अतः वास्तविक प्रगति केवल आध्यात्मिक जगत में होती है जहाँ मनुष्य, असीमित सत्ता को पाने के प्रयास में अपने उद्गम स्थल पर पुनः लौट आता है. यह लौटना ही मानव जीवन का चरम लक्ष्य है.
सेमिनार में डायोसिस तथा रीजनल सेक्रेटरी आचार्य ब्रजप्राणानंद अवधूत और महिला डायोसिस सेक्रेटरी अवधूतिका आनंद कृष्णा आचार्या के निर्देशन में आसन, कौशिकी, तांडव, प्रभात संगीत, आवर्त कीर्तन, मिलित ईश्वर प्रणिधान, वर्णाध्यान,और स्वाध्याय पाठ हुआ. सेमिनार में उदयपुर, भिंडर, कानोड़, खेताखेड़ा, राजसमंद आदि से आये साधको ने भाग लिया.