काउंसलिंग व्यवस्था ओर डिजायर में खेल

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Published on : 01 Jun, 26 18:06

दिखाने से ज्यादा छुपाने में माहिर है शिक्षा विभाग

काउंसलिंग व्यवस्था ओर डिजायर में खेल

बांसवाड़ा। राजस्थान सरकार में सर्विस रूल्स के अनुसार कोई भी राज्य कर्मचारी किसी राजनैतिक पार्टी की गतिविधियों में शामिल नहीं हो सकता हैं किन्तु व्याख्याताओं, वरिष्ठ अध्यापक,अध्यापक सहित विभिन्न संवर्ग में स्थानांतरण नीति के अभाव में माननीयों के सिफारिश पर ही पदस्थापन होता है जिसे डिजायर कहते है और राज्य सरकार के पास कर्मचारियों को सुविधाजनक पदस्थापन में सुविधाएं देखी जाती हैं यह डिजायर  पत्र माननीयों के ईर्द गिर्द समूह विशेष भेंट पूजा करने पर कृपा ओर सिफारिश पत्र जारी होता है।

यह कहना है वर्योवृद्ध शिक्षक नेता सियाराम शर्मा का।

वो आज शिक्षकों की पीड़ा ओर राजस्थान सरकार का रुख विषयक विचार गोष्ठी में मुख्य अतिथि पद से सम्बोधित कर रहे थे।

उन्होंने राजस्थान सरकार को चेतावनी भरे अंदाज़ में कहा कि राजस्थान सरकार के कथनी और करनी में अन्तर है एक ओर राज्य कर्मचारी किसी राजनैतिक पार्टी के कार्यक्रम में भाग नहीं ले सकता हैं तो डिजायर पद्धति से स्थानांतरण क्यों किए जाते हैं और भ्रष्टाचार मुक्त शासन की बात करना संविधान सम्मत है तो डिजायर की आवश्यकता क्यों है नीति नियम क्यों नहीं बनाए जाते है कौन रोक रहा है।

विचार गोष्ठी में वक्ताओं ने बताया कि डिजायर की आड़ में सत्ता के मठाधीशों द्वारा भ्रष्टाचार और सुविधा शुल्क कर्मचारियों को विधि विरुद्ध कार्य करने को प्रेरित करता है ।

इसके अलावा उन्होंने प्रमोशन काउंसलिंग में सभी रिक्त पदों को जिले वार घोषित कर निकटवर्ती स्थान पर पदस्थापन की मांग की।

 वक्ताओं ने बताया कि राजस्थान सरकार में शिक्षा विभाग में अधिकारियों द्वारा काउंसलिंग में रिक्त पद दिखाने की जगह छुपाने में सिद्धहस्त होने का आरोप लगाते हुए कहा कि स्वैच्छिक काउंसलिंग के नाम पर जबरन का तबादला प्रमोशन होता हैं जिसमें 
न पीएल मिलती हैं न भत्ता ओर बाद में सुविधा शुल्क से सशोधन जारी होते हैं।

*हींग लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा आए*

वक्ताओं ने कहावत को उद्धरत करते हुए कहा कि इन दिनों शिक्षा विभाग के पदोन्नति प्रमोशन काउंसलिंग व्यवस्था में पदस्थापन खेल पर बिलकुल सटीक बैठती है। 

विभाग ने बिना एक पैसा खर्च किए कर्मचारियों के हक पर डाका डालने की ऐसी मास्टर क्लास शुरू की है कि दोनों हाथों में लड्डू सिर्फ विभाग के है और शिक्षक के हाथ में आई है सिर्फ दूरदराज की धूल और मानसिक प्रताड़ना।

वक्ताओं ने कहा कि पहले जब पदोन्नति होती थी, तो नियम कायदों के तहत कार्मिकों को 10 उपार्जित अवकाश  और यात्रा भत्ता  मिलता था। 

