उदयपुर की झीलों, जैव विविधता, सांस्कृतिक विरासत तथा आध्यात्मिक गरिमा के लिए गंभीर खतरा

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Published on : 11 May, 26 06:05

उदयपुर की झीलों, जैव विविधता, सांस्कृतिक विरासत तथा आध्यात्मिक गरिमा के लिए गंभीर खतरा

उदयपुर, झील प्रेमियों एवं पर्यावरण चिंतकों ने “अति पर्यटन -  केवल पर्यटन" आधारित विकास मॉडल  को उदयपुर की झीलों, जैव विविधता, सांस्कृतिक विरासत तथा आध्यात्मिक गरिमा के लिए गंभीर खतरा बताया है। 

रविवार को बारी घाट पर आयोजित संवाद में पर्यावरण विशेषज्ञ  डॉ. अनिल मेहता  ने कहा कि प्रसिद्ध तीर्थस्थल नीमच माता तक रात्रिकालीन रोपवे संचालन तथा झीलों में देर रात तक नौकायन जैसी गतिविधियाँ पर्यावरणीय एवं आध्यात्मिक दृष्टि से अनुचित हैं। 

मेहता ने  कहा कि कृत्रिम रोशनी, ध्वनि प्रदूषण और बढ़ती मानवीय हलचल से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहा है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार रात्रिकालीन प्रकाश प्रदूषण , शोर प्रदूषण  पक्षियों, वन्य जीवों एवं जलीय जीवों की जैविक घड़ी को बाधित करता है, जिससे उनके भोजन, प्रवास और प्रजनन व्यवहार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।उन्होंने चेतावनी दी कि यदि प्राकृतिक और सांस्कृतिक संसाधनों की वहन क्षमता  की अनदेखी कर अनियंत्रित पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा दिया गया, तो उदयपुर की पारिस्थितिकी और पहचान दोनों पर दीर्घकालीन दुष्प्रभाव पड़ेंगे।

डॉ. मेहता ने कहा कि देशी एवं प्रवासी पक्षियों, पैंथर जैसे वन्यजीवों तथा झीलों के जलीय जीवों के प्राकृतिक आवासों में मानवीय हस्तक्षेप लगातार बढ़ रहा है।  केवल पर्यटकों की मनोरंजनात्मक गतिविधियों को प्राथमिकता देकर स्थानीय संस्कृति, पर्यावरणीय संतुलन और धार्मिक स्थलों की पवित्रता को आघात पहुँचाना नैतिक एवं विधिक दृष्टि से भी गंभीर विषय है।

झील विकास प्राधिकरण के पूर्व सदस्य तेज शंकर पालीवाल ने कहा कि नीमच माता केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि श्रद्धा और आध्यात्मिक आस्था का केंद्र है। उन्होंने कहा कि रोपवे, कैफे और व्यावसायिक गतिविधियों का अत्यधिक विस्तार मंदिर की पारंपरिक गरिमा एवं शांत वातावरण को प्रभावित कर रहा है। धार्मिक स्थलों के आसपास अत्यधिक व्यावसायीकरण से सांस्कृतिक विरासत की मौलिकता समाप्त होने का खतरा उत्पन्न हो रहा है। पालीवाल ने कहा कि उन्होंने कहा कि “पर्यावरण व संस्कृति पोषक  पर्यटन  ही उदयपुर के भविष्य का एकमात्र व्यवहारिक मार्ग है, जिसमें प्रकृति, संस्कृति और स्थानीय समाज तीनों के हित सुरक्षित रह सकेंगे ।

समाजविद नंद किशोर शर्मा ने कहा कि उदयपुर की झीलें अंतरराष्ट्रीय महत्व के वेटलैंड पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं, जो भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता संरक्षण एवं स्थानीय जलवायु संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय तथा राष्ट्रीय हरित अधिकरण , एन जी टी  समय-समय पर जलाशयों और वेटलैंड क्षेत्रों के अतिक्रमण एवं व्यवसायिक दोहन पर चिंता व्यक्त कर चुके हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से वेटलैंड क्षेत्रों में अत्यधिक मानवीय दबाव से जल गुणवत्ता, ऑक्सीजन स्तर और जलीय जैव विविधता प्रभावित होती है।

शिक्षाविद कुशल रावल ने कहा कि सायंकाल के बाद झील क्षेत्रों को अनावश्यक कृत्रिम रोशनी, उच्च ध्वनि और मानवीय गतिविधियों से मुक्त रखा जाना चाहिए। विश्वभर के अनेक संवेदनशील वेटलैंड एवं संरक्षित क्षेत्रों में “नाइट इकोलॉजी प्रोटोकॉल” लागू किए जाते हैं, ताकि रात्रिकालीन जैव विविधता सुरक्षित रह सके।

युवा पर्यावरण प्रेमी विनोद कुमावत  ने कहा कि प्रशासन को यह समझना होगा कि पेयजल सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन किसी भी पर्यटन गतिविधि से अधिक महत्वपूर्ण हैं। यदि झीलों का पारिस्थितिक स्वास्थ्य बिगड़ता है, तो भविष्य में पर्यटन उद्योग भी गंभीर संकट में आ सकता है।

वरिष्ठ नागरिक  द्रुपद सिंह ने कहा कि उदयपुर के पर्यावरण प्रेमी, संस्कृति प्रेमी और धर्मनिष्ठ नागरिकों को झील क्षेत्रों एवं आध्यात्मिक स्थलों की पवित्रता और पारिस्थितिक संतुलन की रक्षा के लिए जनजागरण एवं जनआंदोलन खड़ा करना होगा।


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