एन जी भट्ट
भारत ने जब से इकोनॉमो ग्रोथ में छलांग लगाई है और चौथे पायदान से तीसरे स्थान पर कब्जा करने की कोशिश में है और इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बढ़ती वैश्विक लोकप्रियता का ग्राफ ज्यों ज्यों बढ़ रहा है । तब से भारत विश्व की महाशक्तियों की आखो की किरकरी बन गया है।भारत की स्वतंत्रता के समय ब्रिटिश जब भारत छोड़ कर जा रहे थे तब भी उन्होंने धर्म के आधार पर भारत के टुकड़े कर पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान ( वर्तमान में बांग्ला देश) बनवा दिए। वे भलीभांति यह बात जानते थे कि अखंड भारत दुनिया की बड़ी शक्ति बनने की क्षमता रखता है।
भारत ने इंदिरा गांधी और उसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके पोखरण में परमाणु परीक्षण किया तब भी विश्व की महाशक्तियों और यूरोप के देशों ने भारत पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा कर भारत के विकास के मार्ग को रोकने का प्रयास किया था।हालाकि भारत और देश के नागरिकों ने उन प्रतिबंधों से उबर कर सारी दुनिया को अपनी क्षमताओं को दिखा दिया। पिछले दिनों अमेरिका ने भारत पर कई प्रकार के टैरिफ बढ़ाने के आर्थिक दण्ड थोपे थे।लेकिन वह भारत की आत्म निर्भर भारत की मजबूत इच्छा शक्ति और राजनीतिक दृढ़ता देख दंग रह गया और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ये टैरिफ कम करने को मजबूर होना पड़ा।
हाल ही अमेरिका, इजरायल और ईरान के मध्य छिड़े युद्ध और स्टेट ऑफ हार्मिज की घेराबंदी तथा खाड़ी देशों से तेल और ऑयल की आपूर्ति बाधित होने से पूरी दुनिया में भयंकर तेल संकट उत्पन्न हो गया है तथा इस कारण अन्य आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं और अन्य वस्तुओं पर भी इसका बहुत बुरा असर पड़ रहा है। भारत में पांच प्रदेशों में विधानसभा चुनाव के चलते पेट्रोल और डीजल के भाव नियंत्रित रहे लेकिन उसके बाद पिछले कुछ दिनों में दो बार उनके भाव बढ़ गये है तथा इसका असर अन्य सभी वस्तुओं पर पड़ने से महंगाई का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहले संसद के मंच से और उसके बाद राष्ट्र को संबोधित करते हुए एक से अधिक बार देशवासियों को कोरोना काल जैसे परिस्थितियों के लिए तैयार रहने के लिए सचेत किया है। साथ ही कम से कम एक साल तक सोना नहीं खरीदने,विदेश यात्रा नहीं करने तथा तेल का उपयोग कम करने, सार्वजनिक वाहनों अथवा एक ही वाहन में एक साथ यात्रा करने के साथ ही वर्क फ्रॉम होम और वीडियो कांफ्रेस के जरिए मीटिंग करने आदि उपायों को अपनाने की अपील की है। उसका व्यापक असर भी देखा जा रहा है और आईपीएल क्रिकेट मैचों को छोड़ अब अधिकांश आयोजन एवं समारोह पर अंकुश लग रहा है। राजस्थान सकार ने भी अपने बहुत बड़े वार्षिक कार्यक्रम एग्रो मीट के आयोजन को ही निरस्त कर दिया। प्रदेश के राजपाल हरिभाऊ बागड़े, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और प्रदेश के मंत्रियों ने अपने अपने काफिले सीमित कर दिए है और इलेक्ट्रॉनिक वाहनों के साथ ही बस ,रेल और अन्य सार्वजनिक यातायात साधनों आदि से यात्रा करना शुरू कर दिया है।
इन दिनों कुछ मीडिया रिपोर्ट्स ने अमेरिका और चीन की भारत के विरुद्ध गतिविधियों की रिपोर्ट्स सार्वजानिक कर भारत के लिए गंभीर चिंता की स्थिति उत्पन्न कर दी है।अमेरिका और चीन शुरू से ही भारत के घोर विरोधी पाकिस्तान के हितैषी रहे है और उसे आर्थिक और सैन्य मदद देंते रहे है। उनके कई आर्मी बेस भी पाकिस्तान और पीओके में स्थित है। चीन पीओके में आर्थिक गलियारा बना पाकिस्तान की मदद से समुद्र के रास्ते भारत के सौराष्ट्र तक आकर भारत की घेराबंदी करना चाहता है। चीन भारत के अन्य हिस्सों जैसे सिक्किम के आसपास सीमाओं का अतिक्रमण करता ही रहता है। अमेरिका ने भी वर्षों तक अफगानिस्तान में अपनी सेनाओं की छावनियां रखी थी। मोदी सरकार के आने के बाद परिस्थितियों में काफी बदलाव आया और पाकिस्तान को हर बार मुंह की खानी पड़ी है लेकिन ये दोनों देश अंदरखाने भारत के विरुद्ध साजिश करने से बाज नहीं आ रहे।