फिर विभाग के उच्च अधिकारियों के दिमाग की बत्ती जली और एंट्री हुई काउंसलिंग व्यवस्था की।

तर्क दिया गया कि भाई आप अपनी मर्जी से मनपसंद जगह चुन रहे हो तो सरकार का तेल क्यों फूंके? चलिए मान लिया
 
क्योंकि तत्कालीन शिक्षा मंत्री श्री वासुदेव देवनानी के समय जब यह काउंसलिंग व्यवस्था शुरू की गई थी तो उस समय समस्त रिक्त पदों को दर्शाया जाता था। शहरी क्षेत्र / सुविधाजनक क्षेत्र सभी उसमें सम्मिलित होते थे।

 लेकिन अब इस काउंसलिंग के नाम पर जो घालमेल और पदों की लुका-छिपी का खेल चल रहा है उसने विभाग के दोहरेपन को पूरी तरह उजागर कर दिया है। 

दिखाकर सब्जबाग हमको वो हक हमारा  मार जाते हैं
सजाकर महफिलें अपनी,वो हमको दूरदराज भिजवाते हैं ।

पदों की जादूगरी

 काउंसलिंग व्यवस्था में सभी पदों को ना दिखाए जाने का चलन वर्तमान समय में ही शुरू हुआ।

 विवश मजबूर लाचार शिक्षक अन्याय सहता शिक्षक देख रहा है कि काउंसलिंग की इस कथित पारदर्शी व्यवस्था को इस कदर बदरंग कर दिया गया है कि शहरी और सुविधाजनक क्षेत्रों के अच्छे पदों को सीक्रेट लॉकर में छुपा दिया जाता है। 
वर्षों तक दूर दराज क्षेत्रों में कार्य करने के बाद भी प्रमोशन काउंसलिंग में दूरस्थ डार्क जॉन ग्रामीण अंचल सुदूर ही मिलता हैं।
काउंसलिंग में सुविधा जनक जब वो पद स्क्रीन पर दिखेंगे ही नहीं तो शिक्षक मजबूरन दूर-दराज के डार्क जोन और ग्रामीण क्षेत्रों को चुनने के लिए विवश होगा। इसे स्वैच्छिक चयन कहना लोकतंत्र के नाम पर मजाक है। यह इच्छा नहीं बल्कि तंत्र द्वारा थोपी गई मजबूरी है। हद तो तब हो जाती है जब इस चक्रव्यूह से तंग आकर कई शिक्षक काउंसलिंग में भाग ही नहीं लेते। तब विभाग अपनी मर्जी की लाठी चलाता है और बचे-कुचे पदों पर उन्हें जबरन पटक देता है। 

वक्ताओं ने कहा कि 
अब सवाल यह उठता है कि जब स्थान शिक्षक की मर्जी का है ही नहीं, जब उसे अपनी पहली, दूसरी या तीसरी चॉइस मिली ही नहीं, या जिसे विभाग ने खुद अपनी मर्जी से पदस्थापन ट्रांसफर किया है तो फिर उसके 10 उपार्जित अवकाश और यात्रा भत्ते दिया जाना चाहिए।

*नीति अपनी बदलकर वो पीठ अपनी थपथपाते हैं*
*लूटकर हक मुलाजिम का, वो खुद को स्मार्ट बताते हैं*।

 शोषित शिक्षकों  की यह खामोशी किसी बड़े तूफान का संकेत है। न्याय की नैसर्गिक व्यवस्था का गला घोंटकर कोई भी सरकार लंबे समय तक चैन से नहीं रह सकती। 

गोष्ठी में शामिल वीरेंद्र शर्मा भीलवाड़ा, ललित आर पाटीदार, नवीन कुमार शर्मा, रामदयाल मीणा सहित विभिन्न जिलों के शिक्षक सम्मिलित हुए।

गोष्ठी के अन्त में आगामी आन्दोलन के अगले चरणों की रूपरेखा प्रस्तुत की गई।
 


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