कभी गाँव और शहर के बीच से गुज़रती सड़कें केवल रास्ते नहीं होती थीं, वे रिश्तों की डोर भी होती थीं। उन रास्तों पर चलने वाले लोग केवल अपने गंतव्य तक नहीं पहुँचते थे, वे एक-दूसरे के सुख-दुःख, हालचाल और आत्मीयता तक भी पहुँचते थे। रास्ते में पड़ने वाले गाँव, चौपाल, चाय की दुकानें, कुएँ, खेत और पेड़ मानो जीवन के पड़ाव हुआ करते थे। सफ़र केवल दूरी तय करने का माध्यम नहीं था, बल्कि आदमियों से मिलने का अवसर भी था।
दरअसल, रास्ते केवल मिट्टी, डामर और पत्थरों से बनी पट्टियाँ नहीं होते, वे समाज और रिश्तों की धमनियाँ होते हैं। जिस प्रकार धमनियाँ शरीर के प्रत्येक अंग तक रक्त पहुँचाकर जीवन का संचार करती हैं, उसी प्रकार रास्ते लोगों, परिवारों और समुदायों के बीच संवाद, संवेदना और अपनत्व का प्रवाह बनाए रखते हैं। जब रास्ते आबाद होते हैं तो मुलाकातें होती हैं, हालचाल पूछे जाते हैं, सुख-दुःख साझा होते हैं और रिश्तों में गर्माहट बनी रहती है। लेकिन जब ये रास्ते बाइपास हो जाते हैं, तो केवल यातायात ही नहीं बदलता, संबंधों का प्रवाह भी प्रभावित होने लगता है। जैसे धमनियों में अवरोध आने पर हृदय तक रक्त का संचार बाधित हो जाता है, वैसे ही लोगों के बीच आने-जाने, मिलने-जुलने और संवाद के रास्ते कम होने पर रिश्तों में आत्मीयता का संचार भी कम होने लगता है।
फिर विकास के नाम पर बाइपास बनने लगे। उनका उद्देश्य उचित भी था—यात्रा को तेज़, सुगम और सुविधाजनक बनाना। अब वाहन गाँवों और कस्बों के भीतर से नहीं गुजरते, सीधे अपने गंतव्य तक पहुँच जाते हैं। समय बचता है, ईंधन बचता है, लेकिन शायद कुछ और भी है जो पीछे छूट गया।
*जब रास्तों ने बस्तियों को बाइपास करना शुरू किया, तब अनजाने में लोगों ने भी लोगों को बाइपास करना शुरू कर दिया।* पहले किसी रिश्तेदार के गाँव के पास से गुज़रते तो बिना मिले आगे बढ़ना असभ्यता माना जाता था। अब हम कहते हैं—“समय नहीं था, बाइपास से निकल गए।” धीरे-धीरे यह बाइपास केवल सड़कों तक सीमित नहीं रहा, यह हमारे व्यवहार और संबंधों में भी उतर आया।
*आज हम एक-दूसरे की ज़िंदगी के पास से तो गुज़रते हैं, लेकिन उसमें प्रवेश नहीं करते।* किसी के दुःख का समाचार मिलता है तो एक संदेश भेजकर औपचारिकता पूरी कर लेते हैं। किसी की ख़ुशी पर एक इमोजी भेज देना पर्याप्त समझते हैं। मुलाक़ातों की जगह वीडियो कॉल ने ले ली, संवाद की जगह फॉरवर्ड संदेशों ने, और आत्मीयता की जगह औपचारिकताओं ने।
*पहले रिश्तों में समय लगाया जाता था, अब समय बचाया जाता है।* पहले लोग मंज़िल से अधिक साथ चलने वालों को महत्व देते थे, अब मंज़िल ही सब कुछ बन गई है। परिणाम यह हुआ कि भौतिक दूरी भले कम हो गई हो, लेकिन भावनात्मक दूरियाँ बढ़ती चली गईं।
*विडंबना देखिए कि जब अपनापन, संवाद और संवेदनाएँ बाइपास होने लगीं, तब दिल भी बीमार पड़ने लगे।* केवल शरीर के दिल नहीं, मन के दिल भी। अकेलापन बढ़ा, अवसाद बढ़ा, तनाव बढ़ा। लोग भीड़ में रहकर भी अपनेपन के लिए तरसने लगे। यही कारण है कि आज अस्पतालों में हृदय की बाइपास सर्जरी बढ़ रही है, जबकि समाज में दिलों के बीच की दूरी भी बढ़ती जा रही है।