हाल ही जो मीडिया रिपोर्ट्स सोशल मीडिया के माध्यम से सामने आ रही है, उसके अनुसार यदि पश्चिम बंगाल और आसाम आदि पूर्वोत्तर प्रदेशों में इस बार भाजपा सरकार नहीं आती तो उनके इरादे कुछ ओर ही दिख रहे थे। अमेरिका और चीन के “बृहत बांग्लादेश” को लेकर समय-समय पर कई दावे, राजनीतिक बयान और सोशल मीडिया कथाएँ सामने आती रही हैं, लेकिन अब तक ऐसा कोई सार्वजनिक और ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है जिससे यह साबित हो कि अमेरिका और चीन मिलकर भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों को काटकर “ग्रेटर बांग्लादेश” बनाने की आधिकारिक साजिश चला रहे थे। हालाँकि, बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और उनके कुछ करीबी सहयोगियों ने 2024–25 के राजनीतिक संकट के बाद अमेरिका की भूमिका पर गंभीर आरोप लगाए थे। कुछ रिपोर्टों में यह दावा किया गया कि उनकी सरकार गिराने के पीछे विदेशी ताकतों और खुफिया एजेंसियों की भूमिका हो सकती है। इसी तरह कुछ भारतीय और बांग्लादेशी विश्लेषकों ने यह आशंका भी जताई कि बांग्लादेश की अस्थिरता का असर भारत के पूर्वोत्तर और पश्चिम बंगाल पर पड़ सकता है। लेकिन यह अधिकतर भू-राजनीतिक विश्लेषण और राजनीतिक आरोपों के आधार पर है, न कि किसी प्रमाणित अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र के रूप में सत्यापित हुआ है।
जहाँ तक भाजपा के विधानसभा चुनाव जीतने से चीन और अमेरिका को ठेस वाली बात है, यह राजनीतिक व्याख्या हो सकती है। भाजपा और उसके समर्थक अक्सर यह तर्क देते हैं कि भारत में राष्ट्रवादी राजनीति मजबूत होने से अलगाववादी या विदेशी प्रभाव वाली ताकतों को झटका लगा है। दूसरी ओर विपक्षी दल इन दावों को राजनीतिक प्रचार भी बताते हैं।मीडिया रिपोर्ट्स में अमेरिका का एक ख़ुफ़िया एजेंट और “पश्चिम बंगाल में मुहिम” का उल्लेख किया है। लेकिन अभी तक किसी विश्वसनीय सरकारी दस्तावेज़, अदालत, या अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसी ने ऐसी किसी योजना की पुष्टि नहीं की है।हालांकि इस संबंध में सोशल मीडिया और यूट्यूब पर कई दावे वायरल हुए हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश स्वतंत्र रूप की गई व्याख्या है कोई आधिकारिक सत्यापित तथ्य सामने नहीं आया हैं। तथ्यात्मक रूप से इतना जरूर कहा जा सकता है कि भारत का उत्तर-पूर्व पूरा अँचल सामरिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। बांग्लादेश, चीन, अमेरिका और भारत सभी की इस क्षेत्र में रणनीतिक रुचि है।अवैध घुसपैठ, कट्टरपंथ, सीमा सुरक्षा और जनसंख्या परिवर्तन जैसे मुद्दों पर भारत में लंबे समय से राजनीतिक बहस चलती रही है लेकिन “भारत को तोड़कर बृहत बांग्लादेश” बनाने की किसी अंतरराष्ट्रीय योजना के प्रमाण का सार्वजनिक रूप से कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। इसलिए इस तरह के दावों को राजनीतिक बयान, भू-राजनीतिक आशंका और अपुष्ट कथाओं के रूप में देखना अधिक उचित होगा, जब तक कि उनके समर्थन में ठोस और आधिकारिक प्रमाण सामने न आएँ।
इधर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की हाल ही की चीन यात्रा को केवल एक औपचारिक कूटनीतिक दौरे के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि इसके पीछे वैश्विक शक्ति- संतुलन, व्यापार, सुरक्षा और भू-राजनीतिक संदेश छिपे बताते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति की चीन यात्रा के अर्थ को जानकार इस तरह बताते है कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति चीन जाते हैं, तो उसके कई संकेत होते हैं जैसे तनाव कम करने की कोशिश यानी
अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध, ताइवान, दक्षिण चीन सागर, तकनीक और सैन्य प्रतिस्पर्धा को लेकर तनाव रहता है। ऐसे दौरे यह संकेत देते हैं कि दोनों महाशक्तियाँ टकराव को नियंत्रित रखना चाहती हैं। इसके अलावा इन दौरों में आर्थिक हित सर्वोपरि बताये जाते है।अमेरिका और चीन दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ हैं। व्यापार, सेमीकंडक्टर, ए आई , ऊर्जा और सप्लाई चेन पर दोनों की निर्भरता बनी हुई है। इसलिए इस प्रकार की यात्रा का अर्थ यह भी होता है कि प्रतिस्पर्धा के बावजूद संबंध पूरी तरह टूटे नहीं हैं। उसके अलावा इस यात्रा को एशिया में शक्ति संतुलन के नजरिए भी देखा है रहा है।
अमेरिका,जापान, दक्षिण कोरिया, भारत और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर इंडो- पेसेफिक रणनीति को भी चला रहा है। उनकी चीन यात्रा यह संदेश भी देती है कि अमेरिका प्रतिस्पर्धा के साथ संवाद भी बनाए रखना चाहता है।
इसी प्रकार रूस के राष्ट्रपति की चीन यात्रा के अर्थ भी काफी महत्वपूर्ण संकेत देने वाले है। रूस और चीन की नजदीकी हाल के वर्षों में काफी बढ़ी है। इस पश्चिम के खिलाफ रणनीतिक साझेदारी के रूप में देखा जाता है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर पश्चिमी प्रतिबंध बढ़े। ऐसे में चीन रूस का बड़ा आर्थिक और कूटनीतिक सहारा बना। रूस की चीन यात्रा का मतलब है कि दोनों देश अमेरिकी प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके अलावा ऊर्जा और व्यापार की दृष्टि से भी यह संकेत महत्वपूर्ण है।
रूस चीन को तेल, गैस और सैन्य तकनीक देता है। चीन रूस को बड़ा बाजार और निवेश उपलब्ध कराता है। इसलिए इस प्रकार की यात्राएँ आर्थिक गठजोड़ मजबूत करने का संकेत होती हैं। साथ ही यह यात्रा
एक “नया विश्व व्यवस्था” संदेश भी देने वाली हैं।
रूस और चीन अक्सर बहुध्रुवीय विश्व की बात करते हैं, जहाँ केवल अमेरिका का प्रभुत्व न हो। इसीलिए उनकी बैठकें पश्चिमी देशों को एक राजनीतिक संदेश भी देती हैं। इस प्रकार यदि अमेरिका और रूस दोनों महाशक्तियाँ चीन जा रही हों तो उसका व्यापक अर्थ है। एक ही समय में अमेरिका और रूस दोनों चीन के साथ सक्रिय कूटनीति कर रहे हों, तो इसके कई व्यापक रणनीतिक संकेत माने जाते हैं। चीन अब वैश्विक राजनीति का केंद्रीय शक्ति केंद्र बन चुका है।दुनिया धीरे-धीरे बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। अमेरिका चीन को प्रतिस्पर्धी मानता है, लेकिन संवाद बनाए रखना चाहता है। रूस चीन को रणनीतिक साझेदार मानकर पश्चिमी दबाव का मुकाबला करना चाहता है। एशिया, विशेषकर इंडो पैसेफिक क्षेत्र, विश्व राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण मंच बन गया है।
भारत के लिए भी यह स्थिति महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत एक ओर अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर रूस से पुराने रक्षा और ऊर्जा संबंध बनाए हुए है। इसलिए भारत संतुलित विदेश नीति अपनाने की कोशिश करता है जबकि पाकिस्तान की विदेश नीति लंबे समय से “संतुलन” पर आधारित रही है। इसलिए वह एक साथ , अमेरिका चीन और रूस तीनों देशों के साथ संबंध बनाए रखने की कोशिश कर रहा है लेकिन उसका इरादा हमेशा भारत के विरुद्ध साजिश रचना ही रहता है। भारत के चारों ओर जो देश है उनमें किसी को भारत का शुभ चिन्तक नहीं कहा जा सकता। ऐसी परिस्थिति में भारत को हमेशा सतर्क रहते हुए किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए।