राजस्थानी भाषा को लेकर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला : मातृभाषा शिक्षा राजस्थानी को मिला नया आधार

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Published on : 13 May, 26 05:05

राजस्थानी भाषा को लेकर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला : मातृभाषा शिक्षा राजस्थानी को मिला नया आधार

गोपेन्द्र नाथ भट्ट

राजस्थानी भाषा को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता और दैनिक जलते दीप और राजस्थानी पत्रिका माणक के प्रधान संपादक पद्म मेहता तथा वरिष्ठ साहित्यकार शिक्षाविद् प्रो कल्याण सिंह शेखावत द्वारा दायर याचिका और परिवाद में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राजस्थान सरकार को निर्देश दिया है कि वह सरकारी और निजी विद्यालयों में राजस्थानी भाषा को विषय के रूप में लागू करने की नीति बनाए तथा मातृभाषा आधारित शिक्षा को बढ़ावा दे।


सुप्रीम कोर्ट की पीठ में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता शामिल थे। अदालत ने कहा कि संविधान की भावना के अनुरूप बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा उपलब्ध कराना राज्यों की जिम्मेदारी है तथा राजस्थानी जैसी समृद्ध भाषा को शिक्षा व्यवस्था में उचित स्थान मिलना चाहिए।
फैसले में राजस्थान सरकार को 30 सितंबर तक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश भी दिए गए हैं। अदालत ने यह भी माना कि राजस्थानी भाषा को लंबे समय से अकादमिक और सांस्कृतिक मान्यता प्राप्त है तथा इसे शिक्षा व्यवस्था में क्रमिक रूप से शामिल किया जाना चाहिए।

इस निर्णय के बाद राजस्थान में राजस्थानी भाषा प्रेमियों में अथाह उत्साह का माहौल है तथा प्रदेश में राजस्थानी भाषा और बोलियों को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। सोशल मीडिया और विभिन्न मंचों पर लोग राजस्थान विधानसभा द्वारा सर्वसम्मति से 23 वर्ष पूर्व पारित प्रस्ताव के अनुरूप मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ौती, वागड़ी आदि बोलियों को राजस्थानी भाषा परिवार का हिस्सा बताते हुए अपने विचार रख रहे हैं।

राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान, लोक परंपरा और साहित्यिक विरासत की आत्मा मानी जाने वाली राजस्थानी भाषा को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत में वर्षों से चल रही बहस को नया मोड़ मिला है। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थानी भाषा के संरक्षण और शिक्षा व्यवस्था में उसके समुचित उपयोग को लेकर दायर परिवाद पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए राजस्थान सरकार को मातृभाषा आधारित शिक्षा नीति को प्रभावी रूप से लागू करने के निर्देश दिए हैं। ।

सामाजिक कार्यकर्ता पद्म मेहता तथा वरिष्ठ साहित्यकार शिक्षाविद् प्रो कल्याण सिंह शेखा द्वारा दायर याचिका के संदर्भ में आए इस निर्णय को राजस्थानी भाषा आंदोलन के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।यह फैसला केवल एक भाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की विविध भाषाई विरासत और मातृभाषा में शिक्षा के संवैधानिक अधिकार को भी मजबूती प्रदान करता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा उपलब्ध कराना संविधान की मूल भावना तथा नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति दोनों के अनुरूप है।

पूरे विश्व में गिनी चुनी भाषाओं में उपलब्ध समृद्ध  साहित्य की दृष्टि से भी  राजस्थानी भाषा को  इनके समकक्ष  स्वतंत्र भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है।  राजस्थानी भाषा भारतीय आर्य भाषा परिवार की एक समृद्ध भाषा मानी जाती है। राजस्थान की लोक संस्कृति, लोकगीत, वीर गाथाएँ और संत साहित्य इसी भाषा में विकसित हुआ। महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान और दुर्गादास राठौड़ जैसे वीरों की गाथाएँ राजस्थानी लोक साहित्य में आज भी जीवंत हैं। संत दादूदयाल, मीरा बाई और चारण कवियों की रचनाओं ने इस भाषा को आध्यात्मिक और साहित्यिक ऊँचाइयाँ प्रदान कीं।

राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की माँग लंबे समय से चल रही है। राजस्थान विधानसभा ने वर्ष 2003 में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को इसे आठवीं अनुसूची में शामिल करने की अनुशंसा भेजी थी, लेकिन अब तक इसे संवैधानिक मान्यता नहीं मिल सकी है।

 याचिका और मुख्य मुद्दे

राजस्थानी भाषा के संरक्षण और शिक्षा में उसके उपयोग को लेकर याचिका कर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में एस एल पी दायर की थी। याचिका में कहा गया कि नई पीढ़ी धीरे-धीरे अपनी मातृभाषा से दूर होती जा रही है और विद्यालयों में राजस्थानी भाषा को पर्याप्त स्थान नहीं मिलने से इसका अस्तित्व प्रभावित हो रहा है।याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में देने पर बल दिया गया है, लेकिन राजस्थान में इस दिशा में अपेक्षित कदम नहीं उठाए गए।सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान माना कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, इतिहास और सामाजिक पहचान का आधार होती है। अदालत ने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा बच्चों की समझ, मानसिक विकास और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को मजबूत बनाती है।

सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि भारतीय संविधान की भावना बहुभाषिकता को संरक्षण देने की है। अदालत ने राजस्थान सरकार को निर्देश दिया कि वह राजस्थानी भाषा को विद्यालयी शिक्षा में शामिल करने के लिए ठोस नीति बनाए और इस संबंध में चरणबद्ध कार्ययोजना प्रस्तुत करे।

अदालत ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 29 और 350-ए में भाषाई और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा का स्पष्ट उल्लेख है। इसलिए राज्यों का दायित्व बनता है कि वे स्थानीय भाषाओं और बोलियों के संरक्षण के लिए प्रभावी कदम उठाएँ। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि आधुनिक शिक्षा व्यवस्था और शहरीकरण के कारण कई क्षेत्रीय भाषाएँ धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही हैं। अदालत ने कहा कि यदि समय रहते संरक्षण नहीं मिला तो अनेक भाषाएँ आने वाली पीढ़ियों से विलुप्त हो सकती हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति और मातृभाषा

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में कक्षा पाँच तक तथा आवश्यकता अनुसार कक्षा आठ तक मातृभाषा या स्थानीय भाषा में शिक्षा देने की सिफारिश की गई है। नीति का उद्देश्य बच्चों को उनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से जोड़ना और प्रारंभिक शिक्षा को सरल बनाना है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि मातृभाषा में पढ़ने वाले बच्चे विषयों को अधिक अच्छी तरह समझते हैं। वैज्ञानिक शोध भी बताते हैं कि प्रारंभिक शिक्षा यदि मातृभाषा में मिले तो बच्चों की रचनात्मक क्षमता और आत्मविश्वास बढ़ता है।राजस्थान में लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि सरकारी विद्यालयों में राजस्थानी भाषा को वैकल्पिक विषय बनाया जाए तथा विश्वविद्यालयों में इसके अध्ययन और शोध को बढ़ावा दिया जाए।

भाषा आंदोलन को मिला नया बल

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद राजस्थानी भाषा आंदोलन से जुड़े संगठनों और साहित्यकारों में उत्साह देखा जा रहा है। विभिन्न सामाजिक संगठनों ने इसे राजस्थानी भाषा के सम्मान और पहचान की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया है। राजस्थान के साहित्यकारों का कहना है कि यह केवल भाषा का प्रश्न नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता का विषय है। राजस्थानी लोकसंगीत, लोककथाएँ, कठपुतली कला और पारंपरिक साहित्य इसी भाषा के माध्यम से पीढ़ियों तक पहुँचा है।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विद्यालय स्तर पर राजस्थानी भाषा को स्थान मिलता है तो नई पीढ़ी अपनी संस्कृति और परंपराओं से अधिक गहराई से जुड़ सकेगी।

चुनौतियाँ भी कम नहीं

दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि राजस्थानी भाषा को शिक्षा में लागू करना आसान नहीं होगा। सबसे बड़ी चुनौती मानकीकरण की है, क्योंकि राजस्थान में इसकी अनेक बोलियाँ हैं। पाठ्यपुस्तकों की तैयारी, प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता और पाठ्यक्रम निर्माण जैसे मुद्दों पर व्यापक तैयारी करनी होगी।इसके अलावा यह तय करना भी महत्वपूर्ण होगा कि राजस्थानी भाषा को किस रूप में पढ़ाया जाए—एक स्वतंत्र भाषा के रूप में या विभिन्न बोलियों के समन्वित रूप में।

भाषा विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार यदि चरणबद्ध तरीके से कार्य करे और साहित्यकारों, शिक्षाविदों तथा भाषा संस्थानों का सहयोग ले तो यह कार्य सफलतापूर्वक किया जा सकता है।राजस्थानी भाषा केवल राजस्थान की नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी लोक परंपराएँ, कहावतें, गीत और साहित्य भारतीय संस्कृति को विशिष्ट पहचान देते हैं।

सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में उठाया गया कदम

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इस बात का संकेत है कि भारतीय न्यायपालिका स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण को गंभीरता से देख रही है। यह निर्णय अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है, जहाँ क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण की माँग उठ रही है।राजस्थानी भाषा को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला केवल कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बनकर सामने आया है। इससे मातृभाषा आधारित शिक्षा की अवधारणा को नई मजबूती मिली है और क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण की दिशा में राष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक संदेश गया है।

अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी राजस्थान सरकार पर है कि वह अदालत के निर्देशों के अनुरूप प्रभावी नीति बनाए और राजस्थानी भाषा को शिक्षा व्यवस्था में सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए ठोस कदम उठाए। यदि ऐसा होता है तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं से जुड़ने का सशक्त माध्यम साबित होगा। वैसे भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित देश के सभी शीर्ष नेता सार्वजनिक मंचों पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में कक्षा पाँच तक तथा आवश्यकता अनुसार कक्षा आठ तक मातृभाषा या स्थानीय भाषा में शिक्षा देने की पैरवी करते रहे हैं इसलिए उम्मीद है प्रदेश की भजन लाल सरकार को उच्चतम न्यायालय के इस फैसले को लागू करने में कोई दिक्कत नहीं होगी।


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