ढेरों रहस्य समेटे है ‘शांतिदूत गुटर-गूँ’

( 433 बार पढ़ी गयी)
Published on : 24 Apr, 26 05:04

ढेरों रहस्य समेटे है ‘शांतिदूत गुटर-गूँ’

समीक्षक · शिव मोहन यादव

पिक्चर बुक : शांतिदूत गुटर-गूँ

लेखिका : डॉ. विमला भंडारी 

प्रकाशक : इंडिया नेटबुक्स प्रा. लि., नोएडा 

पेज  : 36

मूल्य : ₹ 175/-

‘गुटर-गूँ’ से परिचय तो आप सभी का रहा होगा; जी हाँ, वही पक्षी जिसे कतिपय लोग ‘कब्बू’ भी कहते हैं। यह ‘गुटर-गूँ’ यूँ ही शांतिदूत नहीं बन गया; अपितु उसने अपने गुणों से यह उपाधि स्वयं सिद्ध की है।

ज्ञातव्य है कि यह मात्र 36 पृष्ठों में समाई हुई एक अत्यंत रोचक, हृदयग्राही एवं मनोरंजक पिक्चर बुक है। यदि आपको चुलबुली रचनाएँ पढ़ने में अभिरुचि है; यदि आप जिज्ञासु प्रवृत्ति के हैं और किसी विषय के गूढ़ तथ्यों को जानने के इच्छुक हैं; और विशेष रूप से यदि आप ‘गुटर-गूँ’ के विषय में विस्तृत जानकारी अर्जित करना चाहते हैं; तो यह पुस्तक अवश्य पठनीय है। नहीं, यह कथन किसी प्रचार का अंग नहीं है; वरन् इस तथ्य की पुष्टि है कि लेखिका ने एक ही विषय पर विविध सूचनाओं को एकत्र कर जिस कौशल से इसे संकलित किया है, वह सराहनीय है।

बालकों के लिए रंग-बिरंगे चित्रों से सुसज्जित यह कृति एक गुलदस्ते के समान है, जो उनके लिए अमूल्य उपहार सिद्ध हो सकती है। सच तो यह है कि इसमें केवल एक कथा ही नहीं, अपितु ज्ञान के ख़ज़ाने का एक पिटारा सन्निहित है। इसमें ‘गुटर-गूँ’ से सम्बद्ध अनेकानेक रोचक गाथाएँ, संदेशवाहक कपोतों की कथाएँ तथा अनेक अज्ञात तथ्य उद्घाटित हुए हैं। विश्व में घटित अनेक युद्धों के परिप्रेक्ष्य में यह नन्ही पिक्चर बुक शांति का एक अद्वितीय सन्देश प्रस्तुत करती है।

कथा का आरम्भ अनु और बसु के सोलन स्थित आवास से होता है। यही वह स्थान है जहाँ एक शांतिदूत यानी श्वेत कपोत निवास करता था। कुछ दिनों पश्चात् वह अपने साथ एक कबूतरी को भी ले आया। अब धीरे-धीरे कहानी आगे बढ़ती है।थोड़े शर्मीले स्वभाव के कबूतरों के विषय में कई छिपी जानकारियाँ भी इस कृति में दी गई हैं—विभिन्न भाषाओं में कबूतर के नाम, उनकी सामान्य जीवनचर्या इत्यादि। उस नन्हे कबूतर ने अपने आत्मकथ्य में अपनी समस्त विशेषताओं को स्वयं ही उजागर कर दिया है। उस ‘कब्बू’ अर्थात् ‘गुटर-गूँ’ ने यह भी स्पष्ट किया है कि जिस प्रकार गौरैया की छवि उल्लास की, कौवे की विषाद की तथा मयूर की वैभवपूर्ण और गर्वमय मानी जाती है; उसी प्रकार कपोत को सभी सौंदर्य, बुद्धिमत्ता और मिलनसार वाले प्रतीक पक्षी के रूप में देखते हैं। ‘गुटर-गूँ’ दोनों बालकों से वार्तालाप करते हुए पूछता है, “क्या मेरी बात पर तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा?”

बालकों और कबूतर के मध्य चलते इस संवाद के समानांतर कथा प्रवाहित होती रहती है और मध्य-मध्य में अनेक उप-कथाएँ भी गुंथी हुई हैं।

इस बाल पुस्तक में बताया गया है कि महान चित्रकार पिकासो ने अपनी पुत्री का नाम ‘पालोमा’ रखा था, जिसका स्पेनी भाषा में अर्थ कबूतर ही होता है। प्रसिद्ध चित्रकार पाब्लो ने शांति के प्रतीक रूप में जो चित्र निर्मित किया, उसमें कबूतर को जैतून की हरित शाखा के साथ चित्रित किया गया है। अंततः चित्रकार को यह विचार कैसे स्फुरित हुआ कि मानो जैतून की पत्तियों से ही कबूतर निर्मित कर दिया जाए? इससे सम्बद्ध सम्पूर्ण प्रसंग यहाँ वर्णित है। अगले घटनाक्रम में यह बताया गया है कि किस प्रकार नवविवाहित दम्पति प्रेम-प्रतीक कपोत युगल को मुक्त गगन में उड़ाकर स्वयं भी उनके पीछे दौड़ते हैं। यह कोई उन्माद नहीं, एक प्राचीन परम्परा है, जिसकी मान्यता है कि ऐसा करने से दाम्पत्य जीवन सुखमय हो जाता है।

