एन जी भट्ट
राजस्थान से राज्यसभा की रिक्त हो रही तीन सीटों में से स्पष्ट रूप से जीतने योग्य दो सीटों के लिए भारतीय जनता पार्टी द्वारा पूर्व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष डॉ सतीश पूनिया और भाजपा की राष्ट्रीय सचिव डॉ अलका गुर्जर के नामों की घोषणा कर दी है। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और मुख्यालय प्रभारी अरुण सिंह के हस्ताक्षरों से जारी राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनावों की भाजपा उम्मीदवारों की सूची में इन दोनों नेताओं के नाम शामिल है। भाजपा ने राजस्थान से राज्यसभा के वर्तमान सांसद केन्द्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू (पंजाब) और राजेन्द्र गहलोत (जोधपुर) को पुनः अपना उम्मीदवार नहीं बनाया है।
इधर कांग्रेस ने भी वर्तमान राज्यसभा सांसद नीरज डांगी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है। चुनाव जीतने पर वे दूसरी बार राज्यसभा के सांसद बनेंगे। राजनीतिक जानकारों के अनुसार कांग्रेस ने डांगी को टिकट देकर दलित वोट बैंक को साधने का प्रयास किया है।
राजस्थान से राज्यसभा की जो तीन सीटें 21 जून को रिक्त हो रही है जिनमें भाजपा के केन्द्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू और राजेन्द्र गहलोत के साथ ही कांग्रेस के नीरज डांगी भी शामिल है। भाजपा ने टिकटों की घोषणा में बढ़त बनाने के साथ ही संसद के उच्च सदन में रिक्त हो रही अपनी दोनों सीटों पर प्रदेश के नेताओं को उम्मीदवार बना और जातीय संतुलन साध कर एक मास्टर स्ट्रोक लगाया है। वर्तमान में राज्यसभा में भाजपा और कांग्रेस के पांच-पांच सांसद है जिसमें भारतीय जनता पार्टी से भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़, दिग्गज भाजपा नेता घनश्याम तिवाड़ी और आदिवासी नेता चुन्नी लाल गरासिया राजस्थान प्रदेश के नेता ही है जबकि पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय बेअंत सिंह के पौते केन्द्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू एक मात्र बाहरी सदस्य है जबकि, कांग्रेस में राज्यसभा से 21 जून को सेवानिवृत होने वाले सांसद नीरज डांगी को छोड़ कर चार सभी सांसद जिसमें सोनिया गाँधी, रणदीप सिंह सुरजेवाला और मुकुल वासनिक और प्रमोद तिवारी भी शामिल है, जोकि राज्य के बाहर के नेता है। अब सांसद नीरज डांगी को पुनः राज्यसभा उम्मीदवार बनाने के बाद भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति बनी रहेगी। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि राजस्थान देश का सबसे बड़ा भौगोलिक प्रदेश है। ऐसे में यदि अपने ही राज्य का नेता सांसद बनता है तो जनता को उससे संपर्क करने तथा अपनी समस्याओं को संसद में उठवाने में अधिक सहूलियत होती है।
भाजपा की ओर से राज्यसभा के लिए डॉ सतीश पूनिया और डॉ अलका गुर्जर के नामों की घोषणा ने राज्य की राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। यह निर्णय केवल दो व्यक्तियों को संसद के उच्च सदन में भेजने भर का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे भाजपा का व्यापक राजनीतिक, सामाजिक और संगठनात्मक संतुलन साधने का प्रयास भी दिखाई देता है। राजस्थान की राजनीति में जातीय संतुलन हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। भाजपा ने राज्यसभा के लिए जिन दो नामों का चयन किया है, वे अलग-अलग सामाजिक वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक ओर जाट समाज से डॉ सतीश पूनिया हैं तो दूसरी ओर गुर्जर समाज से डॉ अलका गुर्जर। इस निर्णय से भाजपा ने यह संकेत दिया है कि वह