अंकों का संकट या मूल्यांकन की त्रुटि : सीबीएसई परिणामों ने बढ़ाई छात्रों और अभिभावकों की चिंता

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Published on : 15 May, 26 18:05

अंकों का संकट या मूल्यांकन की त्रुटि : सीबीएसई परिणामों ने बढ़ाई छात्रों और अभिभावकों की चिंता

इस वर्ष सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ़ सेकेंडरी एजुकेशन  की कक्षा 12 बोर्ड परीक्षा के परिणाम घोषित होने के बाद देशभर में हजारों विद्यार्थी और उनके अभिभावक गहरी चिंता और असमंजस की स्थिति में दिखाई दे रहे हैं। आधुनिक तकनीक के माध्यम से लागू की गई “ओन स्क्रीन मार्किंग” प्रणाली से उम्मीद की जा रही थी कि मूल्यांकन प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, तेज और त्रुटिरहित होगी, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत नजर आ रही है। परिणामों में सामने आई विसंगतियों ने विद्यार्थियों के भविष्य को लेकर अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं।

कई विद्यार्थियों और अभिभावकों का कहना है कि जिन छात्रों ने पूरे वर्ष उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, विद्यालयी परीक्षाओं और प्री-बोर्ड में शानदार अंक प्राप्त किए, उनके बोर्ड परिणाम अपेक्षा से बहुत कम आए हैं। कुछ विद्यार्थियों के विषयवार अंक इतने कम हैं कि स्वयं शिक्षक भी आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं। विशेष रूप से फिजिक्स  और गणित जैसे विषयों में कई मेधावी छात्रों को उम्मीद से काफी कम अंक मिलने की शिकायतें सामने आई हैं।

सबसे अधिक चिंता इस बात को लेकर है कि कई विद्यार्थियों के आंतरिक मूल्यांकन और बोर्ड परिणामों में अत्यधिक अंतर दिखाई दे रहा है। ऐसे अनेक उदाहरण सामने आए हैं जहां विद्यार्थी विद्यालय परीक्षाओं में 90 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त कर रहे थे, लेकिन बोर्ड परिणाम में वे 70 प्रतिशत के आसपास पहुंच गए। इससे अभिभावकों के मन में मूल्यांकन प्रक्रिया की विश्वसनीयता को लेकर संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है।

ओन स्क्रीन मार्किंग व्यवस्था में उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन कर परीक्षकों के कंप्यूटर स्क्रीन पर जांच हेतु भेजा जाता है। तकनीकी दृष्टि से यह प्रणाली आधुनिक और सुविधाजनक मानी जाती है, लेकिन इसके व्यावहारिक पक्ष पर अब प्रश्न उठने लगे हैं। लंबे समय तक स्क्रीन पर कॉपियां जांचने से परीक्षकों की एकाग्रता प्रभावित होती है। कई बार हस्तलिखित उत्तर स्पष्ट नहीं दिखाई देते, चित्र और ग्राफ धुंधले नजर आते हैं तथा जल्दबाजी में अंकन होने की संभावना भी बनी रहती है। परिणामस्वरूप विद्यार्थियों को उनके वास्तविक प्रदर्शन के अनुरूप अंक नहीं मिल पाते।

देशभर में बड़ी संख्या में अभिभावकों और छात्रों ने अब बोर्ड से पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने की मांग उठाई है। उनकी प्रमुख मांग है कि विद्यार्थियों को उत्तर पुस्तिका की स्पष्ट प्रति उपलब्ध कराई जाए, मूल्यांकन के दौरान दिए गए अंक प्रत्येक उत्तर के साथ दिखाए जाएं तथा पुनः जांच की प्रक्रिया को सरल और कम खर्चीला बनाया जाए। अनेक अभिभावक यह भी चाहते हैं कि यदि किसी विषय में अंक असामान्य रूप से कम आए हैं तो स्वतः पुनर्मूल्यांकन की व्यवस्था लागू होनी चाहिए।

छात्रों की एक महत्वपूर्ण मांग यह भी है कि बोर्ड परिणाम घोषित होने के बाद मानसिक परामर्श और करियर मार्गदर्शन की विशेष व्यवस्था की जाए। आज कई विद्यार्थी कम अंकों के कारण अवसाद, तनाव और आत्मग्लानि का सामना कर रहे हैं। यह केवल परीक्षा परिणाम का विषय नहीं, बल्कि युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुका है।

अभिभावकों का मानना है कि शिक्षा केवल प्रतिशत का खेल नहीं हो सकती। एक छोटी सी मूल्यांकन त्रुटि किसी विद्यार्थी के भविष्य, उसके आत्मविश्वास और करियर को प्रभावित कर सकती है। मेडिकल, इंजीनियरिंग, कानून, प्रबंधन और विदेशों में उच्च शिक्षा के लिए बोर्ड परीक्षा के अंक अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। ऐसे में यदि परिणामों में विसंगतियां सामने आती हैं, तो यह लाखों परिवारों के लिए चिंता का विषय बन जाती है।

विशेषज्ञों का भी मानना है कि तकनीक का उपयोग तभी सफल माना जाएगा जब उसमें मानवीय संवेदनाओं और जवाबदेही का समावेश हो। केवल डिजिटल प्रक्रिया लागू कर देना पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि मूल्यांकन प्रणाली में गुणवत्ता नियंत्रण, दोहरी जांच और त्रुटि सुधार की प्रभावी व्यवस्था हो।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ़ सेकेंडरी एजुकेशन  विद्यार्थियों और अभिभावकों की भावनाओं को गंभीरता से समझे तथा मूल्यांकन प्रणाली में आवश्यक सुधार करे। विद्यार्थियों का भविष्य किसी तकनीकी त्रुटि या जल्दबाजी का शिकार नहीं होना चाहिए। शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य बच्चों के सपनों को मजबूत बनाना होना चाहिए, न कि उन्हें निराशा और असुरक्षा की ओर धकेलना।

यदि समय रहते इन शिकायतों और मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया, तो विद्यार्थियों और अभिभावकों का शिक्षा व्यवस्था पर विश्वास कमजोर हो सकता है। इसलिए यह समय आत्ममंथन, सुधार और संवेदनशील निर्णय लेने का है, ताकि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और विश्वास दोनों कायम रह सकें।


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