नौकरी और सेवा—ये दो शब्द भले ही समान प्रतीत हों, लेकिन इनके मायने अलग हैं। नौकरी में प्रतिफल की अपेक्षा होती है, जबकि सेवा में केवल संतोष और आत्मिक आनंद का भाव होता है। इसी सेवा भावना को जीवन का लक्ष्य बनाया है कोटा के प्रसिद्ध नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. सुधीर गुप्ता ने, जो अब तक एक लाख से अधिक निःशुल्क नेत्र ऑपरेशन कर चुके हैं।
करीब तीन दशक पहले पिता गोरधनलाल गुप्ता की एक सीख ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। पिता ने कहा था कि समाज में ऐसे कई लोग हैं जिनके लिए आंखों का ऑपरेशन करवाना आसान नहीं होता, इसलिए जरूरतमंदों की सहायता करना ही सच्ची सेवा है। यही प्रेरणा डॉ. गुप्ता के जीवन की आधारशिला बन गई।
डॉ. गुप्ता बताते हैं कि सेवा से मिलने वाला आत्मिक सुख किसी भी उपलब्धि से बड़ा होता है। सरकारी शिविरों में मिलने वाले सहयोग के साथ-साथ उन्होंने निजी स्तर पर भी जरूरतमंद मरीजों का उपचार करना शुरू किया।
नौकरी छोड़ सेवा को बनाया मिशन
अपने करियर के शुरुआती दो वर्षों में परिवार कल्याण के राष्ट्रीय कार्यक्रमों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए डॉ. गुप्ता प्रथम स्थान पर रहे। दूरस्थ क्षेत्रों में जाकर काम करने की उनकी इच्छा लगातार बढ़ती गई। कोटा में पदस्थापन के दौरान उन्हें नेत्र शिविरों में कार्य करना विशेष रूप से पसंद आने लगा।
वर्ष 1997 में उन्होंने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया ताकि अधिक से अधिक कैंपों में जाकर लोगों की सेवा कर सकें। कोटा, ग्रामीण क्षेत्रों और अन्य शहरों में आयोजित किए गए उनके नेत्र शिविरों की संख्या 5000 से अधिक मानी जाती है।
गांव-गांव पहुंचाई रोशनी
वर्ष 2004 में प्रतापगढ़ और दांता जैसे छोटे गांवों में नेत्र शिविर लगाने का अवसर मिला। वहां की परिस्थितियों को देखकर उन्होंने नियमित शिविरों की शुरुआत की। आदिवासी क्षेत्र प्रतापगढ़ में ही उन्होंने 6 से 7 हजार ऑपरेशन किए।
दांता गांव में किए गए कार्यों से प्रभावित होकर समाचार पत्रों में “रोशनीदाता” और “आंखों का तीर्थ” जैसे शीर्षकों से खबरें प्रकाशित हुईं, जिसने उनके उत्साह को और बढ़ाया।
मध्यप्रदेश के एक शिविर में 2000 से अधिक मोतियाबिंद ऑपरेशन करना उनके जीवन की बड़ी उपलब्धियों में शामिल है। वर्ष 2012 से 2014 के बीच उन्होंने लगभग 21,500 ऑपरेशन किए, जिनमें से 19,166 ऑपरेशन आई कैंपों में किए गए। इस उल्लेखनीय सेवा कार्य के लिए उन्हें प्रमाण पत्र से सम्मानित भी किया गया।
सेवा में मिलता है सच्चा संतोष
डॉ. गुप्ता का मानना है कि दूर-दराज के गांवों में रहने वाले बुजुर्ग और जरूरतमंद लोग अक्सर अस्पताल तक नहीं पहुंच पाते। ऐसे में शिविरों के माध्यम से उनके गांव तक पहुंचकर उपचार करना केवल चिकित्सा सेवा नहीं, बल्कि मानवता की सच्ची मिसाल है।
उनके अनुसार, मरीजों की दुआएं और चेहरे पर लौटती रोशनी ही उनके जीवन की सबसे बड़ी कमाई है।