हरित क्रांति का अनूठा ‘वागड़ मॉडल’ - माही के टापुओं और अरावली की कंदराओं में ‘सीड बॉल व गुलैल’ से बीजारोपण

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Published on : 04 Jun, 26 17:06

- डॉ. दीपक आचार्य

हरित क्रांति का अनूठा ‘वागड़ मॉडल’ - माही के टापुओं और अरावली की कंदराओं में ‘सीड बॉल व गुलैल’ से बीजारोपण

वसुंधरा को हरा-भरा बनाने के प्रारंभिक तरीके जहाँ थकाऊ और खर्चीले साबित हो रहे हैं, वहीं बांसवाड़ा के अद्वितीय भूगोल को देखते हुए ‘सीड बॉल और गुलैल’ की प्राचीन व आधुनिक मिश्रित तकनीक पर्यावरण संरक्षण का एक गेम-चेंजर मॉडल बन सकती है।

माही के अथाह जलभराव में तैरते सैकड़ों वीरान टापू और अरावली की दुर्गम चोटियाँ इस तकनीक से कल्पवृक्षों के वनों में तब्दील हो सकती हैं। इस दिशा में यह अनूठी और कारगर तकनीक उपयोग में लायी जाए तो ‘हरियालो राजस्थान’ को और अधिक उपलब्धिमूलक एवं आदर्श स्वरूप प्रदान किया जा सकता है।

प्रकृति ने बांसवाड़ा जिले को अपूर्व नैसर्गिक सौंदर्य और अद्वितीय भौगोलिक संरचना से नवाजा है। एक तरफ जहाँ माही नदी का मीलों दूर तक पसरा विशाल जलभराव क्षेत्र (बैकवाटर) और उसमें उभरे सैकड़ों छोटे-बड़े नयनरम्य टापू (आईलैंड्स) हैं, वहीं दूसरी तरफ अरावली की अभेद्य, पथरीली और सुदूर पहाड़ियों की श्रृंखलाएं हैं।

विश्व पर्यावरण दिवस के इस पावन अवसर पर जब हम सब धरती को बचाने और पर्यावरण संतुलन को सुदृढ़ करने का संकल्प ले रहे हैं, तब हमें स्थापित और पारंपरिक ढर्रों से हटकर कुछ नवीन, व्यावहारिक और प्रभावी तकनीकों को अपनाना होगा। ऐसी ही एक विलक्षण, कम खर्चीली और शत-प्रतिशत परिणाम देने वाली तकनीक है - ‘सीड बॉल (बीज गेंद) और गुलैल’ द्वारा बीजारोपण।

 

तकनीक का विज्ञान और आधे आसमाँ की प्रेरणा

कुछ वर्ष पूर्व राजसमंद जिले के देवगढ़ अंचल में नेहरू युवा केंद्र और महिला मंडलों द्वारा ‘सीड बॉल और गुलैल’ के माध्यम से पहाड़ियों पर किए गए सफल बीजारोपण के प्रयोग ने पूरे प्रदेश का ध्यान खींचा है। इस तकनीक के तहत स्थानीय प्रजातियों के पेड़ों और फलों के बीजों को उपजाऊ मिट्टी, जैविक खाद और पानी के साथ मिलाकर छोटी-छोटी गोलियाँ (बॉल्स) बना ली जाती हैं। इन बॉल्स को सुखाकर सुरक्षित रख लिया जाता है।

मानसून के ठीक आगमन से पहले या शुरुआती बौछारों के समय इन बॉल्स को गुलैल में फंसाकर सुदूर, दुर्गम और ऊँची पहाड़ियों या टापुओं पर उछाल दिया जाता है। मिट्टी और खाद का आवरण बीज को चिलचिलाती धूप, कीड़ों और पक्षियों से सुरक्षित रखता है, और जैसे ही बारिश की नमी मिलती है, ये बीज स्वतः ही प्रस्फुटित होकर अपनी जड़ें जमा लेते हैं।

 

