लेखक: भगवान प्रसाद गौड़, उदयपुर
भारतीय संविधान के निर्माता भीमराव अंबेडकर की जयंती के शुभ अवसर पर अति पिछड़े वर्ग के चेहरे के रूप में उभरे सम्राट चौधरी को बिहार जैसे विशाल राज्य का मुख्यमंत्री घोषित करना केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं बल्कि एक प्रतीकात्मक संदेश भी है। यह कदम न केवल ऐतिहासिक बनने की क्षमता रखता है बल्कि राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी नीतीश कुमार को अप्रत्याशित रूप से चुनौती देने जैसा भी है।
बिहार की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी ने लगभग तीन दशकों तक अपने मुख्यमंत्री के लिए इंतजार किया। यह केवल धैर्य नहीं था बल्कि परिस्थितियों के साथ एक ऐसी रणनीति थी जिसमें जनादेश को भी एक कथा की तरह बुना गया। जहाँ केंद्र में कभी नीतीश कुमार और उनकी पार्टी रही।
इसी बीच पश्चिम बंगाल में चल रहे चुनावों के परिप्रेक्ष्य में यह फैसला एक व्यापक राजनीतिक संदेश भी देता है कि भाजपा अब क्षेत्रीय समीकरणों को नए तरीके से गढ़ रही है।
बिहार में मुख्यमंत्री की कुर्सी मानो नीतीश कुमार के नाम का पर्याय बन चुकी थी। ऐसे में उन्हें मनाने या दबाव में लाने की रणनीति क्या रही। यह अपने आप में एक राजनीतिक रहस्य है। लेकिन इतना तय है कि इस घटनाक्रम ने इंडी गठबंधन को एक अप्रत्यक्ष संदेश जरूर दिया है।
अब सवाल यह है कि आने वाले समय में निशांत कुमार की राजनीतिक भूमिका क्या होगी? केंद्र की राजनीति में नीतीश कुमार की स्थिति कितनी मजबूत होगी? और सबसे बड़ा प्रश्न - क्या जनता उस वादे को भूल जाएगी, जिसमें 2025-30 तक नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाए रखने की बात कही गई थी?
राजनीति में वादों के अर्थ बदलते देर नहीं लगती लेकिन जब यह बदलाव बार-बार होने लगे तो नैतिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
शायद यही कारण है कि आज की राजनीति को देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि
“बीजेपी को समझना मुमकिन ही नहीं, नामुमकिन है।”