नारायण सेवा संस्थान ने 46वें सामूहिक विवाह समारोह में 21 दिव्यांग जोड़ों के सपनों को दिया नया आसमान

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Published on : 07 Jun, 26 17:06

नारायण सेवा संस्थान ने 46वें सामूहिक विवाह समारोह में 21 दिव्यांग जोड़ों के सपनों को दिया नया आसमान

नई दिल्ली। जब जीवन की राहों में गरीबी, दिव्यांगता और सामाजिक चुनौतियां दीवार बनकर खड़ी हो जाएं, तब किसी का हाथ थामकर सपनों को सच करना किसी वरदान से कम नहीं होता। ऐसे ही 21 दिव्यांग एवं निर्धन जोड़ों के जीवन में खुशियों की नई सुबह लेकर आया नारायण सेवा संस्थान का 46वां नि:शुल्क सामूहिक विवाह समारोह, जहां सात फेरों के साथ केवल दो दिल ही नहीं मिले, बल्कि वर्षों के संघर्ष, इंतजार और अधूरे सपनों को भी मंजिल मिली।

नई दिल्ली में आयोजित इस भावनात्मक समारोह में राजस्थान, झारखंड, बिहार, गुजरात और उत्तर प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों से आए 21 जोड़ों ने वैदिक मंत्रों और अग्नि को साक्षी मानकर जीवनभर साथ निभाने का संकल्प लिया। विवाह मंडप में कहीं माता-पिता की नम आंखें थीं तो कहीं नवदंपतियों के चेहरों पर नए जीवन की चमक। हर फेरे के साथ मानो संघर्षों के बादलों को चीरकर उम्मीद का सूरज निकल रहा था।

दो दिवसीय आयोजन की शुरुआत गणपति स्थापना, हल्दी और मेहंदी जैसी पारंपरिक रस्मों से हुई। महिलाओं के मंगल गीत, घूमर और लोकनृत्यों ने वातावरण को उत्सव, संस्कृति और भावनाओं से सराबोर कर दिया। उपस्थित अतिथियों और स्वयंसेवकों ने नवदंपतियों को आशीर्वाद देकर उनके सुखद एवं सम्मानपूर्ण जीवन की कामना की।

समारोह के दौरान संस्था के प्रेसिडेंट प्रशांत अग्रवाल, डायरेक्टर वंदना अग्रवाल तथा ट्रस्टी देवेंद्र चौबीसा ने सहयोगी दानदाताओं एवं अतिथियों का पारंपरिक सम्मान किया।

नवविवाहित जोड़ों को गृहस्थ जीवन की मजबूत शुरुआत देने के लिए संस्थान ने पलंग, अलमारी, गैस चूल्हा, पंखे, मिक्सर तथा 100 से अधिक प्रकार के घरेलू उपयोग के बर्तन भेंट किए। दिल्ली के अनेक दानदाताओं ने भी आगे बढ़कर उपहार देकर नवदंपतियों की खुशियों में भागीदारी निभाई।

प्रेसिडेंट प्रशांत अग्रवाल ने कहा, "सामूहिक विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं है, बल्कि यह सम्मान, समानता और सामाजिक समरसता का उत्सव है। हमारा प्रयास है कि कोई भी दिव्यांग या आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति केवल संसाधनों के अभाव में अपने जीवन के इस महत्वपूर्ण संस्कार से वंचित न रहे।"

प्यार, संघर्ष और उम्मीद की कहानी

इस समारोह में झारखंड के शिबू कुमार और गीता कुमारी की कहानी हर किसी की आंखें नम कर गई। पिछले दो वर्षों से एक-दूसरे का साथ निभा रहे इस जोड़े के सामने आर्थिक तंगी और सामाजिक चुनौतियां बड़ी बाधा बनी हुई थीं। शिबू के दोनों पैरों में विकृति है, जबकि गीता अपने दाहिने पैर से दिव्यांग हैं।

जब उम्मीद की किरण धुंधली पड़ने लगी, तब उन्होंने नारायण सेवा संस्थान का दरवाजा खटखटाया। संस्था ने गीता के उपचार में सहयोग किया और शिबू को आधुनिक कैलीपर्स उपलब्ध कराए, जिससे उनकी चलने-फिरने की क्षमता में उल्लेखनीय सुधार हुआ। अंततः दोनों का विवाह उसी संस्थान के मंच पर संपन्न हुआ जिसने उनके जीवन में नई आशा जगाई।

आंसुओं से भरी आंखों के साथ गीता ने कहा, "नारायण सेवा संस्थान हमारे लिए भगवान के समान है। आज संस्था की वजह से मुझे मेरा प्यार और अपना घर बसाने का अवसर मिला है।"

एक और सपना हुआ साकार

राजस्थान के बांसवाड़ा निवासी मुकेश और दुर्गा की कहानी भी संघर्ष और विश्वास की मिसाल है। मुकेश के पिता का निधन हो चुका है और उनकी मां मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण करती हैं। वहीं दुर्गा के पिता मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं। वर्ष 2009 में नारायण सेवा संस्थान द्वारा किए गए सफल ऑपरेशन के बाद दुर्गा आज एक निजी विद्यालय में शिक्षिका के रूप में कार्यरत हैं।

आर्थिक और पारिवारिक कठिनाइयों के बीच विवाह का सपना दूर होता जा रहा था, लेकिन संस्थान ने उनके जीवन में भी खुशियों का दीप जलाया। विवाह के बाद भावुक दुर्गा ने कहा, "2009 में संस्थान ने मुझे चलने का आत्मविश्वास दिया था और आज जीवनसाथी का साथ भी। मेरे लिए यह केवल विवाह नहीं, बल्कि जीवन का नया जन्म है।"

चार दशक से अधिक समय से सेवा, संवेदना और समर्पण के मार्ग पर अग्रसर नारायण सेवा संस्थान अब तक 2,582 दिव्यांग एवं निर्धन जोड़ों का विवाह संपन्न करा चुका है। यह केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के जीवन में रोशनी, सम्मान और आत्मविश्वास की नई कहानी है।

संस्थान के संस्थापक कैलाश मानव अग्रवाल को वर्ष 2008 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था, जबकि संस्था के प्रेसिडेंट प्रशांत अग्रवाल को वर्ष 2023 में राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। संस्था अब तक 39,388 से अधिक लोगों को नि:शुल्क कृत्रिम अंग उपलब्ध करा चुकी है तथा 4.52 लाख से अधिक मरीजों का नि:शुल्क उपचार कर चुकी है।

यह समारोह केवल विवाह का आयोजन नहीं था, बल्कि इस बात का जीवंत प्रमाण था कि जब समाज संवेदनशील बनता है, तो दिव्यांगता और गरीबी जैसी बाधाएं भी सपनों का रास्ता नहीं रोक पातीं।


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