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बुधवार का दिन राजस्थान में वैचारिक विमर्श और राजनीति के लिहाज से विशेष महत्व का रहा है। एक ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ,(आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत जी उदयपुर में मेवाड़ की ऐतिहासिक धरती पर हल्दीघाटी विजय के 450 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में भाग लेने पहुंचे, वहीं दूसरी ओर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कोटा में विद्यार्थियों और युवाओं के बीच संवाद स्थापित कर अपनी राजनीतिक सक्रियता का संदेश दिया। इन यात्राओं ने राजस्थान को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा कर दिया है।
झीलों की नगरी उदयपुर में मोहन भागवत जी का प्रवास केवल एक संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं माना जा रहा, बल्कि इसके व्यापक सांस्कृतिक और वैचारिक निहितार्थ भी हैं। उनके कार्यक्रमों में महाराणा प्रताप की विरासत, राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक संगठन जैसे विषय प्रमुख रहे। मोहन भागवत जी ने हल्दीघाटी विजय के 450 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित समारोह में सहभागिता की तथा विभिन्न संघ गतिविधियों से जुड़े कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन किया। मेवाड़ की धरती भारतीय स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक मानी जाती है। ऐसे में संघ प्रमुख का यहां आना केवल ऐतिहासिक स्मृतियों को नमन करना नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद के उस विमर्श को पुनर्स्थापित करना भी है, जिसे संघ परिवार लंबे समय से अपने वैचारिक आधार के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। संघ के शताब्दी वर्ष के बाद संगठन सामाजिक विस्तार और वैचारिक संवाद को और व्यापक बनाने की दिशा में सक्रिय दिखाई दे रहा है। संघ प्रमुख मोहन भागवत जी के कार्यक्रम में राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा, राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी और राजस्थान सरकार के कई मंत्री भाजपा और संघ संगठन से जुड़े कई महत्वपूर्ण पदाधिकारी भी उपस्थित रहें।
दूसरी ओर कोटा में राहुल गांधी का कार्यक्रम पूरी तरह युवाओं, छात्रों और रोजगार जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा। उन्होंने परीक्षा पत्र लीक, भर्ती प्रक्रियाओं में अनियमितता और युवाओं के सामने बढ़ती रोजगार चुनौती को प्रमुख विषय बनाया। कांग्रेस इस कार्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थियों और प्रथम बार मतदान करने वाली पीढ़ी के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास कर रही है।
लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला का गृह नगर कोटा देश की सबसे बड़ी कोचिंग नगरी के रूप में जाना जाता है। यहां लाखों छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए आते हैं। ऐसे में राहुल गांधी द्वारा कोटा को मंच बनाना राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत रणनीतिक माना जा सकता है। यह केवल राजस्थान तक सीमित संदेश नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं के मुद्दों को केंद्र में लाने का प्रयास भी है। भाजपा और कांग्रेस के बीच इस कार्यक्रम को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी देखने को मिले, जिससे इसकी राजनीतिक महत्ता और बढ़ गई। राहुल गाँधी के कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत6,पूर्व उप मुख्यमंत्री और कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव सचिन पायलट,प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा, विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता टीकाराम जूली सहित अन्य कई नेता भी मौजूद थे। हालांकि इस कार्यक्रम में नेता गण भी श्रोता ही थे क्योंकि इसमें कोई औपचारिक भाषण नहीं हुए।
यदि व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो दोनों यात्राएं भारत की राजनीति के दो अलग-अलग विमर्शों का प्रतिनिधित्व करती हैं। मोहन भागवत जी का उदयपुर प्रवास सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, संगठन निर्माण और ऐतिहासिक गौरव के विचार विमर्श को आगे बढ़ाता है, जबकि राहुल गांधी का कोटा दौरा शिक्षा, रोजगार और युवाओं की आकांक्षाओं पर आधारित राजनीतिक विमर्श को केंद्र में रखता है। एक पक्ष राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करने की बात करता है, तो दूसरा सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों को राजनीतिक एजेंडा बनाने का प्रयास कर रहा है।
राजस्थान की दृष्टि से भी यह संयोग महत्वपूर्ण है। राज्य में आगामी वर्षों की राजनीतिक चुनौतियों और सामाजिक समीकरणों को देखते हुए भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने-अपने आधार वर्गों को मजबूत करने में जुटी हैं। भाजपा जहां संघ के व्यापक सामाजिक नेटवर्क और वैचारिक आधार से शक्ति प्राप्त करती है, वहीं कांग्रेस युवाओं, विद्यार्थियों और बेरोजगार वर्ग के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने का प्रयास कर रही है। कुल मिलाकर, उदयपुर और कोटा में हुए ये दोनों कार्यक्रम केवल दो नेताओं के दौरे भर नहीं हैं। ये भारतीय राजनीति में चल रहे दो समानांतर विमर्शों—सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सामाजिक -आर्थिक मुद्दों—की अभिव्यक्ति हैं। राजस्थान इस समय इन दोनों धाराओं का महत्वपूर्ण मंच बना हुआ है। आने वाले समय में यह देखना रोचक होगा कि जनता के बीच कौन-सा विमर्श अधिक प्रभाव छोड़ता है और राज्य की राजनीति को किस दिशा में आगे बढ़ाता है?