नीति गोपेन्द्र भट्ट
राजस्थान के दक्षिणी अंचल में स्थित डूंगरपुर नगर अपने समृद्ध इतिहास, प्राकृतिक सौंदर्य और अद्भुत स्थापत्य कला के लिए जाना जाता है। इन्हीं ऐतिहासिक धरोहरों में एक अनोखा और आकर्षक स्थल है। डूंगरपुर की ऐतिहासिक और सुरम्य झील गैप सागर के किनारे उदय विलास पैलेस में स्थित एक थंबा महल, जो अपनी विशिष्ट बनावट और कलात्मकता के कारण लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचता है।
एक थंबा महल, नाम से ही स्पष्ट है कि यह महल एक ही स्तंभ (थंबा) पर आधारित संरचना का अद्भुत उदाहरण है। यह स्थापत्य कला का ऐसा नमूना है, जो न केवल उस समय की तकनीकी दक्षता को दर्शाता है, बल्कि शिल्पकारों की कल्पनाशीलता और सृजनात्मकता का भी प्रमाण प्रस्तुत करता है। माना जाता है कि इस महल का निर्माण राजवंशीय काल में हुआ था, जब शासक अपनी कलात्मक रुचि और वैभव को स्थापत्य के माध्यम से अभिव्यक्त करते थे।
महल की संरचना देखने में जितनी सरल प्रतीत होती है, उतनी ही जटिल इसकी निर्माण प्रक्रिया रही होगी। एक ही स्तंभ पर टिके इस भवन में संतुलन और मजबूती का अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है। पत्थरों की नक्काशी, दीवारों पर बनी कलाकृतियाँ और पारंपरिक राजस्थानी शैली इसे विशेष बनाती हैं। यह महल उस दौर के इंजीनियरिंग कौशल का भी उत्कृष्ट उदाहरण है, जब आधुनिक तकनीक उपलब्ध नहीं थी, फिर भी इतनी सुदृढ़ संरचनाएँ बनाई गईं। स्थानीय लोगों के बीच एक थंबा महल को लेकर कई रोचक कथाएँ और मान्यताएँ भी प्रचलित हैं। कुछ लोग इसे शासकों के विश्राम स्थल के रूप में देखते हैं, तो कुछ इसे किसी विशेष उद्देश्य से निर्मित मानते हैं। हालांकि, इसके निर्माण के पीछे की सटीक ऐतिहासिक जानकारी सीमित है, लेकिन इसकी लोकप्रियता और महत्व समय के साथ बढ़ता ही जा रहा है।
पर्यटन की दृष्टि से भी यह महल डूंगरपुर की पहचान बनता जा रहा है। हालाँकि यह यह निजी क्षेत्र में है और उदय विलास पैलेस महल एक हेरिटेज होटल के रूप में चल रहा है फिर भी दूर-दूर से उदय विलास महल में आने वाले पर्यटक इस अनोखी संरचना को देख कर मंत्र मुग्ध हो जाते हैं और इसकी खूबसूरती को कैमरे में कैद करते हैं। यह स्थल न केवल इतिहास प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र है, बल्कि वास्तुकला में रुचि रखने वालों के लिए भी प्रेरणादायक है।
इस ऐतिहासिक एक थंबा महल का जीर्णोद्धार महारावल उदयसिंह द्वितीय के शासनकाल में कराया गया माना जाता है।
उदयसिंह द्वितीय अपने समय में कला, स्थापत्य और विरासत संरक्षण के लिए प्रसिद्ध शासक थे। उन्होंने डूंगरपुर राज्य की कई प्राचीन इमारतों के संरक्षण और मरम्मत का कार्य करवाया। एक थंबा महल, जसमय के साथ क्षतिग्रस्त होने लगा था, उसे भी उनके प्रयासों से पुनः सुदृढ़ और सुरक्षित किया गया। तदुपरांत महारावल लक्ष्मण सिंह ने भी इसके जीर्णोद्धार पर ध्यान दिया जिसके कारण आज यह महल अपनी मूल भव्यता के काफी करीब दिखाई देता है और डूंगरपुर की ऐतिहासिक पहचान को जीवित रखे हुए है।
वर्तमान समय में जरूरत है कि इस तरह की ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण और संवर्धन किया जाए। यदि उचित देखभाल और प्रचार-प्रसार किया जाए, तो एक थंबा महल पर्यटन के क्षेत्र में डूंगरपुर को नई पहचान दिला सकता है। साथ ही, यह आने वाली पीढ़ियों को अपने गौरवशाली अतीत से जोड़ने का भी माध्यम बनेगा। महारावल हर्षवर्धन सिंह कहते है कि एक थंबा महल केवल एक इमारत नहीं, बल्कि इतिहास, कला और संस्कृति का जीवंत प्रतीक है, जो डूंगरपुर की विरासत को संजोए हुए है।