चित्त रूपी दर्पण का मार्जन और अहैतुकी शरणागति ही श्रीकृष्ण प्राकट्य का वास्तविक मर्म: रासेश्वरी देवी जी

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Published on : 23 May, 26 17:05

चित्त रूपी दर्पण का मार्जन और अहैतुकी शरणागति ही श्रीकृष्ण प्राकट्य का वास्तविक मर्म: रासेश्वरी देवी जी

उदयपुर | झीलों की नगरी उदयपुर के हिरण मगरी सेक्टर-13 स्थित 'आशीष वाटिका' के पावन प्रांगण में इन दिनों अध्यात्म की अनूठी वैचारिक क्रांति चल रही है। नौ दिवसीय "पंचम वेद श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञान रहस्य" महोत्सव के सप्तम दिवस पर अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक वक्ता पूजनीया रासेश्वरी देवी जी की दिव्य वाणी से प्रस्फुटित हुए दार्शनिक सूत्रों ने पांडाल में मौजूद हजारों प्रबुद्ध श्रोताओं को आत्म-मंथन करने पर विवश कर दिया। इस अलौकिक सत्र का शुभारंभ शंखध्वनि, वेदमंत्रों के सस्वर पाठ और सामूहिक दीप प्रज्वलन के साथ हुआ, जिसने पूरे परिसर को सकारात्मक तरंगों से भर दिया।
दिव्य मंच से 'भक्ति के विशुद्ध स्वरूप' की व्याख्या करते हुए रासेश्वरी देवी जी ने कहा कि कलयुग में मानव मात्र का परम चरम लक्ष्य केवल निष्काम भक्ति है, जिसे शास्त्रों में 'अनपायनी भक्ति' कहा गया है। मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह भगवान से सांसारिक वस्तुओं, नौकरी या संतान जैसी नश्वर याचनाएँ करता है, जो वास्तव में केवल प्रारब्ध या क्रियामाण के परिश्रम से ही संभव हैं। भक्ति को कामनाओं से मुक्त रखना चाहिए, यहाँ तक कि मोक्ष की कामना भी भक्ति को कलंकित करती है। उन्होंने गौरांग महाप्रभु के'चेतो दर्पण मार्जनम'सूत्र को समझाते हुए कहा कि अनादि काल के पापों के कारण हमारे चित्त रूपी दर्पण पर मोटी परत जम गई है, जिसके कारण हमारे भीतर बैठे साक्षात परमात्मा का प्रतिबिंब हमें दिखाई नहीं देता। इस मैली परत को साफ करने का एकमात्र साधन भगवन्नाम का निरंतर मानसिक आश्रय है। जब मन से नाम का अनुशीलन होता है, तो मनुष्य को आधि (अभाव का दुख), व्याधि (शारीरिक रोग) और उपाधि (दूसरों से मिलने वाले कष्ट) रूपी त्रितापों की भयानक दावानल से मुक्ति मिल जाती है।
प्रवचन के मध्य में पूजनीया देवी जी ने छठे और सातवें स्कंध के प्रसंगों का अभूतपूर्व दार्शनिक विवेचन किया। उन्होंने वृत्रासुर के चरित्र की गहराई को उजागर करते हुए कहा कि एक असुर के शरीर में होने के बावजूद वृत्रासुर ने युद्ध के मैदान में भगवान से केवल 'दासानुदास' होने का वरदान माँगा और मोक्ष को ठुकरा कर केवल विरह की वह चरम वेदना माँगी जो साधक के अहं को भस्म कर देती है। इसी प्रकार, कयाधु के गर्भ में ही नारद जी से भक्ति का बीजारोपण प्राप्त करने वाले भक्त प्रहलाद का प्रसंग समझाते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि सच्ची शरणागति सभी इच्छाओं के मूल उच्छेदन में है। प्रहलाद ने हिरण्यकश्यप द्वारा दी गई भयंकर यातनाओं को भी भगवान का अनुग्रह माना, क्योंकि विरह और संकट का ताप ही जीव के प्रेम को सुदृढ़ करता है। खंभे को चीरकर प्रकट हुए नरसिंह भगवान ने जब प्रहलाद को गोद में लेकर लाड किया और वरदान माँगने को कहा, तो प्रहलाद ने केवल यही माँगा कि उनके हृदय में कभी किसी वस्तु को पाने की कामना ही उत्पन्न न हो।
सत्र के उत्तरार्ध में पांडाल का आध्यात्मिक वातावरण उस समय परमानंद की पराकाष्ठा पर पहुँच गया, जब कंस के कारागार में साक्षात पूर्णब्रह्म सच्चिदानंद श्रीकृष्ण के प्राकट्य का दिव्य प्रसंग शुरू हुआ। पूजनीया देवी जी ने तत्व ज्ञान देते हुए स्पष्ट किया कि आज से 5000 वर्ष पूर्व द्वापर के अंत में जो कृष्ण अवतरित हुए, वे किसी नारायण के अंश या पुरुष अवतार नहीं थे, बल्कि वे स्वयं गोलोक बिहारी अवतारी पूर्णतम ब्रह्म थे, जो धरा पर ब्रज प्रेम लुटाने आए थे। जैसे ही देवकी के समक्ष चतुर्भुज रूप का त्याग कर प्रभु ने नन्हे शिशु का रूप धारण किया, वैसे ही संपूर्ण पांडाल में साक्षात 'कृष्ण जन्म' का अलौकिक प्रसंग जीवंत हो उठा। इस पावन बेला को एक विस्मयकारी और भावपूर्ण जीवंत नाटक (Act) के माध्यम से मंच पर भी सजीव रूप में दर्शाया गया। टोकरी में विराजमान नन्हे ठाकुर जी को जब वासुदेव जी कारागार की बेड़ियों को पार कर गोकुल की ओर ले जाने लगे, तो हजारों श्रद्धालुओं की आँखें अश्रुओं से भीग गईं।
दिव्य प्रसंग के आनंद में डूबकर पूजनीया देवी जी ने जब अपने मधुर और ओजस्वी कंठ से "मंगल गाओ सभी मिलकर, मेरे गोपाल आए हैं..."और संपूर्ण मारवाड़ व ब्रज के सामूहिक उल्लास को समेटे हुए "नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की... हाथी घोड़ा पाल की, जय कन्हैया लाल की..."का महासंकीर्तन शुरू कराया, तो हजारों श्रद्धालु अपने स्थानों पर खड़े होकर भावविभोर होकर नृत्य करने लगे। पांडाल में चारों ओर खिलौने और मिठाइयाँ लुटाई गईं, मानो साक्षात नंदभवन आशीष वाटिका में उतर आया हो। इसके उपरांत बाल गोपाल की अलौकिक महाआरती उतारी गई और उपस्थित जनसैलाब में भव्य बधाई एवं महाप्रसाद का वितरण किया गया।
भागवत महापुराण प्रवचन श्रृंखला प्रतिदिन सायंकाल 7:00 बजे से रात्रि 9:00 बजे तक आशीष वाटिका, हिरण मगरी सेक्टर-13, उदयपुर में आयोजित की जा रही है और यह 25 मई तक जारी रहेगी।


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