प्रकृति का अनुपम उत्सव : जैव विविधता बचाना मानवता बचाना है

( 614 बार पढ़ी गयी)
Published on : 22 May, 26 16:05

प्रकृति का अनुपम उत्सव : जैव विविधता बचाना मानवता बचाना है

धरती पर जीवन की सुंदरता केवल मनुष्य से नहीं, बल्कि पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, नदियों, पर्वतों, जंगलों और सूक्ष्म जीवों के सामूहिक अस्तित्व से बनी है। प्रकृति का यही रंग-बिरंगा संसार “जैव विविधता” कहलाता है। जब सुबह पक्षियों का मधुर कलरव सुनाई देता है, खेतों में तितलियाँ उड़ती दिखाई देती हैं, जंगलों में हरियाली लहराती है और नदियाँ कल-कल बहती हैं, तब वास्तव में हम जैव विविधता की जीवंत अनुभूति कर रहे होते हैं।

प्रतिवर्ष 22 मई को पूरी दुनिया में अन्तरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण के प्रति जागरूक करना है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा आरम्भ किया गया यह दिवस हमें यह संदेश देता है कि यदि पृथ्वी पर जैव विविधता सुरक्षित रहेगी, तभी मानव जीवन भी सुरक्षित और खुशहाल रह सकेगा।

आज विज्ञान और तकनीक के इस आधुनिक युग में इंसान ने विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति का अत्यधिक दोहन शुरू कर दिया है। जंगलों की कटाई, बढ़ता प्रदूषण, नदियों का दूषित होना, वन्य जीवों का शिकार और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं ने जैव विविधता के अस्तित्व पर गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। अनेक जीव-जंतु और वनस्पतियाँ विलुप्त होने की कगार पर पहुँच चुकी हैं। यह केवल पर्यावरण के लिए ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव सभ्यता के लिए खतरे की घंटी है।

भारत जैव विविधता की दृष्टि से विश्व के सबसे समृद्ध देशों में गिना जाता है। यहाँ हिमालय की बर्फीली चोटियों से लेकर राजस्थान के रेगिस्तान, पश्चिमी घाटों के घने जंगलों से लेकर सुंदरबन के मैंग्रोव वन तक प्रकृति की अद्भुत विविधता देखने को मिलती है। देश में हजारों प्रकार की वनस्पतियाँ, पक्षी, जीव-जंतु और औषधीय पौधे पाए जाते हैं। भारतीय संस्कृति में भी प्रकृति को सदैव पूजनीय माना गया है। पीपल, बरगद, तुलसी, गाय, नाग और नदियों की पूजा हमारी परम्पराओं में प्रकृति संरक्षण की भावना को दर्शाती है।

विडम्बना यह है कि आधुनिक जीवनशैली और बढ़ती उपभोक्तावादी सोच ने मनुष्य को प्रकृति से दूर कर दिया है। प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग, रासायनिक खेती, अनियंत्रित शहरीकरण और औद्योगिकीकरण ने प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ दिया है। यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा, शुद्ध जल और हरियाली केवल पुस्तकों और चित्रों में ही देखने को मिलेगी।

जैव विविधता केवल पर्यावरण की शोभा नहीं बढ़ाती, बल्कि मानव जीवन की आधारशिला भी है। भोजन, औषधि, ईंधन, वस्त्र और जीवनोपयोगी अनेक वस्तुएँ हमें प्रकृति से ही प्राप्त होती हैं। अनेक दुर्लभ पौधों से बनने वाली दवाइयाँ आज भी गंभीर बीमारियों के उपचार में उपयोगी हैं। मधुमक्खियाँ फसलों के परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यदि जैव विविधता नष्ट होगी तो खाद्य श्रृंखला और पारिस्थितिकी तंत्र भी बुरी तरह प्रभावित होगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि केवल सरकारें ही नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक प्रकृति संरक्षण को अपना नैतिक दायित्व समझे। अधिक से अधिक वृक्षारोपण, जल संरक्षण, प्लास्टिक मुक्त जीवन, वन्य जीवों की रक्षा और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील व्यवहार अपनाकर हम जैव विविधता को बचाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। विद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं को भी इस दिशा में जागरूकता अभियान चलाने चाहिए।

अन्तरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का स्मरण है। हमें समझना होगा कि मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि जंगल सुरक्षित रहेंगे तो वर्षा होगी, नदियाँ बहेंगी, खेत लहलहाएँगे और जीवन मुस्कुराएगा।

आइए, इस अवसर पर हम सब यह संकल्प लें कि प्रकृति के इस अनमोल खजाने को सुरक्षित रखेंगे और आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ, हरित और जीवनदायी पृथ्वी सौंपेंगे। क्योंकि सच यही है —
“जैव विविधता बचेगी, तभी मानवता बचेगी।”


साभार :


© CopyRight Pressnote.in | A Avid Web Solutions Venture.