उदयपुर। “हर बच्चे का सर्वोत्तम हित हमारे सामूहिक प्रयासों के केंद्र में है३” इसी सोच को साकार रूप देते हुए यूनिसेफ इंडिया कंट्री ऑफिस की उच्च स्तरीय टीम ने उदयपुर जिले के बड़गाँव ब्लॉक में कालोड़ा स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय एवं करेळो का गुड़ा स्थित पुष्कर महादेव ग्राम संगठन का दौरा किया। यह विज़िट सेल्फ-एस्टीम एवं बॉडी कॉन्फिडेंस (पहचान) कार्यक्रम के प्रभावों को समझने, समुदाय में आए व्यवहारगत बदलावों का अवलोकन करने तथा “विकसित राजस्थान@2047” के दृष्टिकोण के अनुरूप आगे की दिशा तय करने के उद्देश्य से आयोजित की गई।
इस अवसर पर चीफ ऑफ प्रोग्राम (सोशल बिहेवियर चेंज), यूनिसेफ इंडिया कंट्री ऑफिस, नई दिल्ली डेनिस लार्सन, चीफ फील्ड ऑफिसर (सीएफओ) यूनिसेफ राजस्थान फील्ड ऑफिस जयपुर, डॉ. के. एल. राव, एसबीसी स्पेशलिस्ट, यूनिसेफ राजस्थान फील्ड ऑफिस जयपुर, सुश्री मंजरी पंत, जेंडर स्पेशलिस्ट, टॉम, प्रोग्राम असोसीएट, नई दिल्ली सुश्री मेरी थॉमस, प्रोग्राम डायरेक्टर, अरावली डॉ. वरुण शर्मा, एवं राज्य सलाहकार, यूनिसेफ राजस्थान, जयपुर जमीर अनवर, सहित टीम के अन्य सदस्य उपस्थित रहे।
कालोड़ा विद्यालय में टीम का स्वागत प्रधानाचार्य विद्या श्रीमाली द्वारा किया गया। उन्होंने विद्यालय की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि तथा कार्यक्रम के तहत आए सकारात्मक बदलावों का विस्तृत परिचय दिया। पीटीएमइ प्रभारी सुश्री कीर्ति चौधरी ने गैलरी वॉक के माध्यम से चारों एसबीसी आधारित पीटीएम की संपूर्ण यात्रा प्रस्तुत की, जिसमें बच्चों द्वारा लिखे गए पत्र, उनके सपने, बॉडी शेमिंग से जुड़े अनुभव तथा आत्मस्वीकृति की अभिव्यक्ति स्पष्ट रूप से दिखाई दी।
बच्चों के साथ संवाद के दौरान यह अनुभव किया गया कि अब वे पहले की तुलना में अधिक आत्मविश्वासी हैं, अपनी बात खुलकर रखते हैं और एक-दूसरे के प्रति सम्मानजनक व्यवहार अपनाते हैं। बच्चों ने साझा किया कि उन्होंने अब एक-दूसरे को बॉडी शेमिंग से जुड़े नामों से बुलाना पूरी तरह बंद कर दिया है। वे अब किसी के रंग-रूप, कद-काठी या शारीरिक बनावट के आधार पर तुलना नहीं करते, बल्कि एक-दूसरे की विशेषताओं और क्षमताओं का सम्मान करते हैं। साथ ही, वे जेंडर स्टीरियोटाइप को समझने लगे हैं और समानता की सोच के साथ आगे बढ़ रहे हैं।
अभिभावकों के साथ हुई चर्चा इस कार्यक्रम की सबसे प्रभावशाली तस्वीर बनकर सामने आई। माता-पिता दोनों ने साझा किया कि इस कार्यक्रम के माध्यम से अब उन्हें यह स्पष्ट रूप से समझ में आया है कि बच्चों की वास्तविक पहचान उनके गुणों, व्यवहार और क्षमताओं में होती है, न कि उनके बाहरी रंग-रूप या शारीरिक बनावट में।
अभिभावकों ने बताया कि पहले अनजाने में वे बच्चों की तुलना करते थे या कभी-कभी उन्हें उनके रंग, कद या रूप-रंग के आधार पर संबोधित कर देते थे, लेकिन अब उन्होंने ऐसे सभी व्यवहारों को बदलना शुरू कर दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि अब उन्होंने बच्चों को बॉडी शेमिंग से जुड़े नामों से बुलाना पूरी तरह बंद कर दिया है और घर में सम्मानजनक भाषा का प्रयोग बढ़ा है।
अब माता-पिता बच्चों के साथ नियमित रूप से समय बिताते हैं, उनकी बात ध्यान से सुनते हैं, उनकी भावनाओं को समझते हैं और उनके सपनों को प्रोत्साहित करते हैं। वे बच्चों के बीच तुलना नहीं करते, बल्कि हर बच्चे की विशिष्टता को पहचानते हुए उसे आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
