नई दिल्ली। देश की राजधानी नई दिल्ली में प्रवासी राजस्थानियों की अग्रिम संस्था राजस्थान संस्था संघ द्वारा उच्चतम न्यायालय द्वारा राजस्थान में सरकारी एवं निजी स्कूलों में प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा राजस्थानी में अनिवार्य शिक्षा लागू करने की नीति बनाने के निर्देश देने के ऐतिहासिक फैसले पर ख्यातिनाम वरिष्ठ पत्रकार एवं दैनिक जलते दीप और राजस्थानी पत्रिका माणक के प्रधान संपादक पदम मेहता और सुप्रीम कोर्ट में इस केस की पैरवी करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ मनीष सिंघवी का अभिनन्दन किया गया।
राजस्थान संस्था संघ के अध्यक्ष नवरतन अग्रवाल बीकानेरवाला,कार्यकारी अध्यक्ष के के नरेडा और महामंत्री चंद्रशेखर मिश्रा तथा अन्य पदाधिकारियों ने राजस्थानी फटका और पगड़ी पहना कर तथा शाल ओढ़ाने के साथ ही स्मृति चिन्ह भेंट कर मेहता और सिंघवी का सम्मान किया गया। वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ मनीष सिंघवी की अनुपस्थिति में उनके पुत्र एडवोकेट अपूर्व सिंघवी ने सम्मान ग्रहण किया।
इस मौके पर देश में फसल बीमा की अवधारणा लागू करने में अहम भूमिका निभाने वाले और भारतीय कृषि बीमा कंपनी लिमिटेड के पूर्व संस्थापक अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक सुपारस भंडारी एवं विभिन्न राजस्थानी संस्थाओं के प्रतिनिधि गण उपस्थित थे।
इस अवसर पर संस्था संघ के अध्यक्ष नवरतन अग्रवाल ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने हाल ही पदम मेहता और जाने माने शिक्षाविद् प्रो.कल्याण सिंह शेखावत की विशेष अनुमति याचिका पर राजस्थान सरकार को सरकारी और निजी विद्यालयों में राजस्थानी भाषा को विषय के रूप में लागू करने की नीति बनाने के निर्देश देने के साथ ही संविधान की भावना के अनुरूप बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा उपलब्ध कराना राज्यों की जिम्मेदारी है और राजस्थानी जैसी समृद्ध भाषा को शिक्षा व्यवस्था में उचित स्थान मिलना चाहिए आदि टिप्पणियां करने तथा तीस सितम्बर तक इसकी अनुपालना रिपोर्ट देने सम्बंधी महत्वपूर्ण फैसले से राजस्थान ही नहीं, देश-विदेश में बसे करोड़ों राजस्थानियों में असीम खुशी का संचार हुआ है तथा मायड़ भाषा प्रेमियों को उत्साह और ऊर्जा से भर दिया है। साथ ही राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता प्राप्त करने की दिशा में भी इसे एक ठोस उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद राजस्थानी का स्कूली और उच्च शिक्षा का अभिन्न अंग और हिंदी के बाद राजस्थान की दूसरी राजभाषा बनने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।
संस्था के कार्यकारी अध्यक्ष के के नरेडा ने कहा कि राजस्थानी (मायड़ ) भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ ही तथ्यों के साथ अपनी बात रखने वाले तथा मायड़ भाषा के मान सम्मान, संरक्षण और नई पीढ़ी को भावनात्मक रूप से जोड़ने के लिए पदम मेहता द्वारा किए जा रहे अनवरत और अथक प्रयासों एवं सराहनीय योगदान की वजह से ही उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए अहम फैसले से अब राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिलने का मार्ग खुल रहा है। उन्होंने बताया कि नई दिल्ली के जन्तर मंतर पर राजस्थान भाषा मान्यता समिति के बैनर तले संस्था संघ के सहयोग से आयोजित आंदोलन और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिले प्रतिनिधि मंडल के भी वे सक्रिय सदस्य थे।
संस्था के महामंत्री चंद्र शेखर मिश्रा ने कहा कि राजस्थानी भाषा को स्कूली शिक्षा का अभिन्न अंग बनाने सम्बन्धी सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से देश विदेश तक फैले पूरे राजस्थानी समाज में हर्ष की लहर है और इसके सूत्रधार बनने श्रेय मेहता जी को है।
