आस्था नहीं, अंधविश्वास का कारोबार बन रही सोशल मीडिया रीलें

( 513 बार पढ़ी गयी)
Published on : 04 Jun, 26 06:06

डर और लालच के जरिए बढ़ाया जा रहा एंगेजमेंट, विशेषज्ञों ने जताई चिंता

आस्था नहीं, अंधविश्वास का कारोबार बन रही सोशल मीडिया रीलें

उदयपुर। फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इन दिनों धार्मिक भावनाओं से जुड़ी ऐसी रीलों और पोस्टों की बाढ़ आ गई है, जिनमें लोगों को भय और लालच के माध्यम से प्रतिक्रिया देने के लिए प्रेरित किया जाता है। "ॐ नमः शिवाय लिखो, नहीं तो अनिष्ट होगा", "इस वीडियो को 11 लोगों को भेजो, वरना दुर्भाग्य आएगा", "माता का नाम लिखो, रातों-रात धन वर्षा होगी" अथवा "स्क्रोल मत करो, नहीं तो परिवार पर संकट आएगा" जैसे संदेश करोड़ों लोगों तक पहुंच रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की सामग्री धार्मिक आस्था का प्रचार नहीं, बल्कि अंधविश्वास और भावनात्मक दबाव के माध्यम से सोशल मीडिया एंगेजमेंट बढ़ाने का माध्यम बनती जा रही है। धार्मिक ग्रंथों के जानकारों का कहना है कि सनातन धर्म के किसी भी प्रामाणिक ग्रंथ—श्रीमद्भगवद्गीता, वेद, शिव पुराण अथवा श्रीमद्भागवत महापुराण—में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि सोशल मीडिया पर किसी मंत्र को लिखने या किसी संदेश को आगे भेजने से भगवान प्रसन्न होंगे अथवा ऐसा न करने पर अनिष्ट होगा। धर्म में सदैव श्रद्धा, भक्ति, सेवा, सदाचार और कर्म को महत्व दिया गया है।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार ऐसी पोस्टें "डिजिटल चेन मैसेज" या "भय-आधारित एंगेजमेंट" की श्रेणी में आती हैं। इनका प्रमुख उद्देश्य अधिक से अधिक लाइक, कमेंट, शेयर और व्यूज़ प्राप्त करना होता है। लोगों की धार्मिक भावनाओं का उपयोग कर उन्हें भयभीत किया जाता है ताकि वे पोस्ट के साथ जुड़ें और उसे आगे प्रसारित करें।

धार्मिक विद्वानों का कहना है कि यह प्रवृत्ति आस्था का प्रसार नहीं, बल्कि उसका दुरुपयोग है। सनातन परंपरा में भगवान की भक्ति स्वेच्छा, श्रद्धा और आत्मिक विश्वास पर आधारित है। किसी भी देवी-देवता के नाम का उपयोग भय उत्पन्न करने या चमत्कारी लाभ का लालच देने के लिए करना धार्मिक मूल्यों के विपरीत माना जाता है।

समाजशास्त्रियों का मानना है कि इस प्रकार की सामग्री विशेष रूप से युवाओं और कम शिक्षित वर्ग को अंधविश्वास की ओर आकर्षित कर सकती है। धार्मिक आस्था को विवेक और ज्ञान के साथ जोड़ने के बजाय डर और लालच से जोड़ना समाज के लिए चिंताजनक स्थिति है।

धर्माचार्यों के अनुसार भगवान की कृपा सोशल मीडिया पर टिप्पणी करने या संदेश साझा करने से नहीं, बल्कि सत्य, सेवा, संयम, सद्कर्म और सच्ची भक्ति से प्राप्त होती है। इसलिए लोगों को ऐसी रीलों और पोस्टों से प्रभावित होने के बजाय विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

डिजिटल युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन धार्मिक भावनाओं का सम्मान और सामाजिक जिम्मेदारी भी उतनी ही आवश्यक है। आस्था का आधार विश्वास होना चाहिए, भय नहीं; और भक्ति का मार्ग सद्कर्म होना चाहिए, न कि वायरल रीलों के माध्यम से फैलाया जाने वाला अंधविश्वास।

कई सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि धार्मिक भावनाओं का दुरुपयोग कर अंधविश्वास फैलाने वाली ऐसी रीलों और पोस्टों पर सरकार को सख्त निगरानी रखनी चाहिए। संगठनों का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति देवी-देवताओं के नाम पर लोगों में भय या भ्रम फैलाकर सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करने का प्रयास करता है, तो उसके विरुद्ध आवश्यक कानूनी और दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए।

 


साभार :


© CopyRight Pressnote.in | A Avid Web Solutions Venture.