माही के टापुओं पर बिखरेगी फूलों और फलों की सतरंगी छटा

बांसवाड़ा के माही बजाज सागर बांध के विशाल टापू, जो अमूमन मानवीय पहुंच से दूर और वीरान पड़े हैं, इस तकनीक के लिए सबसे आदर्श प्रयोगशाला हैं। यदि हम इन टापुओं की मिट्टी और प्रकृति के अनुकूल अलग-अलग रंगों वाले फूलों (जैसे गुलमोहर, कचनार, अमलतास), स्थानीय फलों (जैसे जामुन, आम, महुआ, खिरनी) और औषधीय पेड़ों के बीजों की ‘सीड बॉल्स’ तैयार करें और नावों के माध्यम से जलभराव क्षेत्र में घूमकर गुलैल की मदद से इन टापुओं के आंतरिक हिस्सों में दाग दें, तो आने वाले कुछ ही वर्षों में ये टापू जैव-विविधता के अनूठे केंद्र बन जाएंगे।

 

इस अनूठी तकनीक के प्रमुख लाभ -

मवेशियों और मानवीय हस्तक्षेप से पूर्ण सुरक्षा - चूंकि ये टापू और अरावली की कंदराएं इंसानों और मवेशियों की पहुंच से दूर हैं, इसलिए यहाँ उगने वाले पौधों को चरने या नष्ट होने का कोई खतरा नहीं रहेगा। बिना किसी महंगे फेंसिंग या गार्ड के पौधे सुरक्षित बड़े हो सकेंगे।

अत्यंत किफायती और सर्वसुलभ- इसमें भारी-भरकम बजट, गड्ढे खोदने के श्रम या कृत्रिम सिंचाई की कोई आवश्यकता नहीं होती। जनभागीदारी के माध्यम से हजारों सीड बॉल्स बेहद कम खर्च में तैयार की जा सकती हैं।

पर्यावरण पर्यटन (इको टूरिज्म) को बढ़ावा - जब माही के टापुओं पर अलग-अलग मौसम में भिन्न-भिन्न रंगों के फूल खिलेंगे और फलदार वृक्ष लहलहाएंगे, तो प्रकृति का यह आकर्षक स्वरूप देश-दुनिया के पर्यटकों और पक्षी प्रेमियों को अपनी ओर खींचेगा।

अरावली की नग्न पहाड़ियों को मिलेगा हरित कवच

यही प्रयोग बांसवाड़ा को घेरे हुए अरावली की उन सूखी और दुर्गम पहाड़ियों पर भी दोहराया जा सकता है जहाँ सामान्यतः वृक्षारोपण दल का पहुंचना असंभव होता है। पीपल, बरगद, नीम, शीशम, बबूल और केशिया जैसी कठोर और स्थानीय प्रजातियों के बीजों की बॉल्स बनाकर जब युवा और स्वयंसेवी संस्थाएं गुलैल से पहाड़ियों की ऊंचाइयों और दरारों में फेंकेंगे, तो मानसून की पहली फुहार के साथ ही अरावली की कंदराएं स्वतः ही अंकुरण की गवाह बनेंगी। यह न केवल मृदा अपरदन को रोकेगा बल्कि भूजल स्तर को सुधारने में भी महती भूमिका निभाएगा।

पर्यावरण दिवस पर ‘वागड़’ का संकल्प

05 जून 2026 के इस ऐतिहासिक पड़ाव पर, जब वैश्विक समुदाय जलवायु परिवर्तन की विभीषिकाओं से जूझ रहा है, बांसवाड़ा जिला अपनी भौगोलिक विशिष्टता का लाभ उठाकर इस ‘सीड बॉल-गुलैल’ क्रांति का नेतृत्व कर सकता है। वन विभाग, स्वयंसेवी संगठनों, स्काउट गाइड और स्थानीय वागड़ वासियों को एक मंच पर आकर मानसून पूर्व ‘सीड बॉल निर्माण महाअभियान’ की शुरुआत करनी चाहिए।

आइए, हम सब मिलकर अपनी गुलैलों में विनाश के कंकड़ नहीं, बल्कि जीवन और हरियाली के ये बीज सजायें और अपनी धरती माँ को एक अनुपम, सघन और रंग-बिरंगा हरित उपहार भेंट करें।


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