आईवीएफ, प्रीमेच्योर बेबी और आंखों की बीमारियों पर जागरूकता बेहद जरूरी:डॉ. लक्ष्मी झाला

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Published on : 23 Apr, 26 11:04

आईवीएफ, प्रीमेच्योर बेबी और आंखों की बीमारियों पर जागरूकता बेहद जरूरी:डॉ. लक्ष्मी झाला

 

उदयपुर। बदलती जीवनशैली, बढ़ते स्क्रीन टाइम और आधुनिक चिकित्सा तकनीकों के उपयोग के बीच आंखों से जुड़ी बीमारियों के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इसी संदर्भ में अलख नयन मंदिर आई इंस्टीट्यूट की निदेशक डॉ. लक्ष्मी झाला ने विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि समय पर जागरूकता और जांच ही आंखों की रोशनी बचाने का सबसे प्रभावी उपाय है।

डॉ. लक्ष्मी झाला ने बताया कि आज के समय में आईवीएफ तकनीक के जरिए जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या बढ़ रही है। हालांकि, यह स्वयं कोई समस्या नहीं है, लेकिन इससे प्रीमेच्योर (असमय जन्मे) बच्चों की संख्या बढ़ जाती है। ऐसे बच्चों में रेटिना का पूर्ण विकास नहीं हो पाता, जिससे “रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमेच्योरिटी (ROP)” का खतरा बढ़ जाता है। यदि समय रहते इसकी पहचान और उपचार नहीं किया जाए तो यह स्थायी अंधत्व का कारण बन सकता है।

उन्होंने बताया कि जन्म के कुछ दिनों के भीतर ही प्रीमेच्योर बच्चों की आंखों की जांच कराना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित रेटिना विशेषज्ञ और आधुनिक उपकरणों की जरूरत होती है। अलख नयन मंदिर संस्थान पिछले कई वर्षों से उदयपुर के विभिन्न NICU और निजी अस्पतालों के साथ समन्वय कर ऐसे बच्चों की स्क्रीनिंग और उपचार का कार्य कर रहा है।

डॉ. झाला ने यह भी बताया कि डायबिटीज आज एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या बन चुकी है और इसका सीधा असर आंखों पर पड़ता है। “डायबिटिक रेटिनोपैथी” एक ऐसी स्थिति है जिसमें धीरे-धीरे रेटिना प्रभावित होता है और समय पर इलाज न मिलने पर दृष्टि कमजोर या समाप्त हो सकती है। इसी कारण 40 वर्ष से अधिक आयु के सभी लोगों के लिए नियमित नेत्र जांच बेहद जरूरी है, चाहे उन्हें कोई समस्या महसूस हो या नहीं।

ग्लूकोमा (काला मोतिया) के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि यह एक “साइलेंट बीमारी” है, जिसमें शुरुआती चरण में लक्षण स्पष्ट नहीं होते। लेकिन समय के साथ यह दृष्टि क्षेत्र को सीमित कर देता है और इलाज में देरी होने पर स्थायी नुकसान हो सकता है। वहीं मोतियाबिंद (सफेद मोतिया) आज भी अंधत्व का सबसे सामान्य कारण है, लेकिन अच्छी बात यह है कि इसका ऑपरेशन पूरी तरह सफल और सुरक्षित है।

संस्थान द्वारा चलाए जा रहे “कॉफी इन द डार्क” जैसे अनूठे कार्यक्रम का भी उल्लेख करते हुए डॉ. झाला ने कहा कि इसका उद्देश्य लोगों को अंधत्व का वास्तविक अनुभव कराना है, ताकि वे आंखों के महत्व को समझें और समय पर इलाज के प्रति सजग हों। इस कार्यक्रम में प्रतिभागियों को पूर्ण अंधेरे कमरे में बैठाकर उन्हें दैनिक गतिविधियों का अनुभव कराया जाता है, जिससे वे नेत्रहीन व्यक्तियों की चुनौतियों को महसूस कर सकें।

उन्होंने यह भी बताया कि आजकल “कंप्यूटर विजन सिंड्रोम” तेजी से बढ़ रहा है, खासकर युवाओं और बच्चों में। लंबे समय तक मोबाइल, कंप्यूटर या अन्य स्क्रीन के उपयोग से आंखों में सूखापन, जलन और दृष्टि संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। इससे बचाव के लिए 20-20-20 नियम अपनाने की सलाह दी गई—हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर देखें।

अंत में डॉ. लक्ष्मी झाला ने आमजन से अपील की कि आंखों की किसी भी छोटी समस्या को नजरअंदाज न करें। नियमित जांच कराएं, धूल और प्रदूषण से बचें, और जरूरतमंद लोगों को भी सही इलाज तक पहुंचाने में सहयोग करें। उन्होंने कहा कि समय पर की गई छोटी सी सावधानी जीवनभर की रोशनी बचा सकती है।


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