भारत में पेट्रोल के भाव तीसरी बार बढ़े, फिर भी तुलनात्मक रूप से विश्व में सबसे कम — सरकार का दावा

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Published on : 24 May, 26 17:05

एन जी भट्ट 

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत में पेट्रोल और डीज़ल के दामों में हाल ही तीसरी बार बढ़ोतरी की गई है। पेट्रोलियम कंपनियों द्वारा की गई इस वृद्धि के बाद आम आदमी की जेब पर अतिरिक्त बोझ बढ़ा है। विपक्ष सरकार को महंगाई के मुद्दे पर घेर रहा है, वहीं केंद्र सरकार का दावा है कि वैश्विक तुलना में भारत में ईंधन की कीमतें अभी भी अपेक्षाकृत कम हैं और कई विकसित देशों की तुलना में भारतीय उपभोक्ताओं को कम कीमत पर पेट्रोल उपलब्ध कराया जा रहा है।

भारत में पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि का सबसे बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी को माना जा रहा है। ईरान–इजरायल तनाव, समुद्री व्यापार मार्गों पर असुरक्षा और तेल उत्पादक देशों की उत्पादन नीतियों ने वैश्विक बाजार को प्रभावित किया है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाले हर बदलाव का सीधा असर देश की पेट्रोल-डीज़ल कीमतों पर पड़ता है।
सरकार का तर्क है कि हालिया वृद्धि के बावजूद भारत में ईंधन की कीमतें कई यूरोपीय देशों और एशियाई अर्थव्यवस्थाओं से कम हैं। सरकार के अनुसार भारत में पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि नियंत्रित रखी गई है, जबकि कई देशों में पेट्रोल की कीमतों में भारी उछाल देखा गया है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों में पेट्रोल की कीमतें भारतीय मुद्रा में परिवर्तित करने पर भारत से अधिक बताई जा रही हैं।
हालाँकि यह तुलना पूरी तरह सीधी नहीं मानी जा सकती। भारत में आम नागरिक की आय पश्चिमी देशों की तुलना में काफी कम है। इसलिए भले ही डॉलर के हिसाब से पेट्रोल सस्ता दिखाई दे, लेकिन भारतीय मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों के लिए यह अभी भी महँगा महसूस होता है। यही कारण है कि विपक्ष और आर्थिक विशेषज्ञ सरकार के “दुनिया में सबसे कम” वाले दावे पर सवाल उठाते हैं। उनका कहना है कि केवल अंतरराष्ट्रीय तुलना करने के बजाय जनता की क्रय शक्ति और घरेलू आर्थिक स्थिति को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

पेट्रोल की कीमतों में करों की भूमिका भी लगातार बहस का विषय बनी हुई है। भारत में पेट्रोल की खुदरा कीमत का बड़ा हिस्सा केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लगाए गए करों से बनता है। केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी वसूलती है, जबकि राज्य सरकारें वैट लगाती हैं। कई बार अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होने के बावजूद उपभोक्ताओं को उसका पूरा लाभ नहीं मिल पाता क्योंकि कर संरचना में बड़ा बदलाव नहीं किया जाता।सरकार का पक्ष यह है कि पेट्रोल और डीज़ल पर मिलने वाले करों से देश में सड़क, रेलवे, स्वास्थ्य, गरीब कल्याण और आधारभूत ढाँचे की परियोजनाओं को वित्तीय सहायता मिलती है। कोविड महामारी के बाद अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखने और विकास कार्यों को गति देने के लिए भी सरकार ने इन राजस्व स्रोतों को महत्वपूर्ण बताया है।दूसरी ओर, आम जनता की चिंता अलग है। पेट्रोल महँगा होने का प्रभाव केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थ, सब्जियाँ, फल, निर्माण सामग्री और दैनिक उपयोग की वस्तुएँ भी महँगी हो जाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इसका असर और अधिक महसूस होता है, जहाँ निजी परिवहन और कृषि कार्यों में ईंधन की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को लंबे समय में पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करनी होगी। इलेक्ट्रिक वाहन, एथेनॉल मिश्रण, हरित ऊर्जा और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना भविष्य की आवश्यकता बनता जा रहा है। सरकार भी ई-वाहनों और जैव ईंधन के उपयोग को प्रोत्साहित करने की दिशा में कई योजनाएँ चला रही है।

कुल मिलाकर पेट्रोल की कीमतों में तीसरी वृद्धि ने आम जनता की चिंता बढ़ाई है, लेकिन सरकार इसे वैश्विक परिस्थितियों की मजबूरी बताते हुए यह दावा कर रही है कि भारत में ईंधन की कीमतें अभी भी तुलनात्मक रूप से नियंत्रित हैं। वास्तविकता यह है कि वैश्विक बाजार, कर व्यवस्था, आय स्तर और आम आदमी की क्रय शक्ति — इन सभी पहलुओं को साथ देखकर ही पेट्रोल कीमतों पर संतुलित दृष्टिकोण बनाया जा सकता है।
 


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