अभिभावकों ने यह भी साझा किया कि अब वे बेटा-बेटी में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करते और दोनों को समान अवसर देने की दिशा में सचेत रूप से प्रयास कर रहे हैं। परिवारों में संवाद, विश्वास और सकारात्मक वातावरण पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हुआ है।
इसके पश्चात राजस्थान ग्रामीण आजीविका विकास परिषद (राजीविका) के अंतर्गत बड़गाँव ब्लॉक के करेळो का गुड़ा स्थित पुष्कर महादेव ग्राम संगठन में पहचान कार्यक्रम के प्रभावों का अवलोकन किया गया। यह कार्यक्रम यूनिसेफ के सहयोग से अरावली संस्था के माध्यम से समुदाय स्तर पर लागू किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य किशोर-किशोरियों में आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और सकारात्मक पालन-पोषण को बढ़ावा देना है।
राजीविका की ओर से इस बैठक में जिला प्रबंधक ( डीएमआईबी) ललित जीनगर, ब्लॉक प्रोग्राम मैनेजर सुश्री मोनिका मिश्रा तथा सीएलएफ मैनेजर सपना कुमावत के साथ पुष्कर ग्राम संगठन की 17 महिलाएँ उपस्थित रहीं।
बैठक के दौरान सीएलएफ मैनेजर सपना कुमावत ने कार्यक्रम की कार्यप्रणाली को विस्तार से समझाते हुए बताया कि यह पहल महिलाओं के जीवन में सकारात्मक दिशा प्रदान कर रही है। डीएमआईबी ललित जीनगर एवं मोनिका मिश्रा ने बताया कि एसएचजी और ग्राम संगठन की बैठकों में अब आत्मसम्मान, जेंडर समानता और सकारात्मक पालन-पोषण जैसे विषयों पर नियमित चर्चा हो रही है, जिससे समुदाय में स्पष्ट व्यवहारगत परिवर्तन देखने को मिल रहा है।
वीओए खुमानी गमेती ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि अब वे अपने बच्चों के साथ नियमित संवाद करती हैं, उनकी भावनाओं को समझती हैं और उन्हें प्रोत्साहित करती हैं। उनके परिवार में सकारात्मक बदलाव आया है और उनकी बेटी आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखती है।
अन्य महिलाओं ने भी बताया कि अब वे अधिक आत्मविश्वासी और मुखर हो गई हैं वे बैठकों में खुलकर बोलती हैं, अपने विचार साझा करती हैं और आवश्यकता पड़ने पर अपनी आवाज उठाने लगी हैं। वे जेंडर भेदभाव और जेंडर स्टीरियोटाइप को समझने लगी हैं, बेटा-बेटी में भेदभाव नहीं करतीं और बच्चों के बीच तुलना करना भी छोड़ रही हैं। डॉ. वरुण शर्मा ने कहा कि यह कार्यक्रम केवल एक पहल नहीं, बल्कि एक सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया है, जो बच्चों और अभिभावकों के बीच विश्वास, संवाद और समझ का मजबूत सेतु बना रहा है।
यूनिसेफ टीम ने इस अवसर पर त्ैब्म्त्ज् द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना की, साथ ही एनआरएलएम एवं एसआरएलएम (राजीविका) के माध्यम से हो रहे कार्यों को अत्यंत प्रभावी बताते हुए उनकी प्रशंसा की।
टीम ने विशेष रूप से महिलाओं के बढ़ते आत्मविश्वास, उनकी सक्रिय भागीदारी और नेतृत्व क्षमता की भूर-भूर प्रशंसा करते हुए कहा कि अब महिलाएँ केवल सहभागी नहीं, बल्कि परिवर्तन की सशक्त वाहक बन चुकी हैं।
“अब बदलाव केवल विद्यालय तक सीमित नहीं-यह पूरे समुदाय की सोच, व्यवहार और रिश्तों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।”