राज्य की प्रमुख सामाजिक शक्तियों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के पक्ष में है। आने वाले समय में यदि संगठन और राज्य मंत्रिपरिषद में भी बदलाव होते हैं तो यह संतुलन और स्पष्ट दिखाई दे सकता है। राजस्थान में भाजपा की सरकार बनने के बाद से संगठन और सरकार के बीच समन्वय को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। एक ओर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में राज्य सरकार काम कर रही है,वहीं संगठन में कई स्तरों पर बदलाव किए गए हैं। ऐसे समय में डॉ सतीश पूनिया को राज्य सभा भेजने का निर्णय उन कार्यकर्ताओं के लिए बड़ा संदेश माना जा रहा है जिन्होंने वर्षों तक संगठन में कार्य किया है। डॉ सतीश पूनिया लंबे समय तक भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे है। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा था,लेकिन पार्टी ने उनके संगठनात्मक अनुभव और राजनीतिक योगदान को देखते हुए उन्हें पहले बिहार और बाद में हरियाणा में पार्टी के प्रभारी नई जिम्मेदारी देने का फैसला किया है। इससे यह संदेश जाता है कि भाजपा अपने अनुभवी नेताओं को चुनावी हार के आधार पर राजनीतिक रूप से हाशिए पर नहीं डालती। इन दोनों भाजपा नेताओं को राज्यसभा उम्मीदवार बनाने का फ़ैसला प्रदेश में जाट और गुर्जर समाज को साधने की रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है। राजस्थान की राजनीति में जाट और गुर्जर समाज का प्रभाव अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। राज्य के अनेक संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों में यह समुदाय निर्णायक भूमिका निभाता है। डॉ सतीश पूनिया जाट समाज के प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं। इसी प्रकार भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री नाथू सिंह गुर्जर की धर्मपत्नी डॉ अलका गुर्जर को राज्यसभा में भेजना भाजपा की सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2028 में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए भाजपा जाट और गुर्जर समाज के बीच अपना प्रभाव और अधिक मजबूत करना चाहती है। विशेष रूप से पश्चिमी, उत्तरी और पूर्वी राजस्थान में इसका राजनीतिक महत्व अधिक है।
इसके साथ ही डॉ अलका गुर्जर का चयन भाजपा की महिला सशक्तिकरण नीति का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर महिला नेतृत्व को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है। राजस्थान से राज्यसभा के लिए डॉ अलका गुर्जर को अवसर देकर पार्टी ने यह स्पष्ट किया है कि वह महिला प्रतिनिधित्व को केवल चुनावी घोषणा तक सीमित नहीं रखना चाहती। डॉ अलका गुर्जर के माध्यम से भाजपा ने महिला और सामाजिक प्रतिनिधित्व दोनों उद्देश्यों को एक साथ साधने का प्रयास किया है। इससे पूर्वी राजस्थान के उन क्षेत्रों में भी पार्टी को राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना है जहां गुर्जर मतदाता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार राज्यसभा केवल राजनीतिक नियुक्ति का मंच नहीं है, बल्कि राज्यों के हितों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है। राजस्थान अपने जल संकट, ऊर्जा जरूरतों, सीमा सुरक्षा और विकास, पर्यटन, खनिज संसाधनों और कृषि से जुड़े तथा सड़क,रेल्वे और हवाई सेवाओं आदि के विस्तार सहित अनेक मुद्दों पर केंद्र से सहयोग चाहता है। ऐसे में राज्यसभा में अनुभवी और सक्रिय प्रतिनिधियों की भूमिका महत्वपूर्ण साबित होगी। डॉ सतीश पूनिया का संगठनात्मक अनुभव और डॉ अलका गुर्जर का सामाजिक जुड़ाव राजस्थान के मुद्दों को राष्ट्रीय मंच पर प्रभावी ढंग से रखने में सहायक हो सकता है।
