मज़दूर: जिनके पसीने से सजता है हिंदुस्तान

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Published on : 01 May, 26 06:05

मज़दूर: जिनके पसीने से सजता है हिंदुस्तान

सत्य भूषण शर्मा ,उदयपुर ( राजस्थान)

जब पूरा शहर गहरी नींद में डूबा होता है, तब एक मज़दूर अपनी थकी आँखों, अधूरे सपनों और खाली पेट के साथ काम की तलाश में निकल पड़ता है। उसके हाथों की दरारों में केवल मिट्टी और सीमेंट नहीं, बल्कि संघर्ष, जिम्मेदारियाँ और अनगिनत पीड़ाओं की कहानी छिपी होती है। उसके कंधों पर केवल ईंटों का भार नहीं होता, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदें टिकी होती हैं।

 

वह अपने बच्चों की भूख मिटाने, बूढ़े माता-पिता की दवा जुटाने और घर के बुझते चूल्हे को जलाए रखने के लिए तपती धूप, कड़कड़ाती ठंड और बरसती बारिश में भी निरंतर श्रम करता रहता है। उसके जीवन में आराम नाम की कोई जगह नहीं होती। शरीर थक जाता है, पर जिम्मेदारियाँ उसे रुकने नहीं देतीं।

 

विडंबना देखिए—जो मजदूर दूसरों के लिए आलीशान महल बनाता है, उसके हिस्से में अक्सर टूटी झोपड़ी ही आती है। जो शहरों को रोशनी देता है, उसका अपना जीवन अंधेरों में बीत जाता है। जो सड़कें बनाता है, उसके पैरों में कई बार पहनने को चप्पल तक नहीं होती। जो दूसरों के सपनों को आकार देता है, उसके अपने सपने अक्सर गरीबी की धूल में दम तोड़ देते हैं। सच तो यह है कि मजदूर केवल श्रमिक नहीं, बल्कि त्याग, संघर्ष और सहनशीलता की जीवित प्रतिमा है।

 

पसीने से लिखी जाती है विकास की इबारत-

हम जब ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों, विशाल पुलों और आधुनिक भारत की उपलब्धियों पर गर्व करते हैं, तब शायद ही उन हाथों को याद करते हैं जिन्होंने अपने खून-पसीने से इन्हें खड़ा किया। एक मजदूर का पसीना केवल धरती को नहीं भिगोता, बल्कि राष्ट्र के विकास की इबारत लिखता है।

 

देश का हर निर्माण—चाहे वह रेल लाइन हो, फैक्ट्री हो, भवन हो या खेत—मजदूर की मेहनत से ही संभव होता है। वह राष्ट्र निर्माण का ऐसा कर्मयोगी है, जो बिना किसी प्रशंसा या सम्मान की अपेक्षा किए निरंतर अपना कर्तव्य निभाता रहता है।

 

अनदेखा दर्द और टूटते सपने-

मज़दूरों की पीड़ा केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक भी होती है। दिनभर कठिन परिश्रम करने के बाद भी उन्हें वह सम्मान नहीं मिलता जिसके वे वास्तविक हकदार हैं। कई बार उन्हें अपमान, शोषण और उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। जिन हाथों पर पूरा समाज खड़ा है, वही हाथ अक्सर खाली रह जाते हैं।

 

हर मजदूर यह सपना देखता है कि उसका बच्चा अच्छी शिक्षा पाए, सम्मानजनक जीवन जिए और उन कठिनाइयों से दूर रहे जिनसे वह स्वयं गुजर रहा है। लेकिन गरीबी कई बार उसके सपनों की राह रोक देती है। उसके बच्चों की मासूम इच्छाएँ अभाव और भूख के नीचे दब जाती हैं। यही सबसे बड़ा दर्द है—एक पीढ़ी का संघर्ष दूसरी पीढ़ी की मजबूरी बन जाना।

 

कई बार मजदूर की आँखों में नींद नहीं, बल्कि भूख जागती है। उसकी पत्नी आधे पेट सो जाती है ताकि बच्चे भरपेट भोजन कर सकें। उसके बच्चे खिलौनों की उम्र में जिम्मेदारियाँ उठाना सीख जाते हैं। यह पीड़ा केवल आँकड़ों से नहीं समझी जा सकती; इसे महसूस करने के लिए संवेदनशील हृदय चाहिए।

 

महामारी ने दिखाया मजदूरों का वास्तविक दर्द-

कोरोना महामारी के दौरान देश ने मजदूरों की वह त्रासदी देखी जिसे इतिहास शायद कभी नहीं भूल पाएगा। हजारों किलोमीटर पैदल चलते मजदूर, कंधों पर सामान, गोद में बच्चे और आँखों में घर पहुँचने की बेचैनी—ये दृश्य पत्थर दिल इंसान को भी रुलाने के लिए पर्याप्त थे।

 

जिस मजदूर ने शहरों को खड़ा किया, वही शहर संकट के समय उसे बेसहारा छोड़ बैठे। भूख, बेबसी और मजबूरी के बीच मजदूर का दर्द पूरे देश के सामने उजागर हो गया। उस समय दुनिया ने महसूस किया कि देश की असली रीढ़ कौन है।

 

केवल सहानुभूति नहीं, सम्मान चाहिए-

मज़दूरों को केवल दया या सहानुभूति नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और अधिकार चाहिए। उन्हें उचित मजदूरी, सुरक्षित कार्यस्थल, स्वास्थ्य सुविधाएँ और उनके बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराना समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है।

 

हमें यह समझना होगा कि राष्ट्र निर्माण में एक ईंट ढोने वाले मजदूर का योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी बड़े अधिकारी या उद्योगपति का। क्योंकि यदि मजदूर अपने हाथ रोक दें, तो विकास का पहिया भी थम जाएगा।

 


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