इन किस्सों और कहानियों के बीच ‘गुटर-गूँ’ दोनों बालकों से अनवरत वार्ता करता रहता है; दाना चुगने, जल पीने, कभी कंधे पर विराजने और फुदक-फुदक कर खेलने की बातें चल रही होती हैं। वह अपनी विशेषताओं से भी अवगत कराता रहता है।

तदुपरांत, मध्य एशिया की एक लोकप्रचलित कथा सुनाई जाती है, जिसमें दो राज्यों के बीच युद्ध छिड़ने को होता है, किन्तु युद्ध आरम्भ होने से पूर्व ही एक कबूतर के कारण द्वितीय राजा युद्ध न करने की घोषणा कर देता है और अंततः शांति समझौता सम्पन्न हो जाता है। आखिर ऐसा क्या घटित हुआ कि कबूतर के कारण राजाओं के मध्य युद्ध स्थगित हो गया? पुस्तक में यह प्रसंग अत्यंत रोचक शैली में प्रस्तुत किया गया है।

पुस्तक में यह भी उल्लिखित है कि कैसे कबूतर इस्लाम धर्म में अत्यंत पवित्र माना गया और पैग़म्बर मोहम्मद साहब ने इसे विशेष रूप से क्यों पसंद किया। यहूदी धर्म में श्वेत कबूतर को सर्वाधिक पवित्र क्यों माना जाता है, इसका भी वर्णन है। ईसाई इतिहास की एक घटना का उल्लेख है, जिसमें पृथ्वी पर पवित्र आत्मा के अवतरण का शुभ संदेश कबूतर ने ही दिया था। हिंदू धर्म के अनेक रोचक प्रसंगों के साथ ही यह वृत्तांत भी है कि जब भगवान शिव, माता पार्वती को अजर-अमर रहने का सृष्टि रहस्य सुना रहे थे, तब कबूतर के एक जोड़े ने यह रहस्य सुन लिया था। अमरनाथ गुफा के समीप कबूतर युगल का दिखाई देना भी आश्चर्य का विषय है। पौराणिक हिंदू ग्रंथों के अनुसार कामदेव की पत्नी देवी रति की सवारी भी कबूतर को बताया गया है।

कथा के मध्य में मौसम का सुहावना वातावरण, मेघाच्छादित आकाश, वर्षा का प्रारम्भ आदि जैसे आकर्षक चित्र उकेरे गए हैं। कब्बू ने बताया है कि विश्व के 33 नगरों में उनके लिए स्मारक निर्मित किए गए हैं; जापान में भी एक प्रसिद्ध स्मारक विद्यमान है। इसके अतिरिक्त, कबूतरों की दिनचर्या को भी रेखांकित किया गया है। कपोती एक बार में कितने अंडे देती है और कितने दिनों तक उन्हें सेती है; इन सबका सांगोपांग विवरण दिया गया है। यह कबूतर युगल अपनी संतान के प्रति असीम संवेदना और समर्पण का प्रतीक है। इस रचना में ‘गुटर-गूँ’ एक विशेष तथ्य यह भी बताता है कि प्रकृति ने उन्हें अपने शिशुओं को दूध पिलाने का अनोखा वरदान दिया है। वह कैसे? इसकी भी सुस्पष्ट व्याख्या प्रस्तुत की गई है।

‘गुटर-गूँ’ को शांतिदूत के अतिरिक्त एक कुशल संदेशवाहक के रूप में कौन नहीं जानता? ‘गुटर-गूँ’ स्वयं बताता है कि उसे गुप्त सूचनाओं को छिपाने में नैपुण्य प्राप्त है। एक देश की राजधानी का सुल्तान अपनी डाक सेवाएँ कबूतरों से ही सम्पन्न कराता था; तो दूसरी ओर एक देश में डाकिए का समस्त कार्य कबूतर ही देखते थे! ऐसे न जाने कितने रहस्योद्घाटन इस अल्प आयतन पुस्तक में समाहित हैं। शांतिदूत के रूप में इसकी गाथा द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् आरम्भ होती है; जब भीषण रक्तरंजित संघर्ष हुआ। लाखों लोगों ने शांति के लिए सार्वजनिक संगठन गठित किए। प्रसिद्ध चित्रकार पिकासो का जैतून की शाखा लिए श्वेत कबूतर का चित्र सर्वश्रेष्ठ माना गया। ‘गुटर-गूँ’ एक ऐसा पक्षी है, जिसके माध्यम से शांति संदेश भेजकर कई युद्धों को अवरुद्ध किया गया। इसके परिणामस्वरूप लाखों जीवनों की रक्षा हुई। लेखिका डॉ. विमला भंडारी अपने पाठकों से आग्रहपूर्वक कहती हैं, “अब तुम्हारा दायित्व है कि युद्ध नहीं, प्रेम चाहिए! यदि संभव हो तो जैतून की शाखा ले आना और युद्ध के स्थान पर शांति का प्रसार करना!”

वास्तव में, अत्यंत सरल एवं आत्मीय भाषा में, एक प्रवाहमय और रोचक शैली में यह पुस्तक रची गई है।


साभार :


© CopyRight Pressnote.in | A Avid Web Solutions Venture.