भाजपा के इस निर्णय ने विपक्ष, विशेषकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सामने भी नई चुनौती खड़ी कर दी है। भाजपा ने जिन सामाजिक वर्गों को प्रतिनिधित्व दिया है, वे कांग्रेस के लिए भी महत्वपूर्ण वोट बैंक रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस को आगामी राजनीतिक रणनीति बनाते समय इन सामाजिक समीकरणों पर विशेष ध्यान देना होगा। इस प्रकार राजस्थान से राज्यसभा के लिए डॉ सतीश पूनिया और डॉ अलका गुर्जर का चयन भाजपा की दूरगामी राजनीतिक सोच को दर्शाता है। यह निर्णय संगठन के प्रति सम्मान, सामाजिक प्रतिनिधित्व, महिला सशक्तिकरण और जातीय संतुलन जैसे अनेक संदेश एक साथ देता है। राज्य की राजनीति में यह कदम केवल राज्यसभा की दो सीटों तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले समय में राज्य सरकार और संगठनात्मक फेरबदल, सामाजिक समीकरणों और चुनावी रणनीतियों की दिशा भी तय कर सकता है। भाजपा ने इस चयन के माध्यम से यह स्पष्ट संकेत दिया है कि वह राजस्थान में अपने सामाजिक आधार को और व्यापक तथा मजबूत बनाने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रही है।
उल्लेखनीय है कि राजस्थान में 21 जून को राज्यसभा की 3 सीटें रिक्त हो रही हैं, जिसके लिए आवश्यक होने पर 18 जून को मतदान कराया जाएगा। चुनाव आयोग के कार्यक्रम के मुताबिक 1 जून 2026 को चुनाव अधिसूचना जारी हुई है,जबकि नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 8 जून तय की गई है। 9 जून को नामांकन पत्रों की जांच होगी और 11 जून तक उम्मीदवार नाम वापस ले सकेंगे तथा जरूरी होने पर मतदान 18 जून को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक होगा, जबकि मतगणना उसी दिन शाम 5 बजे शुरू होगी और परिणाम घोषित होंगे।
राजस्थान विधानसभा की 200 सीटों में संख्या बल के हिसाब से वर्तमान में भाजपा के पास 118 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के पास 67 विधायक हैं। एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए प्रथम वरीयता के 51 वोटों की जरूरत होती है। ऐसे में भाजपा को दो सीटें जीतने के लिए 102 वोट चाहिए, जो उसके पास मौजूद हैं. कांग्रेस के पास भी एक सीट के हिसाब से पर्याप्त वोट बैंक है जिसके आधार पर कांग्रेस के भी एक सीट पर आसानी से कब्जा जमाने की उम्मीद है ।
चुनाव बाद भाजपा और कांग्रेस के पास के पास 16-16 अतिरिक्त वोट शेष रहेंगे।
राज्य सभा के चुनाव हमेशा क्रॉस वोटिंग और किसी उद्योगपति के चुनाव मैदान में उतरने से दिलचस्प हो जाते है लेकिन इस बार राजस्थान में इसकी संभावनाएं कम ही दिखाई देती है। भाजपा और कांग्रेस यदि किसी तीसरे उम्मीदवार को बाहर से समर्थन करती है तो उसे अपने 16 अतिरिक वोटों के अलावा 35 दूसरे दलों के विधायकों का समर्थन भी लेना होगा जो वर्तमान हालातों में संभव नहीं लगता हालांकि आरएलडी भाजपा के साथ है फिर भी उसे 8 निर्दलीयों, 2 बसपा, 4 बीटीपी के विधायकों के वोट लेने के बाद भी तीसरे उम्मीदवार की जीत के लिए 20 विधायकों की जरूरत होंगी। दोनों दलों की वर्तमान परिस्थितियों में ऐसा होना संभव नहीं लगता।
राज्यसभा चुनाव के लिए नाम दाखिला के चार दिन गुजर जाने के बाद किसी भी उम्मीदवार ने विधानसभा में रिटर्निक अधिकारी के समक्ष अपना नामांकन पत्र दाखिल नहीं किया है। लेकिन यह तय लगता है कि राजस्थान में नामांकन पत्र दाखिल करने की अंतिम तिथि 8 जून और नाम वापस लेने की तिथि 11 जून तक राज्यसभा चुनाव की सही तस्वीर काँच की तरह साफ हो जायेगी।