कहने को यह केवल एक संयोग है, लेकिन प्रतीकात्मक रूप से देखें तो इसमें एक गहरी सामाजिक सच्चाई छिपी है। *गाँव-शहर के बीच गुज़रते रस्ते छोड़ जब से बाइपास हुए हैं, रिश्ते-नातों से अपनापन और प्यार भी बाइपास हुए हैं; नतीजा यह हुआ कि दिलों की सर्जरी भी बाइपास होने लगी।* यह वाक्य केवल चिकित्सा विज्ञान की नहीं, हमारे समय की सामाजिक विडंबना की भी कहानी कहता है।
*दरअसल, दिल की सबसे बड़ी बीमारी धमनियों का अवरुद्ध होना नहीं, बल्कि संवेदनाओं का अवरुद्ध होना है।* जब मनुष्य, मनुष्य तक पहुँचने के रास्ते बंद कर देता है; जब हालचाल पूछने का समय नहीं बचता; जब रिश्ते सुविधा और स्वार्थ की कसौटी पर तौले जाने लगते हैं, तब दिलों की बाइपास सर्जरी शुरू हो जाती है। शरीर की धमनियों का उपचार शल्य चिकित्सा से हो सकता है, लेकिन रिश्तों की धमनियों का उपचार केवल प्रेम, संवाद और आत्मीयता से ही संभव है।
विकास का विरोध नहीं किया जा सकता, न ही बाइपास सड़कों का। लेकिन यह ज़रूर याद रखना होगा कि जीवन में कुछ रास्ते ऐसे भी होने चाहिए जो सीधे दिल तक जाएँ। कुछ समय ऐसा भी होना चाहिए जो केवल अपने लोगों के लिए सुरक्षित हो। कुछ मुलाक़ातें ऐसी भी हों जिनका कोई व्यावसायिक उद्देश्य न हो, केवल आत्मीयता हो।
सड़कों के बाइपास हमें जल्दी मंज़िल तक पहुँचा सकते हैं, लेकिन रिश्तों के बाइपास हमें भीतर से वीरान कर देते हैं। इसलिए *ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने जीवन में कुछ पुराने रास्ते फिर से खोलें—हालचाल पूछने के, बिना कारण मिलने के, दुःख में साथ खड़े होने के और ख़ुशी में दिल से मुस्कुराने के।*
क्योंकि जब रिश्तों की धमनियों में प्रेम और अपनत्व का प्रवाह बना रहता है, तब समाज का हृदय भी स्वस्थ रहता है। और जब दिल से दिल तक जाने वाले रास्ते खुले रहते हैं, तब मनुष्यता को किसी बाइपास की आवश्यकता नहीं पड़ती।
गाँव-शहर के बीच गुज़रते रस्ते जब से बाइपास हुए हैं,
रिश्तों के आँगन सूने और संवाद भी उदास हुए हैं।
पहले राहों में लोग मिला करते थे मुस्कानों के साथ,
अब मंज़िल तो मिल जाती, मगर सफ़र निराश हुए हैं।
घर के दरवाज़े खुले हैं, मगर दिल के दरवाज़े बंद पड़े,
चेहरों पर उजियारे लेकिन मन के भीतर त्रास हुए हैं।
सुविधाओं की तेज़ रफ़्तार ने ऐसा जादू कर डाला,
अपने ही अपने लोगों से जाने कब संन्यास हुए हैं।
चिट्ठी, चौपाल, हालचाल सब पीछे छूट गए जैसे,
मोबाइल के इस जंगल में रिश्ते भी वनवास हुए हैं।
जब से अपनापन बाइपास हुआ है जीवन की राहों में,
तब से जाने कितने दिल ख़ामोशी के दास हुए हैं।
रस्तों का बाइपास तो विकास की निशानी है लेकिन,
दिल से दिल तक जाने वाले मार्ग क्यों हताश हुए हैं?
*‘अनजाना’ फिर लौट चलें उन कच्ची पगडंडियों की ओर,*
*जहाँ मोहब्बत के रिश्ते हर मौसम में ख़ास हुए हैं।*