उदयपुर। हिरण मगरी सेक्टर-13 स्थित आशीष वाटिका इन दिनों आध्यात्मिक चेतना, भक्ति और वैदिक दर्शन के दिव्य प्रकाश से आलोकित हो रही है। Braj Gopika Seva Mission के तत्वावधान में आयोजित नौ दिवसीय “पंचम वेद श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञान रहस्य” महोत्सव के तीसरे दिन व्यासपीठ से पूजनीया रासेश्वरी देवी जी ने आत्मा, धर्म और भक्ति के ऐसे गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन किया, जिसने उपस्थित श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया।
मंगल शंखध्वनि, वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक व्यासपूजन के साथ प्रारंभ हुए दिव्य सत्र में रासेश्वरी देवी जी ने ‘धर्म’ की अत्यंत गहन और वैज्ञानिक व्याख्या करते हुए कहा कि संसार में धर्म को लेकर अनेक भ्रम हैं, जबकि वास्तव में केवल दो ही धर्म हैं—एक शरीर का धर्म और दूसरा आत्मा का धर्म। उन्होंने कहा कि वर्ण, कुल, समाज और परंपराओं से जुड़े नियम शरीर पर आधारित होते हैं, जो परिवर्तनशील और नश्वर हैं, जबकि आत्मा का सनातन धर्म केवल परब्रह्म श्रीकृष्ण से अनन्य प्रेम और निष्काम भक्ति है।
उन्होंने कहा कि जब शारीरिक धर्म आत्मा के धर्म में बाधा बनने लगे, तब उसे त्याग देना ही श्रेष्ठ है। इस संदर्भ में उन्होंने लक्ष्मण और भरत जी के उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने सांसारिक मर्यादाओं से ऊपर उठकर प्रभु राम की भक्ति को सर्वोपरि रखा। उन्होंने अत्यंत मार्मिक उपमा देते हुए कहा कि जिस प्रकार मेले में खोए बच्चे को खोजने के लिए एक पिता ऊँचे स्थान पर खड़ा होकर पुकारता है, उसी प्रकार इस संसार रूपी मेले में भटके जीवों को पुकारने के लिए श्रीनाथजी आज भी गोवर्धन पर्वत पर अपना हाथ उठाए खड़े हैं।
भक्ति के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए देवी जी ने कहा कि सच्ची भक्ति ‘अहैतुकी’ और ‘अप्रतिहता’ होती है। यदि भगवान का स्मरण किसी स्वार्थ, इच्छा पूर्ति या दुख दूर करने की शर्त पर किया जाए, तो वह भक्ति नहीं बल्कि सौदेबाजी है। प्रेम में गणना नहीं होती, समर्पण होता है। उन्होंने कहा कि जब मनुष्य अपनी चेतना को वासुदेव के चरणों में समर्पित कर देता है, तब भक्ति रूपी कन्या से अनुभवात्मक ज्ञान और स्वाभाविक वैराग्य का जन्म स्वतः होने लगता है।
कथा के दौरान उन्होंने महाभारत का अत्यंत भावपूर्ण प्रसंग सुनाते हुए बताया कि जब धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण को समाधि में लीन देखा और पूछा कि आप किसका ध्यान कर रहे हैं, तब भगवान ने उत्तर दिया कि वे अपने परम भक्त भीष्म पितामह का स्मरण कर रहे हैं, जो शरशैया पर लेटे हुए भी निरंतर कृष्ण चिंतन में लीन थे। देवी जी ने कहा कि भक्ति कभी एकतरफा संबंध नहीं होती। जब भक्त सम्पूर्ण निष्ठा और सत्यता के साथ भगवान की ओर बढ़ता है, तब स्वयं भगवान भी उस भक्त के प्रेम में बंध जाते हैं।
उन्होंने कहा कि भीष्म पितामह का जीवन यह संदेश देता है कि सच्ची भक्ति सुख-सुविधाओं में नहीं, बल्कि जीवन की कठिनतम परिस्थितियों में भी ईश्वर की स्मृति बनाए रखने में है। जो भक्त विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी आस्था को अडिग रखता है, भगवान स्वयं उसकी ओर खिंचे चले आते हैं।
प्रवचन के उत्तरार्ध में देवी जी ने द्रौपदी के क्षमाभाव, उत्तरा के गर्भ की रक्षा, कुंती स्तुति और भीष्म पितामह के मोक्ष प्रसंगों का गहन दार्शनिक विश्लेषण किया। उन्होंने बताया कि अपने पुत्रों के हत्यारे अश्वत्थामा को सामने देखकर भी द्रौपदी ने उसे क्षमा कर दिया, क्योंकि सच्चे भक्त के हृदय में प्रतिशोध नहीं, केवल करुणा होती है।
उन्होंने कहा कि कुंती ने भगवान से वैभव नहीं बल्कि विपत्तियाँ मांगी थीं, क्योंकि दुःख मनुष्य को ईश्वर के अधिक निकट ले आता है। वहीं भीष्म पितामह ने मृत्यु के समय अपनी ‘मति’ रूपी कन्या का विवाह श्रीकृष्ण से कर दिया, जिसे ‘मति-दान’ कहा जाता है। उन्होंने कहा कि यदि अंत समय में मनुष्य की बुद्धि पूर्ण रूप से नारायण में लीन हो जाए, तो मृत्यु भी उत्सव बन जाती है।
जब रासेश्वरी देवी जी ने अपने मधुर कंठ से “राधे राधे गाए जा…” और “वर दे वर दे राधे…” जैसे पदों का संकीर्तन कराया, तो पूरा आशीष वाटिका परिसर भक्ति, विरह और भावनाओं के अश्रुओं से सराबोर हो उठा। इसके बाद श्रीमद्भागवत महापुराण की भव्य आरती उतारी गई और श्रद्धालुओं ने अद्भुत मानसिक शांति एवं आध्यात्मिक आनंद का अनुभव किया।
भागवत महापुराण प्रवचन श्रृंखला प्रतिदिन सायंकाल 7 बजे से रात्रि 9 बजे तक आशीष वाटिका, हिरण मगरी सेक्टर-13, उदयपुर में आयोजित की जा रही है, जो 25 मई तक जारी रहेगी।