भागवत रूपी कल्पवृक्ष का पका फल ही मानव जीवन को फलात्मक और दिव्य बनाता है: रासेश्वरी देवी जी

( 594 बार पढ़ी गयी)
Published on : 19 May, 26 18:05

भागवत रूपी कल्पवृक्ष का पका फल ही मानव जीवन को फलात्मक और दिव्य बनाता है: रासेश्वरी देवी जी

उदयपुर। ब्रज गोपिका सेवा मिशन के तत्वावधान में हिरण मगरी सेक्टर-13 स्थित आशीष वाटिका में चल रहे नौ दिवसीय पंचम वेद श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञान रहस्य महोत्सव के तृतीय दिन व्यासपीठ से पूजनीया रासेश्वरी देवी जी ने वेदों और पुराणों के उस सर्वाेच्च दार्शनिक पक्ष को उजागर किया जो मानव मन को कलयुग के बंधनों से मुक्त करता है। सत्र की शुरुआत व्यासपीठ के पारंपरिक एवं भावपूर्ण पूजन और मंगल दीप प्रज्वलन से हुई, जिसके बाद संपूर्ण पंडाल पूजनीया मां के दिव्य जयघोष से गुंजायमान हो उठा।
व्यासपीठ से भागवत दर्शन की गहन व्याख्या करते हुए देवी जी ने कहा कि भगवान की अनंत शक्तियों में सर्वाेपरि उनकी कृपा शक्ति है, जो कथा का रूप लेकर हमारे पास पहुंचती है। उन्होंने उपस्थित युवाओं और साधकों को सोशल मीडिया के इस दौर में एक बड़ा सत्य बताते हुए कहा कि आज का मनुष्य दो ही चीजों के पीछे भाग रहा है-प्रदर्शन और मान्यता। हम बाहर से खुद को सफल दिखाने का ढोंग करते हैं और इंस्टाग्राम के लाइक्स व पब्लिक रिएक्शन पर अपना मूड और कॉन्फिडेंस टिका देते हैं, जबकि सच यह है कि हम भीतर से खोखले और तनावग्रस्त हो रहे हैं। मनुष्य देह केवल भोग वासना या सांसारिक समस्याओं को सुलझाने के लिए नहीं मिली, बल्कि आत्म-निरीक्षण करके जीवन में प्राथमिकताओं को तय करने के लिए मिली है।
प्रवचन के दौरान षड रिपु (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर) का दर्शन समझाते हुए पूजनीया मां ने एक व्यावहारिक उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि ये छह विकार घर में आने वाले आवारा कुत्ते-बिल्ली के समान हैं। हम इन्हें अपने मन में जितना पोषण देंगे, ये अपना स्थायी डेरा जमा लेंगे। कर्मकांड या प्रायश्चित कर्म कुछ समय के लिए पाप से छुट्टी दे सकते हैं, लेकिन पाप करने की प्रवृत्ति को नहीं बदल सकते। पाप की प्रवृत्ति केवल विशुद्ध भक्ति से ही नष्ट होती है। देवी जी ने अभिज्ञ स्वराट सिद्धांत पर प्रकाश डालते हुए तार्किक रूप से कहा कि जो ईश्वर बड़े-बड़े देवताओं की बुद्धि में नहीं समा सकता, उसे हम अपनी सीमित बुद्धि से समझने का प्रयास करते हैं, जो इलॉजिकल है। ईश्वर बुद्धि का नहीं, बल्कि केवल गुरु और हरि की कृपा का विषय है।
इसके साथ ही उन्होंने निगम कल्पतरु श्लोक का प्रतिपादन करते हुए समझाया कि वेद रूपी कल्पवृक्ष का पका हुआ, रसदार फल ही श्रीमद्भागवत है। श्रीधराचार्य जी की टीका का संदर्भ देते हुए उन्होंने एक क्रांतिकारी दार्शनिक बात कही कि प्रेमी भक्तों के लिए मोक्ष भी एक कपट या लालच के समान है। मोक्ष का अर्थ है ईश्वर में लीन होकर पत्थर जैसा बन जाना, जहां जीव भगवान की सेवा और उनके माधुर्य का आनंद लेने से सदा के लिए वंचित हो जाता है। भक्त रसगुल्ला बनना नहीं चाहता, वह रसगुल्ला खाना चाहता है। इसीलिए भागवत का यह रस वैकुंठ या स्वर्ग में भी उपलब्ध नहीं है।
दिव्य प्रसंग के विश्राम पर पूजनीया देवी जी ने जब अपने मधुर कंठ से मारवाड़ी और राजस्थानी पुट लिए हुए भजन घनश्याम म्हारो बेड़ो पार लगाओ प्यारा श्याम, म्हारो हिवड़े में रम जाओ...और कृपालु जी महाराज का पद....यह जग सेमर का फूल रे...का संकीर्तन कराया, तो संपूर्ण आशीष वाटिका परिसर भक्ति के चरम आनंद में झूम उठा। इसके उपरांत जब भागवत महापुराण की भव्य महाआरती उतारी गई, तो शंख ध्वनि और दिव्य तरंगों से संपूर्ण वातावरण अलौकिक हो गया और उपस्थित प्रत्येक श्रद्धालु का हृदय परम शांति की अनुभूति से भर गया।
भागवत महापुराण प्रवचन श्रृंखला प्रतिदिन सायंकाल 7 बजे से रात्रि 9 बजे तक आशीष वाटिका, हिरण मगरी सेक्टर-13, उदयपुर में आयोजित की जा रही है और यह 25 मई तक जारी रहेगी।


साभार :


© CopyRight Pressnote.in | A Avid Web Solutions Venture.