भारत में कृषि और फसल बीमा क्षेत्र के विकास में महत्व पूर्ण भूमिका और योगदान देने वाले बैंक प्रशासक सुपारस भंडारी, ने कहा कि पदम मेहता पिछले कई दशकों से राजस्थानी का झंडा बुलंद कर रहे है अंतोगत्वा देश के सर्वोच्च न्यायालय ने उनके प्रयासों पर कानूनी मुहर लगाई है।
संस्था संघ के उपाध्यक्ष जी एन भट्ट ने कहा कि पदम मेहता ने राजस्थानी भाषा को अपने जीवन का अन्तिम लक्ष्य बना कर देश विदेश में बसे करोड़ो राजस्थानियों के दिलों में अटूट एवं विशेष स्थान बनाया है। वे दिन रात सिर्फ़ राजस्थानी के ही बारे में सोचते है और उसके साथ ही जी रहे है। सुप्रीम कोर्ट का परिणाम उनके इसी जुनून का परिणाम है। भट्ट ने बताया कि मेहता जी अनेकानेक आर्थिक कठिनाइयों और लाभ हानि की परवाह किए बिना पिछली आधी सदी से देश की इकलौती राजस्थानी पत्रिका माणक का प्रकाशन कर रहे है और उसे देश विदेश में बसे राजस्थानियों तक पहुंचा रहे हैं। उन्होंने कहा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय का फैसला देश की नई शिक्षा नीति और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की मातृ भाषा में शिक्षा के प्रभावी परिणामों की भावनाओं के अनुरूप है तथा राजस्थान जैसे विशाल प्रदेश में प्राइमरी स्कूलों में बच्चों के ड्रॉप आउट को रोकने वाला है। साथ ही राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए केन्द्र सरकार को वर्षों पूर्व प्रेषित राजस्थान विधानसभा में पारित संकल्प की भावना को भी पूरा करता है।
अपने सम्मान के लिए आभार जताते हुए वरिष्ठ पत्रकार मेहता ने कहा कि 10 करोड़ राजस्थानियों द्वारा बोली जाने वाली राजस्थानी भाषा देश की प्राचीन और समृद्ध भाषा है तथा इसकी अपनी देवनागरी लिपि होने के साथ ही यह केन्द्रीय साहित्य अकादमी से स्वीकृत तथा देश विदेश के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है। कई क्षेत्रों और विद्वानों ने इस पर शोध किए है। भक्तिमयी मीरा और नृसिंह मेहता के भजनो में मरूँ गुर्जरी का भाव हैं। राजस्थान विधानसभा में करीब 23 वर्ष पूर्व 3 सितंबर 2003 को राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने का संकल्प पत्र सर्वसम्मति से पारित कर केन्द्र सरकार को भेजा था। इस संकल्प पत्र में राजस्थान के सभी अंचलों मेवाड़,मारवाड़,हाड़ौती, ढूंढाड़,वागड़, बृज आदि की भाषा और बोलियों का समावेश है लेकिन कतिपय लोग राजस्थानी भाषा को लेकर गलतफहमी और गुमराह करने में लगे हुए है लेकिन राजस्थान के नागरिक अब जागरूक हो गए है तथा राजस्थानी भाषा के स्वरूप को विकृत करने के किसी भी प्रयास को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मेहता ने कहा कि राजस्थानी भाषा में सैकड़ों गीत संगीत नाटक और फिल्में है।इसका साहित्य बहुत समृद्ध है और हर घर में दादा दादी नाना नानी इसके चलते फिरते शब्द और ज्ञान कोष है। कई विदेशी शोध कर्ता राजस्थानी भाषा का अध्ययन करते हुए विस्मय से भर यह कहने को मजबूर है कि दुनिया में ऐसी समृद्ध भाषाएँ बहुत कम है।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की पैरवी करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ मनीष सिंघवी के पुत्र एडवोकेट अपूर्व सिंघवी ने कहा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय का आदेश संविधान की मूल भावना और देश की नई शिक्षा नीति के अनुरूप है। इसे इस परिपेक्ष्य में भी देखा गया है कि जिसमें यह पाया गया कि मातृ भाषा में शिक्षा के अभाव में कई बच्चों ने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। इस प्रकार ड्रॉप आउट की समस्या से देश में समग्र शिक्षा अभियान को गहरा धक्का लगता है। इसी कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं मातृ भाषा में शिक्षा के पक्षधर हैं ।