लेखक— भगवान प्रसाद गौड़, उदयपुर
भारत में आरक्षण व्यवस्था केवल सरकारी नीति नहीं बल्कि सामाजिक न्याय की संवैधानिक प्रतिबद्धता थी। इसका उद्देश्य उन वर्गों को अवसर उपलब्ध कराना था, जो सदियों तक सामाजिक भेदभाव, शैक्षिक पिछड़ेपन और आर्थिक अभाव से जूझते रहे। लेकिन सात दशक बाद आज देश एक ऐसे दौर में खड़ा है जहाँ यह प्रश्न गंभीरता से उभर रहा है कि क्या आरक्षण व्यवस्था अपनी मूल भावना के अनुरूप काम कर रही है या फिर वह धीरे-धीरे सीमित वर्गों तक केंद्रित स्थायी लाभ की व्यवस्था बनती जा रही है?
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया की जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने ओबीसी क्रीमी लेयर मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए इस विषय को फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया। कर्नाटक हाईकोर्ट की खंडपीठ के फैसले के खिलाफ सुनवाई करते हुए पीठ ने सवाल उठाया कि यदि किसी परिवार ने आरक्षण के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक रूप से पर्याप्त प्रगति कर ली है तथा उच्च प्रशासनिक पदों तक पहुंच बना ली है तो क्या उसकी अगली पीढ़ियों को भी उसी प्रकार आरक्षण का लाभ मिलता रहना चाहिए? अदालत की यह टिप्पणी केवल न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बल्कि उस व्यापक सामाजिक चिंतन का संकेत है, जिसकी आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी।
सच यह है कि भारत में आरक्षण पर संवाद अक्सर संतुलित विमर्श की बजाय भावनात्मक प्रतिक्रियाओं और राजनीतिक दृष्टिकोणों के बीच उलझ जाता है। कहीं इसे पूरी तरह अछूता विषय मान लिया जाता है, तो कहीं सम्पूर्ण व्यवस्था को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। जबकि किसी भी लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में होती है कि वह संवेदनशील विषयों पर भी शांत, तथ्याधारित और दूरदर्शी चर्चा कर सके। मुद्दा आरक्षण समाप्त करने का नहीं बल्कि उसकी पारदर्शिता, प्रभावशीलता और वास्तविक पात्र तक पहुंच सुनिश्चित करने का है।
संविधान निर्माताओं ने आरक्षण को सामाजिक उपचार के रूप में देखा था न कि स्थायी संरचना के रूप में। उनका उद्देश्य यह था कि वंचित वर्गों को विशेष अवसर देकर उन्हें मुख्यधारा में लाया जाए ताकि भविष्य में प्रतिस्पर्धा अपेक्षाकृत समान आधार पर हो सके। लेकिन समय के साथ राजनीति ने इस विषय को सामाजिक सुधार से अधिक चुनावी समीकरणों के नजरिए से देखना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि समयानुकूल समीक्षा का विषय लगातार टलता चला गया।
आज भी देश में बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं, जिन्हें आरक्षण का वास्तविक लाभ कभी नहीं मिल पाया, जबकि उसी वर्ग के कुछ सक्षम परिवार लगातार पीढ़ियों से इसका लाभ प्राप्त करते रहे हैं। यह स्थिति सामाजिक न्याय की मूल भावना पर सवाल खड़े करती है। यदि व्यवस्था का लाभ अंतिम जरूरतमंद तक नहीं पहुंच पा रहा, तो उसकी समीक्षा लोकतांत्रिक दायित्व बन जाती है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि सरकारें समय-समय पर जनगणना करती हैं, परिसीमन करती हैं, मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण करती हैं और आर्थिक नीतियों में बदलाव करती हैं, लेकिन आरक्षण व्यवस्था की व्यापक सामाजिक और आर्थिक समीक्षा लगभग स्थिर बनी रहती है। क्या बदलते सामाजिक परिवेश में नीतियों की समीक्षा आवश्यक नहीं होनी चाहिए? क्या परिस्थितियों के परिवर्तन के बावजूद व्यवस्थाएं स्थायी रूप से अपरिवर्तित रह सकती हैं?
आज आवश्यकता आरक्षण के पक्ष और विपक्ष की राजनीतिक बहस से ऊपर उठकर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श की है। देश को यह तय करना होगा कि सामाजिक न्याय का वास्तविक आधार क्या होना चाहिए-सिर्फ जातीय पहचान या फिर शिक्षा, आर्थिक स्थिति और सामाजिक अवसरों का समग्र मूल्यांकन? क्योंकि अब अभाव और अवसरों की कमी किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रह गई है।
इसी प्रकार सरकारी कल्याणकारी योजनाओं की पात्रता पर भी समयानुकूल पुनर्विचार आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से सक्षम है, नियमित पेंशन प्राप्त कर रहा है या पर्याप्त संसाधनों वाला है, तो क्या उसे भी उन्हीं योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए, जिनका उद्देश्य कमजोर वर्गों को सहारा देना था? सीमित संसाधनों वाले देश में कल्याणकारी नीतियों का लक्ष्य अधिकतम राजनीतिक लाभ नहीं बल्कि अधिकतम सामाजिक संतुलन होना चाहिए।
यह भी विचारणीय है कि भविष्य में ऐसी व्यवस्था विकसित की जाए, जिसमें आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ समय-समय पर समीक्षा के आधार पर वास्तविक पात्रता से जुड़ा हो। “एक परिवार–एक अवसर” जैसे सुझावों पर भी संवैधानिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक चर्चा हो सकती है, ताकि अवसरों का दायरा अधिक जरूरतमंद परिवारों तक पहुंच सके। हालांकि ऐसे किसी भी बदलाव में सामाजिक संवेदनशीलता और संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक होगा।
शायद अब समय आ गया है कि देश “सामाजिक न्याय” और “राजनीतिक सुविधा” के बीच का अंतर समझे। सामाजिक न्याय का अर्थ केवल संरक्षण देना नहीं बल्कि अवसरों का न्यायपूर्ण वितरण सुनिश्चित करना है। यह तभी संभव होगा, जब व्यवस्थाएं समय-समय पर समीक्षा, सुधार और पारदर्शिता को स्वीकार करें।
भारत की लोकतांत्रिक शक्ति उसकी संवाद क्षमता में निहित है। कठिन प्रश्नों से दूरी बनाना समाधान नहीं होता। यदि देश ईमानदारी से इस विषय पर विचार करेगा तो संभव है कि भविष्य में ऐसी व्यवस्था विकसित हो सके, जहाँ किसी व्यक्ति की पहचान नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक आवश्यकता प्राथमिकता बने। यही संविधान की मूल भावना भी है और एक संतुलित, समरस तथा सशक्त भारत की दिशा भी।